Country Purchase: क्या कोई देश किसी दूसरे देश को खरीद सकता है, जानें क्या हैं नियम?
Country Purchase: लोगों के बीच अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या कोई देश दूसरे देश को खरीद सकता है या नहीं. आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

Country Purchase: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड को खरीदने में फिर से दिलचस्पी ने एक बार फिर से एक बड़ी बहस को छेड़ दिया है. आपको बता दें कि ग्रीनलैंड एक स्वतंत्र देश नहीं है बल्कि डेनमार्क साम्राज्य के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या कोई देश किसी दूसरे देश को खरीद सकता है या नहीं.
कौन होता है देश का मालिक?
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत कोई भी देश संपत्ति का ऐसा टुकड़ा नहीं है जिसे वित्तीय सौदे के जरिए बेचा या फिर हस्तांतरित किया जा सके. संयुक्त राष्ट्र चार्टर हर राष्ट्र को एक संप्रभु इकाई के रूप में साफ तौर से परिभाषित करता है. इसका मतलब है कि उसकी भूमि, लोग और शासन आजाद हैं. सरकारें व्यवसायिक अर्थों में अपने देश की मालिक नहीं होती. इस वजह से उनके पास उन्हें बेचने का कोई भी कानूनी अधिकार नहीं है. ऐसा करने की कोई भी कोशिश अंतरराष्ट्रीय मानदंड का उल्लंघन करेगी और वैश्विक विरोध को आमंत्रित करेगी.
आबादी की सहमति है जरूरी
अंतरराष्ट्रीय कानून के सबसे मौलिक सिद्धांत में से एक आत्मनिर्णय का अधिकार है. इसका मतलब है कि किसी भी क्षेत्र में रहने वाले लोगों को अपने राजनीतिक भविष्य का फैसला करने में अंतिम बात कहने का अधिकार है. भले ही दो सरकारें क्षेत्रीय हस्तांतरण पर सहमत हों लेकिन इसे कानूनी रूप से तब तक अमान्य माना जाता है जब तक की आबादी सहमति ना दे.
सीधे तौर पर खरीद मुमकिन नहीं
वैसे तो सीधे तौर पर खरीद अब मुमकिन नहीं है लेकिन इसके बावजूद भी आर्थिक साधनों के जरिए से प्रभाव डाला जा सकता है. गंभीर कर्ज के मामलों में कुछ देश बंदरगाह या फिर द्वीप जैसी रणनीतिक संपत्तियों को दशकों के लिए विदेशी शक्तियों को लीज पर दे देते हैं. इस तरीके को डेट ट्रैप डिप्लोमेसी कहा जाता है.
इतिहास में कैसे हुई खरीदघ्
कुछ ऐसे ऐतिहासिक उदाहरण हैं जहां पर वित्तीय सौदों के जरिए से भूमि का हस्तांतरण हुआ. आपको बता दें कि यह क्षेत्रीय हस्तांतरण थे ना कि पूरे देश की खरीद. 1867 में अलास्का खरीद और 1803 में लुसियाना खरीद एक औपनिवेशिक युग में हुई थी. उस समय साम्राज्यवादी शक्तियां बड़े क्षेत्र को राज्य की संपत्ति मानती थी. आज के समय में सिर्फ पैसा, संप्रभुता, जनता की इच्छा या फिर अंतरराष्ट्रीय कानून को खत्म नहीं कर सकता.
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Source: IOCL




























