गुरुद्वारा साहिब में योग पर बैन क्यों, क्या सिख धर्म के खिलाफ है व्यायाम?
अकाल तख्त ने गुरुद्वारों में योग कक्षाओं पर रोक लगाते हुए साफ किया है कि गुरुद्वारा परिसर केवल आध्यात्मिक भक्ति और गुरबानी के लिए है, योग के लिए नहीं. ऐसे में सवाल है कि क्या सिख धर्म योग के खिलाफ है?

- अकाल तख्त ने गुरुद्वारों के अंदर योग अभ्यास पर रोक लगाई।
- यह निर्णय सिख मर्यादा और अनुशासन के पालन हेतु लिया गया।
- व्यक्तिगत स्तर पर योग या कसरत करने पर कोई मनाही नहीं।
- गुरुद्वारों का मुख्य उद्देश्य गुरबानी, कीर्तन और अरदास है।
सिख धर्म में धर्म और धार्मिक स्थलों की मर्यादा का पालन करना सर्वोपरि माना जाता है. हाल ही में अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार द्वारा गुरुद्वारा परिसरों के अंदर योग अभ्यास सत्र आयोजित करने पर रोक लगाने की घोषणा की गई है. इस फैसले के बाद से ही सिख संगत और आम लोगों के बीच सवाल उठने लगा है कि धार्मिक स्थलों में इस तरह की गतिविधियों को क्यों प्रतिबंधितकिया गया और क्या सिख विचारधारा योग या कसरत के खिलाफ है? आइए जानें कि अकाल तख्त ने ऐसा बैन क्यों लगाया आखिर इसके पीछे का उद्देश्य क्या है.
अकाल तख्त ने क्या कहा?
अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार कुलदीप सिंह गरगज ने गुरुद्वारा साहिबा की सीमा के अंदर योग क्लास चलाने पर सख्त फैसला सुनाया है. उन्होंने दुनिया भर में फैली गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे लंगर हॉल, दीवान हॉल या गुरुद्वारा परिसर के किसी भी हिस्से में योग सत्रों के आयोजन की इजाजत बिल्कुल न दें. यह कदम उन शिकायतों के बाद उथाया गया है, जिनमें कुछ स्थानों पर गुरुद्वारा परिसर का इस्तेमाल योग आसनों के लिए किए जाने पर युवाओं और धार्मिक संस्थाओं ने गहरी आपत्ति दर्ज कराई थी.
तो क्या योग के खिलाफ है सिख धर्म?
धार्मिक नेतृत्व ने यह पूरी बात साफ कर दी है कि सिख मर्यादा में अपने व्यक्तिगत जीवन में सेहत सुधारने या फिस कसरत करने की कोई मनाही नहीं है. जत्थेदार ने यह स्पष्ट किया है कि अगर कोई इंसान अपने घर पर तंदुरुस्त रहने के लिए शारीरिक व्यायाम या फिर योगा करता है, तो उससे किसी को कोई एतराज नहीं है. हालांकि गुरुद्वारा साहिब जैसे पवित्र धर्मिक स्थल के अंदर लोगों से तरह-तरह के शारीरिक आसन करवाना, कपालभाति करना या सांस की कसरत कराना सिख मर्यादा और अनुशासन के कतई अनुकूल नहीं माना जा सकता है.
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सिख धर्म किसी भी रूप में शारीरिक फिटनेस, खेलकूद या तंदरुस्ती का विरोध नहीं करता है. इतिहास गवाह है कि सिख गुरुओं ने स्वयं कुश्ती, अखाड़ों और युद्ध कौशल को बढ़ावा दिया है. कुलदीप सिंह का कहना है कि कोई भी सिख अपने निजी स्तर पर पार्क या घर में जिम, कसरत या योग कर सकता है. लेकिन गुरुद्वारा साहिब का पूरा परिसर केवल संगत, कीर्तन, अरदास और धार्मिक कार्यों के लिए ही आरक्षित है. वहां सांस खींचने-छोड़ने वाली योग क्रियाएं या आधुनिक व्यायाम कक्षाएं चलाना पूरी तरह से अनुचित है.
गुरुद्वारों की स्थापना का मुख्य मकसद
सिख परंपरा के अनुसार गुरुद्वारों की स्थापना का सबसे मुख्य उद्देश्य श्रद्धालुओं को गुरबानी, कीर्तन और परमात्मा के नाम से जोड़ना है. जत्थेदार का कहना है कि एक सिख के जीवन में गुरबानी से बड़ा और कोई स्थान नहीं हो सकता है. दुर्भाग्य से कुछ भोले-भाले सिख गुरुद्वारा परिसर के अंदर ही शारीरिक योग की तरफ आकर्षित होने लगे थे. गुरुघर वह जगह है जहां इंसान अपने मन को ईश्वर के शब्द से जोड़ता है. इसलिए इस स्थान को किसी भी तरह की शारीरिक कसरत या योग क्लास का केंद्र नहीं बनाया जा सकता है.
गुरबानी में क्या है योग का अर्थ?
अकाल तख्त की मानें तो आधुनिक युग में प्रचलित शारीरिक आसनों और प्राचीन आध्यात्मिक योग में बड़ा अंतर है. गुरबानी में जब योग शब्द का इस्तेमाल हुआ तो उसका सीधा अर्थ परमात्मा के साथा जीवात्मा का मिलन यानी आध्यात्मिक जुड़ाव है. इसका संबंध शरीर को अलग-अलग मुद्राओं में मोड़ने या सांसों के कसरत से नहीं जोड़ा जाता है, इसलिए आधुनिक शारीरिक अभ्यास को गुरबानी के आध्यात्मिक योग से जोड़कर भ्रम फैलाना गलत है. सिख दर्शन में नाम जप और प्रभु भक्ति ही ईश्वर से जुड़ने का सच्चा योग माना गया है.

गुरुद्वारों में सिर्फ सिख धर्म से जुड़ी गतिविधियां हों
कार्यवाहक जत्थेदार ने दुनिया भर की प्रबंधकीय समितियों को हिदायत दी है कि जहां भी श्री गुरु ग्रंथ साहिब का पावन प्रकाश है, वहां सिर्फ और सिर्फ सिख मर्यादा से जुड़ी गतिविधियां ही होनी चाहिए. श्री गुरु ग्रंथ साहिब सिखों के प्रत्यक्ष गुरु हैं, इसलिए उनके सामने किसी भी प्रकार की ऐसी गतिविधि नहीं होनी चाहिए जो आध्यात्मिक ध्यान भटकाए. गुरु घर में केवल गुरबानी का पाठ, निष्काम सेवा, कीर्तन और अरदास ही होनी चाहिए. उनका कहना है कि पवित्र स्थलों की मर्यादा बनाए रखना हर सिख की नैतिक और धार्मिक जिम्मेदारी है.
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