अरावली रेंज में कितनी पहाड़ियां, इनमें कितनी 100 मीटर से ऊंची; सुप्रीम आदेश के बाद क्यों गहराया इनके वजूद पर संकट
Aravalli Range Mountains Hill: भारत की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला अरावली की पहाड़ियां आज खुद अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही हैं. 100 मीटर की एक कानूनी परिभाषा ने अरावली के भविष्य को अधर में डाल दिया है.

अरावली की शांति अचानक भयंकर जंग में बदल गई है. एक पुरानी पर्वत श्रृंखला, जो सदियों से हमारे पर्यावरण की ढाल रही है, अब 100 मीटर की ऊंचाई के मानक के नाम पर संकट के घेरे में आ गई है. क्या यह कदम सिर्फ तकनीकी परिभाषा है या हमारी जमीन, पानी, हवा और जीवन की ढाल पर वार? इस सुप्रीम कोर्ट की नई व्याख्या ने पूरे उत्तर भारत की पारिस्थितिकी को हिला कर रख दिया है. आइए जानते हैं.
अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही अरावली
भारत की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखला अरावली, जो सदियों से रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकती आई, आज खुद अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. सवाल यह नहीं कि अरावली कितनी ऊंची है, बल्कि यह है कि क्या सिर्फ ऊंचाई से उसके जीवन, जंगल, जल और भविष्य को मापा जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश ने अरावली की पहचान को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है, और इसी पर टिक गया है इसके संरक्षण या विनाश का फैसला.
सुप्रीम कोर्ट के सामने क्यों उठा अरावली की पहचान का सवाल
अरावली पर्वत शृंखला को लेकर लंबे समय से भ्रम की स्थिति बनी हुई थी कि आखिर किन पहाड़ियों को अरावली माना जाए. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि अलग-अलग राज्य और संस्थाएं अलग मानकों से अरावली को परिभाषित कर रही हैं. कहीं ढलान को आधार बनाया गया, कहीं ऊंचाई को और कहीं दो पहाड़ियों के बीच की दूरी को. यहां तक कि विशेषज्ञ संस्थान भी एकमत नहीं थे. इसी असंगति के कारण अदालत ने स्पष्ट परिभाषा तय करने की जरूरत महसूस की.
एफएसआई के पुराने मानक और नई समिति की रिपोर्ट
2010 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने अरावली की पहचान के लिए तीन शर्तें रखी थीं, जिनमें तीन डिग्री से अधिक ढलान, 100 मीटर से अधिक ऊंचाई और दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर से कम दूरी शामिल थी, लेकिन व्यावहारिक स्तर पर यह मानक कई प्राकृतिक पहाड़ियों को अरावली की परिभाषा से बाहर कर रहे थे. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय, एफएसआई, राज्यों के वन विभाग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और अपनी समिति के प्रतिनिधियों को शामिल कर एक नई समिति बनाई. इस समिति ने 2025 में अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंपी.
100 मीटर की सीमा और उस पर उठे सवाल
20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने समिति की रिपोर्ट स्वीकार करते हुए कहा कि अब केवल 100 मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली पर्वत शृंखला का हिस्सा माना जाएगा. इस फैसले पर कोर्ट द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी के. परमेश्वर ने आपत्ति जताई और इसे अत्यंत संकीर्ण परिभाषा बताया. उनका कहना था कि इससे 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली सभी पहाड़ियां खनन और अन्य गतिविधियों के लिए खुल सकती हैं, जो पूरी शृंखला के पारिस्थितिक संतुलन को तोड़ देगा.
सरकार का पक्ष क्या रहा
सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्य भाटी ने दलील दी कि एफएसआई के पुराने मानक इससे भी ज्यादा बड़े क्षेत्र को अरावली की परिभाषा से बाहर कर देते थे. ऐसे में केवल ऊंचाई आधारित 100 मीटर का मानक तुलनात्मक रूप से अधिक व्यावहारिक और स्पष्ट है. उनका तर्क था कि इससे कानूनी अस्पष्टता कम होगी और संरक्षण से जुड़े फैसलों में एकरूपता आएगी.
कितनी पहाड़ियां 100 मीटर की और राजस्थान पर ज्यादा असर क्यों?
अरावली पर्वत शृंखला का कुल विस्तार 800 किलोमीटर से अधिक है, जिसमें से लगभग 550 किलोमीटर हिस्सा राजस्थान में आता है. सरकारी और तकनीकी अध्ययनों के अनुसार राजस्थान की लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियां 100 मीटर की ऊंचाई की शर्त पूरी नहीं करतीं हैं. इसका सीधा अर्थ यह है कि नई परिभाषा लागू होने पर राज्य की केवल 8 से 10 प्रतिशत पहाड़ियां ही कानूनी रूप से अरावली मानी जाएंगी, जबकि शेष विशाल क्षेत्र संरक्षण कानूनों से बाहर हो सकता है.
सिर्फ पहाड़ नहीं, एक पूरा पारिस्थितिक तंत्र
पर्यावरण विशेषज्ञ लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि अरावली को केवल ऊंचाई के पैमाने से आंकना वैज्ञानिक दृष्टि से खतरनाक है. अरावली भूजल रिचार्ज, जैव विविधता, वन्यजीव गलियारों और जलवायु संतुलन में अहम भूमिका निभाती है. एक बार पहाड़ कटे और प्राकृतिक जलधाराएं टूटीं, तो उन्हें फिर से जीवित करना लगभग असंभव होता है. यही वजह है कि अरावली का संकट केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय भी है.
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Source: IOCL






















