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(Source: ECI/ABP News)

Manipur Violence: हिंसा की आग में क्यों सुलग रहा है पूरा मणिपुर? यहां समझें क्या है पूरा विवाद और इसकी वजह

Manipur Violence: राज्य में हुई इस जबरदस्त हिंसा के बाद मणिपुर के मुख्यमंत्री की तरफ से भी बयान सामने आया. जिसमें उन्होंने कहा कि उपद्रव और हिंसा फैलाने वालों से सख्ती से निपटा जाएगा.

"मेरा राज्य मणिपुर जल रहा है, मदद कीजिए..." ये अपील देश की महिला मुक्केबाज मैरीकॉम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से ट्विटर पर की है. मैरीकॉम ने इसमें जलते हुए मकान और गाड़ियों की तस्वीरें भी पोस्ट की हैं.  मणिपुर में 3 मई को हिंसा कि चिंगारी भड़क गई और इसने आग का रूप लेकर कई घरों को तबाह कर दिया. कई घंटों तक पूरा मणिपुर सुलगता रहा और सुरक्षाबल इस पर काबू पाने के लिए मशक्कत करते रहे. हालात ये हैं कि अब दंगाइयों को देखते ही गोली मारने की आदेश जारी कर दिए गए हैं. मणिपुर के कई जिलों में कर्फ्यू है और इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी गई है. आइए समझते हैं कि ये पूरा विवाद क्या है और क्यों मणिपुर हिंसा की आग में सुलग रहा है. 

शूट एट साइट के ऑर्डर
मणिपुर में हालात कुछ इस तरह बिगड़ चुके हैं कि सेना को फ्लैग मार्च करना पड़ा है, वहीं कलेक्टर को इस बात के अधिकार दे दिए गए हैं कि वो जरूरत पड़ने पर शूट एट साइट का ऑर्डर दे सकते हैं. मणिपुर के इंफाल, चूराचांदपुर, विष्णुपुर और कांगपोकपी जैसे इलाकों में जबदरस्त हिंसा भड़की, जिसके बाद सेना को मौके पर बुलाया गया और अब भी हालात नाजुक बने हुए हैं. 

राज्य में हुई इस जबरदस्त हिंसा के बाद मणिपुर के मुख्यमंत्री की तरफ से भी बयान सामने आया. जिसमें उन्होंने कहा कि उपद्रव और हिंसा फैलाने वालों से सख्ती से निपटा जाएगा. सीएम एन बीरेन सिंह ने कहा, ये सभी घटनाएं समाज के दो वर्गों में हुई गलतफहमी के बाद हुई है. सरकार शांति बहाली की हर कोशिश कर रही है. गृहमंत्री अमित शाह ने भी मणिपुर के सीएम से इस मामले को लेकर बातचीत की. 

कैसे शुरू हुआ मामला?
दरअसल ये पूरा मामला हाईकोर्ट के आदेश के बाद शुरू हुआ. इसके बाद से ही माहौल बिगड़ना शुरू हो गया. 14 अप्रैल को मणिपुर हाईकोर्ट ने मेइती समुदाय के आरक्षण की मांग वाली याचिका पर अपना फैसला सुनाया और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वो केंद्र सरकार से इसकी सिफारिश करे. मेइती समुदाय ने हाईकोर्ट में कहा था कि उनकी परंपरा, संस्कृति और भाषा को बचाने के लिए मेइती समुदाय को एसटी दर्जा दिया जाना चाहिए. 

हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद से ही तमाम आदिवासी समूह विरोध में उतर आए. उनका कहना था कि मेइती समुदाय को एसटी का दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए. कुकी और नागा जनजाति के लोगों ने इस विरोध की शुरुआत की और इसमें उनका साथ तमाम अन्य जनजातियों ने दिया. अब विवाद पर आने से पहले उस समुदाय को भी जानना जरूरी है, जिसके विरोध में तमाम जनजाति के लोग उतर आए हैं. 

क्या है मेइती समुदाय?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक मणिपुर में सबसे ज्यादा आबादी मेइती समुदाय की है. राज्य की आबादी का लगभग 64.6 मेइती समुदाय से है. हालांकि ये समुदाय सिर्फ 10 फीसदी भूभाग पर ही बसा हुआ है. बाकी 90 फीसदी हिस्सा पहाड़ी है, जिसमें राज्य की बाकी बची आबादी रहती है. इसी भूभाग में नागा, कूकी समेत वो सभी जनजातियां रहती हैं, जो मेइती समुदाय के विरोध में उतर आई हैं. 

क्या है समुदाय की मांग
मेतई समुदाय का कहना है कि उनके पास पहले से ही काफी कम भूभाग है, जो लगातार कम हो रहा है. पहाड़ों पर रहने वाले लोग भी इस शहरी इलाके में आ रहे हैं. जिससे जमीनों के दाम बढ़ रहे हैं, जिसे रोकने के लिए कोई भी कानून नहीं है. इसीलिए मेतई समुदाय खुद के लिए विशेष दर्जे की मांग करता आया है. जिसे लेकर उनकी तरफ से हाईकोर्ट का रुख किया गया था और कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया. 

मेइती समुदाय का विरोध क्यो?
वहीं मेतई समुदाय का विरोध करने वाली जनजातियों का पक्ष है कि मेइती एक काफी मजबूत समुदाय है. इसकी जनसंख्या भी सबसे ज्यादा है और ये शहरी इलाकों में रहते हैं. उनका कहना है कि मेइती समुदाय को तमाम वो सुविधाएं मिलती हैं, जो पहाड़ी इलाके में रहने वाले लोगों को नहीं मिल पातीं. मेइती समुदाय पर पहाड़ी इलाकों में घुसपैठ के भी आरोप लगाए जाते हैं. 

लैंड सर्वे को लेकर बवाल
मेतई समुदाय के विरोध के बीच मणिपुर सरकार की तरफ से कराए गए सर्वे ने पहाड़ी जनजातियों को भड़काने का काम किया. मणिपुर सरकार ने पिछले साल एक लैंड सर्वे कराने का फैसला लिया था, जिसके तहत चूराचांदपुर और इसके आसपास के इलाके के लिए हुआ था. इस सर्वे के बाद कुकी समुदाय के कुछ लोगों को कहा गया कि वो रिजर्व फॉरेस्ट में आते हैं और उन्हें वो जगह खाली करनी होगी. इसके बाद ग्रामीण जनजातियों ने इसका विरोध किया और कहा कि उन्हें इसे लेकर कोई भी जानकारी नहीं दी गई.  

ऐसे शुरू हुई हिंसा
इस मुद्दे को लेकर 27 अप्रैल को द इंडीजिनियस ट्राइबल लीडर्स फोरम (ITLF) की तरफ से एक सरकार के खिलाफ 8 घंटे का बंद बुलाया गया था. 28 अप्रैल को सीएम बीरेन सिंह के दौरे से पहले चूराचांदपुर में ये बंद शुरू हुआ. सीएम यहां ओपन जिम का उद्घाटन करने वाले थे. इससे पहले बीरेन सिंह के लिए तैयार मंच को आग के हवाले कर दिया गया. बाद में इलाके में पुलिसबल तैनात हुआ. हालांकि इसके बाद हिंसा रुकने की बजाय और जिलों तक फैलती गई. 

28 अप्रैल को पुलिस की तैनाती के साथ-साथ हिंसक प्रदर्शन बढ़ने लगे, लोगों ने सड़कों पर उतरकर टायर जलाए और जमकर तोड़फोड़ की. इसी रात पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प भी हुई. पुलिस ने बल का इस्तेमाल भी किया. इसके बाद 29 अप्रैल को भी जमकर आगजनी हुई. रातभर कई भवनों को आग के हवाले कर दिया गया. 

छात्र संगठन के मार्च से भड़की हिंसा
करीब तीन दिन तक हुए इस पूरे बवाल को 30 अप्रैल तक कंट्रोल कर लिया गया और पुलिस ने राहत की सांस ली, लेकिन अभी बहुत कुछ होना बाकी था. लोगों के बीच अपने मुद्दों को लेकर आग भड़क रही थी, जिसकी चिंगारी पुलिस और प्रशासन को नहीं दिखी. अबकी बार इस आग की वजह मेतई समुदाय था. 3 मई को छात्र संगठन ऑल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ मणिपुर (ATSUM) ने एक मार्च बुलाया. ये मार्च मेतई समुदाय की मांग और उसे मिलते समर्थन के खिलाफ बुलाया गया. इस मार्च में हजारों लोग पहुंच गए, जिनमें कई जनजातियों के लोग शामिल थे. 

मणिपुर के अलग-अलग जिलों में मेतई समुदाय के खिलाफ ऐसे ही बड़े मार्च निकाले गए. इस दौरान कई जगह से हिंसा की खबरें सामने आईं, लोगों ने जमकर बवाल किया और कई घरों को आग के हवाले कर दिया गया. इसी बीच मेइती समुदाय के लोग भी सड़कों पर उतर आए और दोनों पक्षों के बीच जमकर हिंसक झड़पें हुईं. हिंसा को देखते हुए 8 जिलों में कर्फ्यू लगाने का ऐलान हुआ और सरकार ने उपद्रवियों को गोली मारने के आदेश भी जारी कर दिए. इसके अलावा पूरे मणिपुर में इंटरनेट पर पाबंदी लगा दी गई. फिलहाल हिंसा प्रभावित क्षेत्रों से हजारों लोगों को निकाला गया है और सेना की तैनाती की गई है. 

मुकेश बौड़ाई पिछले 7 साल से पत्रकारिता में काम कर रहे हैं. जिसमें रिपोर्टिंग और डेस्क वर्क शामिल है. नवभारत टाइम्स, एनडीटीवी, दैनिक भास्कर और द क्विंट जैसे संस्थानों में काम कर चुके हैं. फिलहाल एबीपी न्यूज़ वेबसाइट में बतौर चीफ कॉपी एडिटर काम कर रहे हैं.
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