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BRICS का प्रस्ताव कोई देश न माने तो क्या होगा, क्या फाउंडर देश कर सकते हैं कार्रवाई?

ब्रिक्स एक ऐसा अनौपचारिक मंच है जिसके फैसले किसी भी देश के लिए मानना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं होता है. यदि कोई देश असहमत है तो संस्थापक उस पर कोई जुर्माना या कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकते हैं.

भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का दूसरा दिन वैश्विक आर्थिक मंच पर एक नई दिशा तय कर रहा है. सम्मेलन में शामिल सदस्य और आमंत्रित देशों के शीर्ष नेता सतत विकास, समावेशी वृद्धि और व्यापारिक सहयोग जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर गहन चर्चा में जुटे हैं. इस महत्वपूर्ण बैठक के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या ब्रिक्स द्वारा तय किए गए फैसले सभी देशों के लिए अनिवार्य होते हैं? यदि कोई देश किसी नीति या आर्थिक प्रस्ताव को खारिज कर दे, तो क्या इसके संस्थापक राष्ट्र उस पर कोई सख्त रुख अपना सकते हैं? आइए समझते हैं.

सम्मेलन की गतिविधियां और एजेंडा

नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित हो रहे इस उच्चस्तरीय सम्मेलन के दूसरे सत्र में नवाचार, आर्थिक लचीलेपन और सतत विकास पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जा रहा है. दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं एक साथ आकर वैश्विक चुनौतियों के व्यावहारिक समाधान खोज रही हैं. बैठक का मुख्य उद्देश्य विकासशील देशों के बीच आपसी व्यापार को आसान बनाना और वैश्विक संस्थाओं में संतुलन कायम करना है. सदस्य देश वित्तीय तकनीकों के आदान-प्रदान और डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने के नए रास्ते तलाश रहे हैं, ताकि वैश्विक व्यापारिक गति को बल मिल सके.

ब्रिक्स के फैसले कैसे होते हैं?

ब्रिक्स मुख्य रूप से आपसी विचार-विमर्श, कूटनीतिक तालमेल और सहमति के सिद्धांतों पर संचालित होने वाला एक मंच है. यूरोपीय संघ की तरह इसके पास कोई सख्त अंतरराष्ट्रीय कानून या कानूनी रूप से बाध्यकारी संस्थागत व्यवस्था नहीं है. सम्मेलन के दौरान जारी किए जाने वाले घोषणा-पत्र केवल सदस्य देशों की साझा मंशा और आर्थिक प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं. इसका सीधा अर्थ यह है कि किसी भी प्रस्ताव को लागू करना या न करना पूरी तरह से संबंधित देश की अपनी राष्ट्रीय नीति, संप्रभुता और आर्थिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है.

यह भी पढ़ें: ब्रिक्स समिट में जिनपिंग को रिसीव करने क्यों नहीं गए पीएम मोदी, जानें क्या है प्रोटोकॉल?


BRICS का प्रस्ताव कोई देश न माने तो क्या होगा, क्या फाउंडर देश कर सकते हैं कार्रवाई?

प्रस्ताव अस्वीकार करने पर देशों की क्या होती है स्थिति?

यदि कोई देश संगठन के किसी नीतिगत फैसले या आर्थिक प्रस्ताव से सहमत नहीं होता है, तो वह उसे अपनाने से पूरी तरह मना कर सकता है. उदाहरण के लिए, कॉमन करेंसी और तेजी से डॉलर पर निर्भरता कम करने जैसे कई रणनीतिक विचारों पर भारत समेत कुछ देशों ने अपने अलग दृष्टिकोण व्यक्त किए हैं. चूंकि संगठन के सभी महत्वपूर्ण फैसले आम सहमति से लिए जाते हैं, इसलिए किसी एक देश की असहमति का मतलब यह होता है कि वह विशिष्ट योजना केवल उन राष्ट्रों के बीच ही लागू होगी जो उस पर सहमत हैं.

फाउंडर देशों की सीमाएं और दंड के प्रावधान

संगठन के संस्थापक राष्ट्रों के पास ऐसी कोई विशेष कानूनी या दंडात्मक शक्ति नहीं है, जिसके तहत वे किसी असहमत देश के खिलाफ सीधे तौर पर कोई अनुशासनात्मक कदम उठा सकें. ब्रिक्स के पास न तो अपनी कोई सेना है और न ही कोई ऐसी अदालत जो नियमों का उल्लंघन करने वाले सदस्य पर आर्थिक जुर्माना या वैश्विक प्रतिबंध लगा सके. यदि कोई सदस्य देश किसी योजना का हिस्सा बनने से इंकार करता है, तो बाकी फाउंडर देश उस पर कोई जबरदस्ती नहीं कर सकते और न ही उसे सीधे तौर पर समूह से निष्कासित कर सकते हैं. 


BRICS का प्रस्ताव कोई देश न माने तो क्या होगा, क्या फाउंडर देश कर सकते हैं कार्रवाई?

प्रस्ताव न मानने के व्यावहारिक और कूटनीतिक परिणाम

औपचारिक सजा न होने के बावजूद, किसी प्रस्ताव से अलग रहने के व्यावहारिक नतीजे जरूर देखने को मिलते हैं. जो देश किसी आर्थिक नीति या व्यापारिक समझौते से खुद को दूर रखता है, वह उस योजना से मिलने वाले संभावित वित्तीय लाभों और कूटनीतिक सहूलियतों से भी वंचित रह जाता है. इसके अलावा, बार-बार आम सहमति से अलग रुख अपनाने पर अन्य सदस्य देशों के साथ उस विशिष्ट क्षेत्र में भविष्य का तालमेल सीमित हो सकता है. कई बार सर्वसम्मति न बनने के कारण महत्वपूर्ण वैश्विक मंचों पर संयुक्त बयान जारी करने में भी रुकावटें आती हैं.

यह भी पढ़ें: क्या BRICS देशों से लड़ सकता है NATO, कौन ज्यादा ताकतवर?

About the author निधि पाल

निधि पाल एबीपी लाइव में कंटेंट राइटर हैं. ये यहां पर जीके सेक्शन की जिम्मेदारियां संभाल रही हैं. पिछले 7 साल से पत्रकारिता की दुनिया में कार्यरत निधि पाल ने इससे पहले अमर उजाला डिजिटल, न्यूज 24, ईटीवी भारत हैदराबाद जैसे बड़े संस्थानों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है.

पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो उन्होंने आईआईएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन लखनऊ से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है.

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