Hindu Cerematorium In Pakistan: लाहौर में कैसे होता है हिंदुओं का दाह संस्कार, क्या वहां इसकी नहीं है इजाजत?
Hindu Cerematorium In Pakistan: पाकिस्तान के लाहौर में हिंदु के मरने पर कैसे उसका दाह संस्कार किया जाता है? क्या वहां की सरकार इसकी इजाजत भी देती है?

Hindu Cerematorium In Pakistan: 14 अगस्त के दिन सनी देओल, प्रीति जींटा और शबाना आजमी की फिल्म बंटवारा 1947 रिलीज हो चुकी है. डायरेक्टर राजकुमार संतोषी की यह फिल्म विभाजन के दर्द और लाहौर की पृष्ठभूमि पर आधारित है. फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे विभाजन के बाद लाहौर की एक हवेली में फंसी, एक बुजुर्ग हिंदू महिला को बचाने के लिए एक मुस्लिम परिवार स्थानीय चरमपंथियों के खिलाफ खड़ा हो जाता है.
इस फिल्म के रिलीज होने के बाद सोशल मीडिया पर एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि आज के समय में पाकिस्तान के लाहौर में रहने वाले हिंदुओं की स्थिति क्या है? क्या वहां आज भी हिंदुओं को अपने परिजनों का दाह संस्कार करने की आजादी है या उन्हें इसमें भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है?
क्या दाह संस्कार पर रोक है?
कानूनी रूप से पाकिस्तान या लाहौर में हिंदुओं के दाह संस्कार पर कोई आधिकारिक प्रतिबंध नहीं है. हालांकि, जमीनी हकीकत और कानूनी नियमों में बहुत बड़ा अंतर है. बंटवारे से पहले लाहौर में रावी नदी के तट पर हिंदुओं के कई श्मशान घाट हुआ करते थे, लेकिन 1947 के विभाजन के बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं. अधिकांश हिंदू परिवार भारत आ गए और लाहौर में केवल मुट्ठी भर हिंदू ही बचे. रखरखाव के अभाव में पुराने श्मशान घाट या तो खंडहर हो गए या फिर उन जमीनों पर अवैध कब्जे हो गए.
अंतिम संस्कार के लिए जाना पड़ता है बेहद दूर
लाहौर में रहने वाले हिंदू परिवारों को लंबे समय तक अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. स्थानीय स्तर पर चालू हालत में श्मशान घाट न होने के कारण लाहौर के हिंदुओं और सिखों को शवों को अंतिम संस्कार के लिए वहां से लगभग 75 से 80 किलोमीटर दूर ननकाना साहिब ले जाना पड़ता था. इस यात्रा में न केवल समय लगता है, बल्कि गरीब परिवारों के लिए गाड़ियों और अंतिम संस्कार की सामग्री का खर्च उठाना भी बेहद मुश्किल हो जाता है.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कई बार आर्थिक रूप से कमजोर हिंदू परिवार लंबी दूरी की यात्रा और अंतिम संस्कार का खर्च नहीं उठा पाते. ऐसे में वे पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों के विपरीत जाकर मजबूरी में अपने मृत परिजनों के शवों को लाहौर के ऐतिहासिक मियानी साहिब जैसे कब्रिस्तानों में दफना देते हैं.
यह भी पढ़ेंः पाकिस्तान में कितने का मिलता है प्लेटफॉर्म टिकट, भारत से ज्यादा या कम?
साल 2021 में हुआ बड़ा बदलाव
हिंदू और सिख संगठनों के लंबे संघर्ष के बाद साल 2021 में पाकिस्तान सरकार के इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड ने लाहौर में रावी नदी के किनारे करीब 4.3 एकड़ भूमि पर नया श्मशान घाट और अंतिम संस्कार स्थल तैयार कराया था. यहां शवों को जलाने के साथ-साथ अस्थियों को रावी नदी में विसर्जित करने की व्यवस्था भी की गई. हालांकि, रिपोर्ट्स बताती हैं कि स्थानीय स्तर पर सुविधाओं की कमी और देखरेख के अभाव के कारण आज भी यह श्मशान घाट पूरी तरह से उपयोग में नहीं आ पा रहा है, जिससे अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय को अपनी धार्मिक परंपराओं को निभाने में परेशानियां उठानी पड़ती हैं.
यह भी पढ़ेंः दिल्ली के लाल किले पर ही तिरंगा क्यों फहराया जाता है, आगरा वाले पर क्यों नहीं?























