UPSC Success Story: गरीबी नहीं रोक पाई सपने, दिहाड़ी मजदूर के बेटे ने पहले प्रयास में पास की UPSC परीक्षा
UPSC Success Story: चेन्नई के दिहाड़ी मजदूर के बेटे सुब्रमणिया भारती ने कठिन हालात के बावजूद पहली ही कोशिश में UPSC पास की. आइए जानते हैं उनकी कहानी.

चेन्नई की एक साधारण बस्ती से निकली यह कहानी आज पूरे देश के युवाओं को हिम्मत दे रही है. जहां एक तरफ संसाधनों की कमी थी, वहीं दूसरी तरफ सपनों की कोई कमी नहीं थी. दिहाड़ी पर ईंट बनाने वाले कारखाने में काम करने वाले पिता के बेटे सुब्रमणिया भारती ने पहली ही कोशिश में सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली.
सुब्रमणिया भारती का बचपन तंगी में बीता. घर में ज्यादा सुविधा नहीं थी, लेकिन पढ़ाई के प्रति लगन हमेशा रही. उनके पिता रोज सुबह काम पर निकलते और देर शाम लौटते. मां घर संभालतीं और बेटे को पढ़ने के लिए हौसला देतीं. पैसे कम थे, मगर उम्मीदें बड़ी थीं.
वह बताते हैं कि उन्होंने 18 साल की उम्र में ही तय कर लिया था कि उन्हें सिविल सेवा में जाना है. उस समय उन्हें यह भी ठीक से नहीं पता था कि तैयारी कैसे होती है, किताबें कौन-सी पढ़नी हैं, और रास्ता क्या है.
ये स्कीम आई बेहद काम
यहीं पर तमिलनाडु सरकार की एक योजना ने उनकी राह आसान की. Naan Mudhalvan Scheme ने उन्हें सही दिशा, मार्गदर्शन और संसाधन दिए. इस योजना के तहत उन्हें मेंटर मिले, पढ़ाई का सही तरीका मिला और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए जरूरी सामग्री भी मिली. यह सहारा उनके लिए बहुत बड़ा साबित हुआ.
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क्या कहता हैं सुब्रमणिया भारती?
सुब्रमणिया भारती कहते हैं कि मेरी यात्रा किसी चमत्कार से कम नहीं रही. पहली कोशिश में सफलता मिलना मेरे लिए सपने जैसा है. इस योजना और कोचिंग सेंटर ने मेरी तैयारी में बहुत मदद की. उनके घर का माहौल हमेशा सादा रहा. पढ़ाई के लिए अलग कमरा नहीं था, लेकिन एक कोना था जहां वे देर रात तक पढ़ते. कई बार बिजली चली जाती, तो मोबाइल की रोशनी में पढ़ाई जारी रखते. पड़ोस के शोर के बीच भी ध्यान नहीं टूटता.
माता-पिता का भरोसा बना ताकत
माता-पिता का भरोसा उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बना. पिता ने कभी यह नहीं कहा कि नौकरी कर लो, घर संभालो. उन्होंने हमेशा कहा पढ़ो, आगे बढ़ो, हम साथ हैं. मां हर दिन यही दुआ करतीं कि बेटे का सपना पूरा हो. वे मानते हैं कि यह ऐसा मंच है जहां से गांव, गरीब और जरूरतमंद लोगों की मदद की जा सकती है.
परीक्षा में उन्हें 778वीं रैंक मिली है. वे उन परिवारों के लिए काम करना चाहते हैं, जो उन्हीं की तरह संघर्ष में जीते हैं. रिजल्ट वाले दिन जब सफलता की खबर आई, तो घर में खुशी का माहौल था. पड़ोसी, रिश्तेदार, सभी बधाई देने पहुंचे. पिता की आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर गर्व साफ दिख रहा था. यह खुशी शब्दों में नहीं समा सकती.
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Source: IOCL



























