अब नहीं ढलेगा सूरज! अमेरिका के स्पेस मिरर प्रोजेक्ट से दुनिया को कितना नफा कितना नुकसान?
सोचिए एक वक्त ऐसा हो कि जब दुनिया में कभी सूरज ही न ढले तो? सुनने में यह भले ही बड़ा रोमांचक लगता हो, लेकिन इसके पीछे की तैयारी में अरबों रुपये का खर्चा है. साथ ही साथ इसके फायदे से ज्यादा नुकसान हैं.

इंसान ने विज्ञान के दम पर कुदरत के हर नियम को चुनौती दी है और अब बारी बै दिन-रात के चक्र को बदलने की. अमेरिका अंतरिक्ष में एक ऐसे अनोखा सैटेलाइट भेजने की तैयारी कर रहा है, जो रात के वक्त में भी धरती पर दिन जैसा उजाला करेगा. अमेरिका के फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन ने कैलिफोर्निया की एक निजी कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल को इस बेहद हैरान करने वाले प्रोजेक्ट के लिए हरी झंडी दे दी है. इस योजना के तहत अंतरिक्ष से सूरज की रोशनी को सीधे धरती के उन हिस्सों पर मोड़ा जाएगा, जहां अंधेरा होगा. हालांकि, विज्ञान की इस चमत्कारी छलांग ने दुनियाभर के पर्यावरणविद और वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है.
क्या है इयरेंडिल-1 सैटेलाइट का गणित?
कैलिफोर्निया के इस स्टार्टअप ने अपने इस प्रयोग को इयरेंडिल-1 नाम दिया है. इस अनोखे उपग्रह को इसी साल पृथ्वी की सबसे निचली कक्षा में भेजा जाएगा. शुरुआती तौर पर इस सैटेलाइट का आकार एक घरेलू रेफ्रिजरेटर जितनी छोटा होगा, जिसे धरती से करीब 400 मील यानी 640 किलोमीटर की ऊंचाई पर फिट किया जाएगा. अपनी तय जगह पर पहुंचते ही यह सैटेलाइट 60 फीट चौड़ा एक बड़ा चौकोर शीशा खोलेगा. अंतरिक्ष में तैरता यह महा-आईना सूर्य की किरणों को समेटकर धरती के पांच किलोमीटर के घेरे में बेहद सटीक तरीके से फेंकने की ताकत रखता है.
करोड़ों का मुनाफा और बड़ा टारगेट
यह तकनीक जितनी जादुई लगती है, इसका खर्चा भी उतना ही हैरान करने वाला है. कंपनी की योजना इस कृत्रिम रोशनी को किराए पर देने की है. अगर कोई ग्राहक साल भर में कम से कम 1000 घंटे की रोशनी के लिए सौदा करता है, तो उसे हर एक घंटे के उजाले के लिए करीब 5000 डॉलर चुकाने होंगे. यह कंपनी यहीं नहीं रुकने वाली है, उसका लक्ष्य साल 2028 तक 1000 और 2030 तक 50,000 ऐसे सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित करने का है. भविष्य के ये शीशे 180 फीट तक चौड़े होंगे, जिनकी चमक 100 पूर्णिमा के चांद के बराबर होगी.
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इससे कितना होगा फायदा?
इस कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बेन नोवाक ने इस पूरी योजना का एक तगड़ा बिजनेस मॉडल तैयार किया है. कंपनी का असली मकसद रात के वक्त उन लोगों या संस्थाओं को धूप बेचना है, जिनको काम के लिए उजाले की जरूरत है. इस रोशनी का सबसे बड़ा फायदा सौर ऊर्जा बनाने वाले बड़े सोलर फार्म्स को मिलेगा, जो अब रात में भी बिजली पैदा कर सकेंगे. इसके अलावा रात में चलने वाले कंस्ट्रक्शन साइट्स, फसलों की कटाई और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान मलबे में फंसे लोगों को बचाने के लिए भी इस रोशनी का इस्तेमाल किया जाएगा.
इस प्रोजेक्ट को लेकर क्यों चिंता में हैं अंतरिक्ष वैज्ञानिक?
इस प्रोजेक्ट की मंजूरी मिलने के बाद से ही दुनिया भर के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों में गहरी चिंता देखी जा रही है. अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी की नीति निदेशक रूही दलाल ने सरकार को चेतावनी दी है कि यह परियोजना वैज्ञानिकों के हित में नहीं है. ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने के लिए शक्तिशाली दूरबीनों को पूरी तरह अंधेरे आसमान की जरूरत होती है. खगोलशास्त्रियों का यह भी मानना है कि अगर आसमान में हजारों चमकदार शीशे तैरने लगेंगे, तो करोड़ों डॉलर के स्पेस प्रोजेक्ट्स हमेशा के लिए तबाह हो जाएंगे.
जैविक घड़ी और पर्यावरण पर गहरी मार
धरती पर रहने वाले हर जीव की एक प्राकृतिक जैविक घड़ी होती है, जिसे सर्केडियन रिदम कहा जाता है. पेड़-पौधे, इंसान और जानवर सदियों से दिन के उजाले और रात के अंधेरे के हिसाब से जीने के आदी हैं. अगर रात के समय अचानक सूरज जैसा तेज उजाला होने लगेगा, तो इंसानों की नींद का चक्र पूरी तरह से बिगड़ जाएगा. इसके अलावा रात में शिकार करने वाले वन्यजीवों, पक्षियों के प्रवास और पौधों के खिलने की प्राकृतिक प्रक्रिया में भारी व्यवधान आएगा, जो आखिरकार पूरे पर्यावरण को विनाश की तरफ धकेल देगा.
विमानों की उड़ान में हादसों का खतरा
पर्यावरण के साथ-साथ यह तकनीक विमानन क्षेत्र के लिए भी एक बड़ा खतरा पैदा कर सकती है. वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि जब अंतरिक्ष में तैरते हुए ये विशाल शीशे अपनी दिशा बदलेंगे, तो उनसे निकलने वाली अचानक और बेहद तेज चमक आसमान में उड़ रहे वाणिज्यिक विमानों के पायलटों की आंखों को चौंधिया सकती है. अत्यधिक ऊंचाई पर उड़ रहे विमान के चालकों का ध्यान भटकने से हवा में बड़े और भयानक हादसे हो सकते हैं, जिससे सैकड़ों मासूम यात्रियों की जान को सीधा खतरा हो सकता है.
अमेरिका से पहले किसने किया था यह प्रयोग?
हालांकि अंतरिक्ष में आईना लगाने का यह विचार कोई नया नहीं है. साल 1993 में रूस ने भी अपने जनाम्या 2 प्रोजेक्ट के तहत एक 80 फीट चौड़ा शीशा अंतरिक्ष में भेजा था, ताकि साइबेरिया के बर्फीले इलाकों में दिन का उजाला बढ़ाया सके. वह प्रयोग कुछ ही सेकेंड चला और बाद में तकनीकी खराबी के चलते हमेशा के लिए बंद हो गया.
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