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Ali Khamenei Funeral: 4 महीने तक कोल्ड स्टोरेज में रखा रहा खामेनेई का शव, जानिए इस्लाम में क्यों दी गई इतनी ढील?

Ali Khamenei Funeral: ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का अंतिम संस्कार किया जा रहा है. उनकी मौत को 4 महीने हो चुके हैं. जानें क्या इतने लंबे समय तक दफन ना करने की इस्लाम ढील देता है.

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  • ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता खामेनेई का अंतिम संस्कार चार माह बाद हो रहा है।
  • शिया आलिम के अनुसार युद्ध-परिस्थिति में अंतिम संस्कार में देरी जायज।
  • सुरक्षा-चुनौतियों और जनाजे की विशालता से दफन में हुई देरी।
  • खामेनेई की मृत्यु अमेरिकी-इजरायली हवाई हमले में हुई थी।

Ali Khamenei Funeral: ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के लगभग 4 महीने बाद उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा है. 3 जुलाई से 9 जुलाई के बीच उनके जनाजे को अंतिम दफन से पहले ईरान और इराक के कई शहरों में ले जाया जाएगा. इस्लाम में शव को आमतौर पर जल्द से जल्द दफनाने को कहा गया है लेकिन खामेनेई का शव 4 महीनों तक कोल्ड स्टोरेज में रखा रहा. हालांकि इस्लाम शव को जल्द से जल्द दफनाने की शिक्षा देता है लेकिन खामेनेई के शव को 4 महीने दफनाने के ऊपर शिया आलिमों की क्या राय है और क्या इस्लाम इसकी ढील देता है? आइए आपको बताते हैं.

युद्ध के हालात की वजह से देरी हुई 

दिल्ली में अहले बैत ट्रस्ट के अध्यक्ष और अहले बैत पब्लिक स्कूल के संचालक, शिया इस्लाम की गहरी समझ रखने वाले सैयद मोहम्मद अस्करी के मुताबिक जब कोई देश युद्ध जैसे हालातों का सामना कर रहा हो तो दफनाने में देरी हो सकती है. उनका कहना है कि इस्लाम में तुरंत दफनाना बेहतर माना जाता है लेकिन अगर असाधारण हालत की वजह से जनाजा और दफनाने की प्रक्रिया संकट का सामना कर रही हो और सुरक्षा का काफी ज्यादा खतरा हो तो इसे टाला जा सकता है. ऐसा करना कोई गुनाह नहीं होता.

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कर्बला की लड़ाई के बाद की घटना 

सैयद मोहम्मद अस्करी ने 680 ईस्वी में कर्बला की लड़ाई के बाद की घटनाओं का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि हजरत इमाम हुसैन का शव दफनाने से पहले 3 दिनों तक युद्ध के मैदान में रहा था. उनके इस उदाहरण से पता चलता है कि इस्लाम हर हालात में खासकर संघर्ष के समय तुरंत दफनाने को जरूरी नहीं बनाता.

सुरक्षा एक बड़ी चुनौती 

सैयद मोहम्मद अस्करी ने कहा कि अंतिम संस्कार का बड़ा पैमाना भी देरी की एक बड़ी वजह है. यह जनाजा किसी मामूली इंसान का जनाजा नहीं है. ईरान और इराक में जनाजे में करोड़ों शोक मनाने वालों के शामिल होने की उम्मीद है. एक जनाजे के खातिर हजारों लोग मारे जाएं, कब क्या हो जाए कुछ नहीं कह सकते. सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यह एक बड़ी चुनौती बन गई है. 

उन्होंने आगे कहा कि ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच चल रहा संघर्ष सुरक्षा के लिहाज से काफी तनाव पूर्ण है. जंग की परिस्थितियां रही हैं और कौन कब किधर से हमला कर दे इसका कुछ नहीं पता. 

असाधारण स्थितियों में देरी की इजाजत 

सैयद मोहम्मद अस्करी ने बताया कि जब परिस्थितियां असाधारण होती हैं तो दफन की प्रक्रिया को टाला जा सकता है. बाहर के मुल्कों में जब किसी की मौत हो जाती है तब भी होल्ड किया जाता है. अगर किसी व्यक्ति की अपने वतन से दूर, किसी दूसरे देश में मौत हो जाती है तो उसका भी शव वापस मंगाया जाता है और इस काम में दफन की प्रक्रिया में देरी हो सकती है.

क्या कहता है शरियत का कानून 

इसी सवाल पर बात करते हुए ईरान से मौलाना सैयद अन्सार हुसैन नकवी ने कहा कि शरियत में यह है कि जनाजे को जल्द से जल्द दफनाया जाए. लेकिन कभी-कभी कुछ मुश्किलों की बुनियाद पर, कुछ जरूरतों की बुनियाद पर यह होता है कि जनाजे को दफनाने में थोड़ी देरी की जाती है. मिसाल के तौर पर किसी का इंतकाल हो गया. उनका एक जवान लड़का है जो बाहर विदेश में रहता है और अब वह तुरंत नहीं आ सकता. तो कुछ समय तक जनाजे को डिले किया जाता है ताकि उनका इकलौता लड़का जनाजे में पहुंच जाए. कुछ आलिमों का ये भी मानना है कि खामनेई के जनाजे को युद्ध के हालातों में दफन करना भी काफी खतरनाक था क्योंकि किसी भी ओर से अगर हमला होता तो लाखों लोगों की जान जा सकती थी. इस्लाम इंसान की जान को सबसे ज्यादा तवज्जो देता है और जान बचाने के लिए जनाजे और दफन की रस्म को आगे बढ़ाया जाए तो उसमें कोई गुनाह नहीं है.

कब और कैसे हुई खामेनेई की मौत?

अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए एक हवाई हमले में हुई थी. दरअसल अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ एक बड़ा सैन्य ऑपरेशन शुरू किया था. इसके पहले ही दिन तेहरान में खामेनेई के आधिकारिक निवास और दफ्तर को निशाना बनाकर भारी बमबारी की गई थी. इस बमबारी में खामेनेई की मौत हो गई थी.

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स्पर्श गोयल एबीपी लाइव के साथ कंटेंट राइटर के तौर पर जुड़े हुए हैं. वह जनरल नॉलेज बीट की जिम्मेदारी संभालते हैं. कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में उन्हें चार साल का अनुभव है. एबीपी से पहले वह डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद में करीब दो साल तक काम कर चुके हैं. उन्होंने नमस्कार भारत से अपने करियर की शुरुआत की थी. .

वह अलग-अलग विषयों पर रिसर्च करके पाठकों के लिए जानकारी को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण अंदाज में पेश करते हैं. उन्होंने न्यूज राइटिंग के साथ-साथ स्क्रीनराइटिंग में भी अपनी पकड़ मजबूत की.

उन्होंने मां शाकुम्भरी यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है. इसके साथ उन्होंने एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलिविजन से स्क्रीनप्ले का डिप्लोमा भी हासिल किया है.

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