पुलिस सिविल ड्रेस में कब कर सकती है कार्रवाई-कब नहीं, क्या है SOP?
Police in Plain Clothes: अक्सर ही लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या पुलिसकर्मी बिना वर्दी कोई कार्रवाई कर सकते हैं. आइए जानते हैं इस सवाल का जवाब.

- फतेहपुर में सादे कपड़ों में पुलिस पर उठे सवाल.
- पुलिस गोपनीय कार्यों, निगरानी हेतु सादे कपड़ों में तैनात.
- सादे कपड़ों में पुलिस संज्ञेय अपराधों में गिरफ्तारी कर सकती.
- सुप्रीम कोर्ट नियम: गिरफ्तारी पर पुलिस पहचान बताना अनिवार्य.
Police in Plain Clothes: उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में जेन अल्फा आंदोलन के नए आरोपों के बाद सादे कपड़ों में पुलिस कर्मियों की भूमिका एक बार फिर से सवालों के घेरे में आ चुकी है. विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे एक छात्र ने इस बात का दावा किया है कि प्रदर्शन के बाद सादे कपड़ों में पुलिसकर्मी उसके घर आए और लोगों से आंदोलन के बारे में पूछताछ की. जंतर-मंतर पर 20 मई को हुए छात्र विरोध प्रदर्शन के बाद भी कुछ ऐसी ही चिंताएं जताई गई थीं. कथित तौर पर वीडियो में कुछ अधिकारी बिना नेम टैग के और कुछ सादे कपड़ों में पुलिस कार्रवाई के दौरान दिखाई दिए थे. इसके बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि पुलिस अधिकारी कब सादे कपड़ों में काम कर सकते हैं और उनकी शक्तियों को कंट्रोल करने वाले नियम क्या हैं?
कब काम कर सकती है पुलिस सादे कपड़ों में?
पुलिस कर्मियों को सादे कपड़ों में काम करने की कानूनी अनुमति तब मिलती है जब उनकी ड्यूटी की प्रकृति के लिए गोपनीयता या फिर निगरानी की जरूरत होती है. विरोध प्रदर्शन, रैलियां, सांप्रदायिक तनाव या फिर कानून व्यवस्था से जुड़ी दूसरी संवेदनशील स्थितियों के दौरान अधिकारियों को खुफिया जानकारी जुटाने, गतिविधि पर नजर रखने और बिना ध्यान खींचे संभावित उपद्रवियों की पहचान करने के लिए सादे कपड़ों में तैनात किया जा सकता है.
ठीक इसी तरह पुलिस अक्सर सादे कपड़ों में अचानक छापेमारी, ट्रैप ऑपरेशन, निगरानी मिशन और संदिग्धों की गिरफ्तारी करती है. ऐसा तब होता है जब उनकी पहचान पहले से पता होने पर ऑपरेशन के विफल होने का खतरा हो. ऐसे मामलों में उद्देश्य खुले तौर पर कानून व्यवस्था लागू करने के बजाय अपराध को रोकना और जानकारी इकट्ठा करना होता है.

सादे कपड़ों वाली पुलिस गिरफ्तारी कर सकती है
वर्दी ना होने से पुलिस अधिकारी का कानूनी अधिकार खत्म नहीं हो जाता. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(1) के तहत एक पुलिस अधिकारी संज्ञेय अपराध में शामिल व्यक्ति को सादे कपड़ों में होने के बावजूद भी गिरफ्तार कर सकता है.
ऐसा तब होता है जब अधिकारी के मौजूदगी में हत्या, डकैती, चोरी या फिर कोई दूसरा गंभीर अपराध किया गया हो या फिर जब गिरफ्तारी के लिए कानूनी आधार मौजूद हों.
पहचान बताना जरूरी
हालांकि पुलिस अधिकारी बिना वर्दी के काम कर सकते हैं लेकिन वे बल प्रयोग करते समय अपनी पहचान नहीं छुपा सकते. अगर सादे कपड़ों में कोई भी पुलिस अधिकारी किसी व्यक्ति को रोकता है, उसकी तलाशी लेता है, हिरासत में लेता है या फिर गिरफ्तार करता है तो उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह बताए कि वह पुलिसकर्मी है और पूछे जाने पर अपना सरकारी पहचान पत्र भी दिखाए.
इसी तरह सादे कपड़ों में पुलिस कर्मियों को अपनी पहचान बताए बिना प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज या फिर बल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. सादे कपड़ों में तैनाती का मकसद खुफिया जानकारी जुटाना और ऑपरेशन में मदद करना होता है ना कि छिपकर बल का इस्तेमाल करना.

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महिलाओं और पहचान से जुड़े नियम
पुलिस की प्रतिक्रिया वही रहती है चाहे अधिकारी वर्दी में हो या फिर सादे कपड़ों में. महिलाओं से जुड़े कानूनी सुरक्षा उपाय हर स्थिति में लागू रहते हैं. आमतौर पर कानूनी रूप से मंजूर हालात को छोड़कर सूरज डूबने और सूरज उगने के बीच किसी भी महिला को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. इसी के साथ जहां कानून जरूरी समझे वहां प्रक्रिया में महिला पुलिस अधिकारी का शामिल होना जरूरी है.
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के तहत पहचान बताना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने बड़े फैसले डी के बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य 1997 में कुछ जरूरी सुरक्षा उपाय तय किए थे. ये आज भी पूरे देश में गिरफ्तारी के मामलों में लागू होते हैं. कोर्ट ने इस बात का निर्देश दिया था कि गिरफ्तारी या फिर पूछताछ करने वाले हर पुलिस अधिकारी की पहचान साफ तौर पर होनी चाहिए. अगर अधिकारी ने वर्दी नहीं पहनी है तो उसे तुरंत अपना सरकारी पहचान पत्र दिखाना होगा. फैसले में गिरफ्तारी के समय अरेस्ट मेमो बनाना भी जरूरी कर दिया गया. जिस पर जहां भी मुमकिन हो किसी गवाह या फिर परिवार के सदस्य के हस्ताक्षर होने चाहिए.
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