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2003 में बिहार का SIR कितने दिनों में हुआ था पूरा, इस बार के मुकाबले कितना लगा था वक्त?

Bihar Election SIR 2025: बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण चल रहा है. लोगों का कहना है कि इतने कम वक्त में वे कागजात कहां से जुटाएंगे. चलिए जान लेते हैं कि साल 2003 में SIR कितने समय में पूरा हुआ था.

बिहार में इसी साल चुनाव होना है, इसके लिए ज्यादा से ज्यादा दो से तीन महीने का वक्त बचा होगा. इससे पहले भारत निर्वाचन आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानि Special Intensive Revision जिसे SIR कहा जाता है, कराया गया. यह एक महीने तक चला है, जिसको लेकर विपक्ष ने जमकर हंगामा किया. विपक्ष का कहना था कि इतने कम समय में घर-घर पुनरीक्षण कैसे हो सकता है. ऐसे में सवाल है कि क्या जब बिहार में साल 2003 में मतदाता पुनरीक्षण हुआ था, तो उसके लिए कितने दिन का वक्त मिला था. इस बार के मुकाबले वह कितने दिनों में पूरा हुआ था. चलिए समझते हैं.

2003 में किन राज्यों में हुआ था SIR

2002-03 में जब बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पंजाब जैसे सात राज्यों में मतदाता सूची का गहन संशोधन किया गया था, उस वक्त इस पूरी प्रक्रिया के लिए आठ महीने का समय दिया गया था. उस समय मतदाता फोटो पहचान पत्र (EPIC) ही मतदाताओं की पहचान और सत्यापन का मुख्य आधार बताया गया था. इसीलिए तब यह प्रक्रिया ज्यादा समावेशी और आसान थी. आंकड़ों के मुताबिक 2003 की मतदाता सूची में करीब 4.96 करोड़ लोगों को शामिल किया गया था और किसी एक दस्तावेज की अनिवार्यता भी नहीं थी.

2003 में कितने महीने चली थी प्रक्रिया

अब मौजूदा समय की बात करें, तो स्थिति बिल्कुल अलग है. इस बार जिन राज्यों में अक्टूबर-नवंबर 2025 में चुनाव होने हैं, वहां केवल तीन महीने का समय दिया गया है, 25 जून से 30 सितंबर तक. इसीलिए लोगों का कहना है कि बहुत सारे मतदाता अभी भी जरूरी दस्तावेज जुटाने के लिए संघर्ष में जुटे हैं. बिहार में चल रहे एसआईआर में पहले कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाता है, फिर घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन किया जाता है, पात्रता से जुड़े दस्तावेज जमा होते हैं, उसके बाद दावों और आपत्तियों की जांच होती है और आखिर में अंतिम सूची प्रकाशित की जाती है. पहले यह प्रक्रिया 2002-03 में करीब 243 दिनों यानि कि पूरे आठ महीने चली थी.

अभी कितने दिनों में करना है पूरा

अब के समय से तुलना करें तो मौजूदा प्रक्रिया काफी छोटी कर दी गई है, सिर्फ 97 दिनों में सब पूरा करना है. इसमें गणना-पूर्व सर्वेक्षण, कर्मचारियों को प्रशिक्षण, मतदान केंद्रों का युक्तिकरण और घर-घर जाकर गिनती करने के लिए महज एक महीना रखा गया. इसके बाद 1 अगस्त को मसौदा सूची जारी हुई और फिर उसके बाद दावे और आपत्तियों के लिए एक महीने का समय है. इसके बाद उनके निपटारे के लिए सिर्फ 25 दिन. अंत में 1 अक्टूबर को अंतिम सूची जारी करनी होगी, जबकि कुछ ही हफ्तों बाद मतदान की तारीखों का ऐलान होने की संभावना है. ऐसे में यह साफ है कि पहले जिस काम के लिए 8 महीने तक का समय मिलता था, अब वही प्रक्रिया महज 3 महीने में पूरी करनी होगी.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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