मुस्कान-साहिल को मौत की सजा, जानें फांसी से बचने के क्या ऑप्शन?
मेरठ के नीले ड्रम हत्याकांड में कोर्ट ने मुस्कान और साहिल को फांसी की सजा सुनाई है, लेकिन कानून के तहत उन्हें अभी कई मंचों पर अपील करने का हक है. फांसी से बचने के लिए वो कई कदम उठा सकते हैं.

मेरठ की दहला देने वाली उस काली रात की खौफनाक यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा हैं, जब क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए एक हंसता-खेलता परिवार उजड़ गया था. मर्चेंट नेवी कर्मी सौरभ राजपूत की हत्या कर जिस तरह उनके शरीर के टुकड़े कर नीले ड्रम में सीमेंट से सील किए गए थे, उसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया था. इस बहुचर्चित और वीभत्स हत्याकांड में अदालत का अंतिम फैसला आ चुका है, जहां जिला जज ने दोषी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को फांसी की सजा सुनाई है. इस खौफनाक सजा के ऐलान के बाद अब हर किसी के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या इन दोनों के पास अपनी सांसों को बचाने के लिए अभी भी कोई कानूनी दरवाजा खुला है या नहीं.
इलाहाबाद हाईकोर्ट में सजा की स्वतः पुष्टि
कानूनी रूप से यह समझना बेहद जरूरी है कि निचली अदालत द्वारा फांसी की सजा सुनाए जाने का मतलब यह कतई नहीं होता कि दोषियों को तुरंत फंदे पर लटका दिया जाएगा. भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के नियमों के अनुसार, जब भी कोई जिला या सत्र न्यायालय किसी आरोपी को मौत की सजा सुनाता है, तो वह फैसला अपने आप अंतिम नहीं होता. इसके लिए नियम यह है कि सेशन कोर्ट को अपने इस पूरे फैसले और मामले के तमाम दस्तावेजों को अनिवार्य रूप से संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय यानी इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास भेजना होता है. जब तक उच्च न्यायालय इस सजा की पुष्टि नहीं कर देता, तब तक यह आदेश अमल में नहीं लाया जा सकता.
इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील करने का अधिकार
जिला अदालत के इस फैसले के खिलाफ दोषी मुस्कान और साहिल के पास यह पूरा कानूनी हक सुरक्षित है कि वे इलाहाबाद हाईकोर्ट में सजा और दोषसिद्धि को चुनौती दे सकें. हाईकोर्ट के स्तर पर इस पूरे हत्याकांड से जुड़े सभी गवाहों, बयानों, परिस्थितियों और सबूतों की एक बार फिर से बहुत बारीकी से कानूनी और न्यायिक जांच की जाएगी. उच्च न्यायालय के पास यह पूरी ताकत होती है कि वह चाहे तो निचली अदालत के फांसी के इस आदेश को पूरी तरह से रद्द कर सकता है, सजा को उम्रकैद में बदल सकता है या फिर दोषियों को सबूतों के अभाव में बरी भी कर सकता है.
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सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खुला
अगर इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी मुस्कान और साहिल की अपील खारिज हो जाती है और अदालत निचली अदालत की फांसी की सजा को सही ठहराते हुए बरकरार रखती है, तो भी कानूनी रास्ते यहीं खत्म नहीं होते. इसके बाद दोनों दोषियों के पास देश की सर्वोच्च अदालत में जाने का रास्ता खुला रहता है. सुप्रीम कोर्ट में संविधान के तहत विशेष अनुमति याचिका यानी SLP दाखिल करके इस फैसले को चुनौती दी जा सकती है, जहां देश के शीर्ष न्यायधीश पूरे मामले की वैधानिक वैधता की दोबारा समीक्षा करते हैं.
सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका
शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट से भी यदि दोषियों को किसी भी प्रकार की राहत नहीं मिलती और उनकी अपील खारिज हो जाती है, तो उनके पास एक और कानूनी विकल्प बचता है. इस चरण में दोषी उसी अदालत के समक्ष एक रिव्यू पेटिशन यानी पुनर्विचार याचिका दाखिल कर सकते हैं. इस याचिका के माध्यम से वकीलों द्वारा अदालत के सामने यह अपील की जाती है कि फैसले में यदि कोई तकनीकी चूक रह गई है या किसी अहम कानूनी बिंदु पर नजर नहीं पड़ी है, तो अदालत अपने सुनाए गए फैसले पर एक बार फिर से पुनर्विचार करे.
क्यूरेटिव पिटिशन
यह न्यायिक प्रक्रिया का बिल्कुल अंतिम और आखिरी चरण माना जाता है. यदि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषियों की रिव्यू पेटिशन को भी खारिज कर दिया जाता है, तो कानून के जानकारों के मुताबिक क्युरेटिव पिटिशन लगाने का विकल्प बचता है. इस विशेष याचिका के जरिए यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि पूरे मुकदमे की सुनवाई के दौरान प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनदेखी हुई है या कानूनी प्रक्रियाओं का सही ढंग से पालन नहीं किया गया है. कोर्ट इस पर बेहद दुर्लभ मामलों में ही विचार करता है.

राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका
जब अदालतों के सभी दरवाजे पूरी तरह बंद हो जाएं और हर जगह से सजा पर मुहर लग जाए, तब संविधान के तहत आखिरी उम्मीद का रास्ता बचता है. दोनों दोषी देश के राष्ट्रपति के समक्ष अनुच्छेद 72 के तहत अपनी दया याचिका दाखिल कर सकते हैं. भारत के राष्ट्रपति के पास यह असीम संवैधानिक अधिकार होता है कि वे किसी भी अपराधी की मौत की सजा को पूरी तरह से माफ कर सकते हैं या फिर उसे उम्रकैद की सजा में बदल सकते हैं. राष्ट्रपति का यह फैसला पूरी तरह से केंद्र सरकार की सिफारिश और मानवीय पहलुओं पर आधारित होता है.
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