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NOTA Vote Rules: अगर NOTA को पड़े सबसे ज्यादा वोट तो कौन बनता है विधायक, क्या कैंसिल हो जाता है चुनाव?

NOTA Vote Rules: पश्चिम बंगाल के साथ पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. इसी बीच आइए जानते हैं कि अगर नोटा जीत जाए तो कौन बनता है एमएलए.

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  • NOTA का मतलब 'इनमें से कोई नहीं', असंतुष्टि व्यक्त करने का विकल्प.
  • NOTA को वास्तविक उम्मीदवार नहीं माना जाता, जीत घोषित नहीं होती.
  • NOTA को सर्वाधिक वोट मिलने पर दूसरे नंबर का उम्मीदवार जीतता है.
  • स्थानीय निकाय चुनावों में NOTA बहुमत पर दोबारा चुनाव हो सकते हैं.

NOTA Vote Rules: पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. चुनाव में वोटिंग करते समय ईवीएम पर एक और ऑप्शन देखने को मिलता है जिसे NOTA कहते हैं. NOTA का मतलब होता है इनमें से कोई नहीं. यानी यह लोगों को सभी उम्मीदवारों को खारिज करने की शक्ति देता है. लेकिन क्या होता है अगर नोटा को सच में सबसे ज्यादा वोट मिल जाए?  क्या चुनाव रद्द हो जाता है? आइए जानते हैं इन सवालों के जवाब.

नहीं होती नोटा की जीत 

भारत की चुनाव प्रणाली में नोटा को एक वास्तविक उम्मीदवार के तौर पर नहीं माना जाता. यह वोटर के लिए अपनी असंतुष्टि जाहिर करने का बस एक तरीका है. इसका मतलब है कि भले ही नोटा को सबसे ज्यादा वोट मिल जाएं लेकिन पारंपरिक रूप में इसे चुनावी जीत नहीं मानी जाती.

तो कौन बनता है एमएलए?

भारत के चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक नोटा के लिए डाले गए वोटों को विजेता तय करने के लिए वैध वोटों के तौर पर नहीं गिना जाता. इस वजह से अगर नोटा को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं तो वास्तविक उम्मीदवारों में से जिस उम्मीदवार को दूसरे सबसे ज्यादा वोट मिले होते हैं, उसे विजेता घोषित कर दिया जाता है. आसान शब्दों में कहें तो दूसरे नंबर पर रहने वाला उम्मीदवार एमएलए बन जाता है.

क्या चुनाव रद्द हो जाता है? 

लोकसभा या विधानसभा चुनाव में चुनाव रद्द नहीं होते हैं, भले ही नोटा को सबसे ज्यादा वोट मिले हों.  फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर नोटा के नतीजे के आधार पर किसी चुनाव को अमान्य घोषित करने का कोई भी कानूनी प्रावधान नहीं है. लेकिन एक दिलचस्प अपवाद भी है. महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे कुछ राज्यों में स्थानीय निकाय चुनावों के नियम यह अनुमति देते हैं कि अगर नोटा को बहुमत मिल जाए तो दोबारा चुनाव कराए जाएं.

 क्या है नोटा का मकसद?

नोटा को ऐतिहासिक PUCL बनाम भारत संघ 2013 के फैसले के बाद पेश किया गया था. इसका मकसद वोटरों को अपनी असहमति जाहिर करने का एक जरिया देना है. हालांकि यह सीधे तौर  पर चुनावी नतीजों को नहीं बदलता. लेकिन नोटा का ज्यादा प्रतिशत राजनीतिक दलों को जनता की असंतुष्टि के बारे में एक मजबूत संदेश देता है.

नोटा को लेकर चल रही कानूनी बहस 

यह मुद्दा अभी भी चर्चा में है. 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर जवाब मांगा. याचिका में यह मांग की गई थी कि यदि नोटा को बहुमत मिलता है तो चुनाव रद्द कर दिए जाएं और जिन उम्मीदवारों को अस्वीकार किया गया है उन्हें दोबारा चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए. हालांकि अभी तक इस पर कोई भी फैसला नहीं लिया गया है और मौजूदा नियम कायम हैं.

यह भी पढ़ें:  क्या‌ LPG की तरह‌ PNG का भी किया जा सकता है इंपोर्ट-एक्सपोर्ट, जानें क्या है प्रकिया?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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