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Naxalbari Review: राजीव खंडेलवाल ने कहानी चुनने में फिर खाया गच्चा, न वेबसीरीज की बनी बात न चला हीरो का जादू

जी5 की वेबसीरीज नक्सलबाड़ी गरीब किसानों और आदिवासियों को बंदूक थमा कर आज के दौर में क्रांति की गुंजाइश तलाश करती है. लेकिन इसकी कहानी न तो जमीनी हकीकत को सही ढंग से दिखाती है और न ही कमजोरों को उनका हक दिलाने के सपने से न्याय कर पाती है. नौ कड़ियों में ख्वाब और हकीकत टूटे-बिखरे से हैं.

रूमानी खयालों में भले ही नक्सलवाद को क्रांति से जोड़ा जाए लेकिन राजनीति इसे बंदूक-खूनखराबे और दहशतगर्दी की पहचान बताती है. कला सिनेमा के दिग्गज और पॉपुलर फिल्मकार रूमानियत और राजनीति को मिला पर्दे पर नक्सलवाद की कहानियां बुनते रहे हैं. बड़े पर्दे पर हजार चौरासी की मां (1998), लाल सलाम (2002), रेड अलर्टः वार विदिन (2010) से लेकर चक्रव्यूह (2012) और बुद्धा इन अ ट्रेफिक जाम (2014) जैसी फिल्में आ चुकी हैं. ओटीटी के नए दौर में अब जी5 नक्सलबाड़ी नाम से वेबसीरीज लाया है. नक्सल-केंद्रित कहानियों की समस्या यह है कि इस किताब के तमाम पन्ने खुले होते हैं. नक्सलियों का परिवेश, संवाद, चिंताएं, संघर्ष, किरदारों के मान-अपमान, उनकी मानसिक बुनावट और घटनाक्रम की गति से आप करीब-करीब वाकिफ होते हैं. नए की गुंजायश यहां नहीं के बराबर होती है. यही नक्सलबाड़ी में भी हुआ.

यहां लीड ऐक्टर राजीव खंडेलवाल एसटीएफ एजेंट राघव बने हैं, जो गढ़चिरौली (महाराष्ट्र) में नक्सलियों से लोहा लेने और उन्हें खत्म करने के मिशन पर है. लेकिन वर्दी वाला आदमी होते हुए भी यहां राघव की लड़ाई कुछ व्यक्तिगत किस्म की हो जाती है. उसके कुछ करीबियों का नक्सलियों से कनेक्शन निकल आता है. वे लोग अपने कारनामों को क्रांति का नाम देते हैं और राघव का फर्ज है कि इन हिंसक तत्वों को खत्म किया जाए. नक्सलबाड़ी किसी भी स्तर पर प्रभावित नहीं करती. नौ कड़ियों में कहानी बिखरी है और अंतिम दो एपिसोड का घटनाक्रम ही थोड़ा रोमांच पैदा करता है. परंतु जब आप उसमें रमने लगते हैं तो मामला पूरा फिल्मी हो जाता है. नक्सलियों का बंधक रहा, उनसे मार खाया हीरो अचानक सुपर हीरो में बदल जाता है और एकाएक सब पर भारी पड़ जाता है. उसकी पिस्तौल से गोलियों की बौछार खत्म ही नहीं होतीं.

Naxalbari Review: राजीव खंडेलवाल ने कहानी चुनने में फिर खाया गच्चा, न वेबसीरीज की बनी बात न चला हीरो का जादू

राजीव खंडेलवाल अक्सर कहानियां चुनने में गच्चा खाते रहे हैं. यहां भी उनका वह रिकॉर्ड बरकरार है. टीवी हीरो के रूप में राजीव भले ही जमे लेकिन फिल्मों में उन्हें सफलता नहीं मिली. अतः नक्सलबाड़ी में भी उनकी फिल्मी हीरो बनने की चाह आखिरी के ऐक्शन दृश्यों में झलकती है, जब वह पूरे मिशन को अकेले ही निबटाने के लिए निकल पड़ते हैं. लेखक-निर्देशक ने दबाव या अन्य वजहों से, जिस तरह क्लाइमेक्स को राजीव-केंद्रित कर दिया, वह हास्यास्पद बन गया है. खंडेलवाल स्क्रीन पर तय नहीं कर पाते कि उन्हें रीयल दिखना है या हीरो. उनका यह भटकाव नक्सलबाड़ी की पूरी नौ कड़ियों में नजर आता है.

इस वेबसीरीज की सबसे कमजोर कड़ी राइटिंग है. ऐसा लगता है कि पहले इसे फिल्म के रूप में सोचा या लिखा गया और फिर वेबसीरीज में ढाल दिया गया. कहानी में लेखक-निर्देशक के पास कहने को कुछ नया नहीं है. गरीबों-आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन पर उद्योगपतियों के कब्जे की साजिश. उनसे राजनेताओं की मिली-भगत. टीचरनुमा एक दाढ़ीवाला नक्सलियों का मार्गदर्शक. लाल झंडे. लाल सलाम. निरपराध और निरीह लोगों का कत्लेआम. फांसी. उनका बदला लेने के लिए नक्सलियों द्वारा पुलिस-नेताओं की हत्याएं. पुलिस-अर्द्धसैनिक बलों और सेना का नक्सलियों के विरुद्ध अभियान. इन बातों के बाद जैसे ही निर्देशक पार्थो मित्रा ने कुछ नया कहने-करने की कोशिश की, कहानी के जंगल में भटक गए. उनके निशाने चूक गए. 2003 में सुपर फ्लॉप फिल्म कोई आप सा (आफताब शिवदासानी, दिपनिता शर्मा, अनीता हसनंदानी) से करिअर की शुरू करने वाले पार्थो मुख्य रूप से टीवी के निर्देशक रहे. उनके खाते में एकमात्र सफल और चर्चित धारावाहिक बड़े अच्छे लगते हैं (सोनी एंटरटेनमेंट पर 2011-2014) है.

Naxalbari Review: राजीव खंडेलवाल ने कहानी चुनने में फिर खाया गच्चा, न वेबसीरीज की बनी बात न चला हीरो का जादू

नक्सलबाड़ी की एक बड़ी कमी यह है कि किसी भी नक्सली का किरदार यहां उभरकर नहीं आता. न कोई लीडर चमकता है और न किसी युवा का आक्रोश असर पैदा करता है. नक्सली बने सत्यदीप मिश्रा, शक्ति आनंद और श्रीजीता डे के रोल राजीव खंडेलवाल को मिले स्पेस के बाद बची खाली जगह को भरने जैसे हैं. आमिर अली जब तक रंग बदलकर कुछ छाप छोड़ सकें, तब तक नक्सलबाड़ी के उजड़ने का वक्त हो जाता है. कमजोर और जानी-पहचानी कहानी की वजह से ख्वाब तो चकनाचूर होते हैं, हकीकत भी बेबस रह जाती है. इन दिनों वेबसीरीज बनाने वाले मान कर चलते हैं कि उनकी कहानी को हाथोंहाथ लिया जाएगा. इसी गलतफहमी में वह क्लाइमेक्स में दूसरे सीजन के दरवाजे-खिड़कियां खोल लेते हैं. ऐसे में वह पहले सीजन से भी न्याय नहीं कर पाते. नक्सलबाड़ी में भी यही हुआ है.

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