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येसुदास: सुरों के सरताज देखेंगे 77वां बसंत

नई दिल्ली: 'गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा', 'सुरमई अंखियों में', 'जब दीप जले आना', 'तुझे गीतों में ढालूंगा', 'चांद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा' जैसे कर्णप्रिय गीत हिंदी सिनेमा को देकर दक्षिण भारत में संगीत सरिता बहा रहे के.जे. येसुदास इस साल 77वां वसंत देखेंगे.

फिल्म 'चितचोर' के लिए गीत गाकर संगीत-प्रेमियों का चित चुराने वाले कट्टास्सेरी जोसेफ येसुदास हिंदी फिल्म संगीत के क्षितिज पर चांद की तरह उभरे और अपनी नायाब मखमली आवाज के कारण आज भी बेजोड़ बने हुए हैं. उन्हें संगीत विरासत में मिला, जिसे उन्होंने न केवल बखूबी संभाला, बल्कि दस कदम आगे तक ले गए. दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक में अपने सुरों की धाक जमाने वाले पाश्र्व गायक येसुदास का जन्म आजादी से पहले 10 जनवरी, 1940 में केरल के कोच्चि शहर में हुआ था. उन्होंने मलयालम, तमिल, कन्नड़, हिंदी सहित कई भाषाओं में गीत गाए हैं. येसुदास के पिता ऑगस्टीन जोसेफ प्रसिद्ध गायक और रंगमंच के अभिनेता थे और येसुदास के गुरु भी. चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े येसुदास ने कम उम्र में संगीत को अपने मन में बसा लिया. उनके कंठ से फूटी संगीत सरिता सरहदों को लांघती चली गई. संगीत की बुनियादी शिक्षा पिता से लेने के बाद येसुदास ने आगे की शिक्षा कोच्चि और चेन्नई में कई बड़े संगीतज्ञों से हासिल की. वह अपनी प्रतिभा को कड़े अनुशासन और प्रतिबद्धता की बदौलत निखारते चले गए. कोच्चि के सेंट सेबास्टियन स्कूल ने उनकी शानदार प्रतिभा को बहुत करीब से देखा है. इस स्कूल में पढ़ाई करते हुए येसुदास शीर्ष गायक रहे और कई पुरस्कार उनकी झोली में आए. विलक्षण प्रतिभा के धनी येसुदास स्कूल से निकलने के बाद त्रिपुरनिथुरा की आरएलवी संगीत अकादमी गानाभूशानम कोर्स करने पहुंचे. सन् 1960 में उन्होंने दो बार पदोन्नति और विशिष्टता के साथ कोर्स पूरा किया. संगीत को अपना सबकुछ सौंप चुके येसुदास उच्च शिक्षा के लिए श्री स्वातिरुनाल अकादमी गए, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वह वहां की पढ़ाई पूरी न कर सके. ..लेकिन वह टूटे नहीं, बल्कि अपनी क्षमता का इनाम उन्हें 1961 में मिला, जब उन्होंने अपना पहला गाना रिकार्ड कराया. यहां से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और मलयालम, कन्नड़, तेलुगू, हिंदी, बांग्ला व गुजराती के अलावा कई अन्य भाषाओं में भी गाए. येसुदास ने एम.जी. रामचंद्रन, एन.टी. रामाराव, अभिताभ बच्चन जैसे नामचीन कलाकारों के लिए अपनी आवाज दी है. येसुदास की प्रतिभा को देखकर 1968 में सोवियत सरकार ने उन्हें आमंत्रित किया था. उस दौरान रूस के रेडियो काजाखिस्तान पर गीत गाकर वह काफी चर्चित भी हुए. गायकी में महारत हासिल करने वाले येसुदास आने वाली पीढ़ी और समाज के लिए भी सोचते हैं. पाश्र्व गायन के लिए केरल सरकार से 23 बार अवार्ड मिलने के बाद येसुदास ने 1987 में राज्य सरकार से गुहार लगाई की वह भविष्य में उन्हें यह अवार्ड न दे. येसुदास का यह कदम आने वाली पीढ़ी को मौका देने के लिए था. 3 सन् 1965 में जब भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ तो येसुदास रिकार्डिग रूम से बाहर निकले और कई जगह गाना गाकर युद्ध के लिए फंड जुटाने लगे. सन् 1971 में भी जब बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजाद कराने के लिए भारत ने युद्ध शुरू किया तो येसुदास सड़कों पर उतर आए और खुले ट्रक में गाने गाते हुए राष्ट्र के लिए एक बार फिर फंड जुटाने लगे. तत्कलीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनका देश-प्रेम देखकर उन्हें सराहा और पुरस्कृत किया था. येसुदास सात बार राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता रहे और 1977 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से अलंकृत किया. बेमिसाल पाश्र्व गायक येसुदास को नए साल और 77वें जन्मदिन की बधाई! यसुदास के बेहतरीन नगमें
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