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IAS Success Story: सिक्योरिटी गार्ड का बेटा, उधार की किताबों से ऐसे बना IAS

उत्तर प्रदेश के शेखपुर गांव के कुलदीप द्विवेदी ने बचपन से ही आर्थिक तंगी का सामना किया लेकिन हिम्मत नहीं हारी, रास्ते की रुकावटों को कभी अपने सफर में बाधा नहीं बनने दिया.

Success Story Of IAS Kuldeep Dwivedi: उत्तर प्रदेश के निगोहा जिले के एक छोटे से गांव शेखपुर के रहने वाले कुलदीप का 6 लोगों का परिवार एक कमरे के घर में बसर करता था. पिताजी सिक्योरिटी गार्ड के पद पर काम करते थे और घर के एकमात्र अर्निंग मेंबर थे. उनकी तनख्वाह से हर महीने बस जैसे-तैसे परिवार का गुजारा होता था. लेकिन कुलदीप के माता-पिता खुद ज्यादा पढ़े न होने के बावजूद पढ़ाई के महत्व को न केवल समझते थे बल्कि दिन-रात अपने बच्चों को पढ़ने के लिये प्रेरित भी करते थे. संसाधन कम थे पर साहस बहुत था. कुलदीप के पिता सूर्यकांत 12वीं पास थे और मां मंजु ने 5वीं में पढ़ाई छोड़ दी थी पर दोनों ने हमेशा अपने बच्चों को यही मंत्र दिया की अगर अपने जीवन को बदलना चाहते हो तो पढ़ाई ही एकमात्र जरिया है.

सरकारी स्कूल से हुयी शुरुआती शिक्षा –

कुलदीप और उनके बाकी भाई-बहन सभी सरकारी स्कूलों में ही पढ़े क्योंकि प्राइवेट स्कूल की फीस भरने की क्षमता उनके पिता की नहीं थी. यही नहीं कुलदीप ने कक्षा एक से लेकर एमए तक की पढ़ाई हिंदी मीडियम में ही की. वे जब अपने कजन्स को इंग्लिश मीडियम प्राइवेट स्कूलों में जाते देखते थे तो उनका भी मन करता था कि वे वहां पढ़ें पर अपने हालात देखकर चुप हो जाते थे. वक्त ने समय से पहले ही समझदार बना दिया था शायद तभी क्लास 7 में ही कुलदीप तय कर चुके थे कि वे बड़े होकर आईएएस ऑफिसर बनेंगे. उस समय किसी को नहीं लगता था कि एक बच्चा अपने लक्ष्य को लेकर इतना सीरियस हो सकता है. खैर कुलदीप ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से हिंदी में बीए और ज्योग्राफी में एमए पास किया. इसके बाद वे जुट गये यूपीएससी की तैयारी में.

दोस्तों की उधार ली किताबों से करी पढ़ाई –

कुलदीप यूपीएससी की तैयारी के लिये दिल्ली शिफ्ट हो गये, वहां उन्होंने एक किराये का कमरा लिया और तैयारी शुरू कर दी. कुलदीप को बहुत कम पैसे में अपना खर्च चलाना होता था, उनके पिताजी उन्हें अधिकतम महीने के 2500 रुपये ही भेज पाते थे. इन्हीं पैसों से कुलदीप कुछ सेविंग्स भी करते थे. नतीजतन रूम में साथ में रहने वाले दोस्त से किताबें उधार लेकर तैयारी करते थे क्योंकि उनका रूम पार्टनर भी यूपीएससी की तैयारी कर रहा था. साल 2014 में कुलदीप ने अपने जोड़े पैसों से रूम पार्टनर के साथ मिलकर एक लैपटॉप खरीदा. इससे पहले वे तैयारी के लिये एक लैपटॉप भी एफॉर्ड नहीं कर सकते थे. खैर जीतोड़ मेहनत के बावजूद कुलदीप पहले दो प्रयासों में सफल नहीं हुये. पहली बार तो उनका प्री में भी नहीं हुआ और दूसरी बार प्री में हुआ पर मेन्स में नहीं. कुलदीप बहुत निराश हो गए क्योंकि उनके पास तैयारी के लिये न पैसे थे और न ही वे किसी दूसरी नौकरी में जाने के लिये और इंतजार कर सकते थे. इस समय किसी भी माध्यम से पैसा कमाना उनके लिये बहुत जरूरी था.

छोड़ी बीएसएफ की नौकरी –

घर के हालातों की वजह से कुलदीप बीच-बीच में दूसरी सरकारी नौकरियों के फॉर्म भी भरा करते थे और इसी बीच साल 2013 में उनका बीएसएफ में असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर चयन हो गया. लेकिन कुलदीप के दिमाग में तो आईएएस घूम रहा था. फैसला कठिन था पर उन्होंने यह नौकरी नहीं करी. इस समय तक कुलदीप के घरवालों को आस-पास वाले जमकर ताना मारने लगे थे. उनका कहना था कि घर के हालात इतने खराब हैं और कुलदीप सालों से पढ़ ही रहे हैं, उन्हें कब का नौकरी शुरू करके घर की मदद करनी चाहिए, ऐसी कौन सी तैयारी कर रहे हैं जो अभी तक कुछ बन नहीं पाये और भी न जाने क्या-क्या. पर कुलदीप के माता-पिता ने कभी किसी की बात से दिल छोटा नहीं किया न ही दिल्ली में रह रहे कुलदीप को यह सब बताया. बल्कि चयन न होने के बावजूद वे हमेशा कुलदीप की हौंसला अफजाई करते रहे कि और मेहनत करो तुम जरूर सफल होगे.

काम आयी मां-बाप की दुआ –

आखिरकार मां-बाप की दुआ और कुलदीप की कड़ी मेहनत सफल हुयी और साल 2015 में 242वीं रैंक के साथ उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली. कुलदीप ने इंडियन रेवेन्यू सर्विसेस को चुना और अपना सालों का सपना साकार कर दिखाया. जब कुलदीप का चयन हुआ तो उनके पिताजी को यह समझाने में आधा घंटा लगा कि आखिर कुलदीप ने क्या हासिल किया है. कमाल होते हैं वे मां-बाप जो ये भी नहीं जानते कि बेटा तैयारी कर किसकी रहा है लेकिन अपना सहयोग देने से कभी पीछे नहीं हटते. सूर्यकांत ने न जाने कितनी बार लोन लिया पर बच्चों से कभी यह नहीं कहा कि पढ़ाई के लिए पैसे नहीं दे पाएंगे. आखिरकार इस परिवार की सालों की मेहनत रंग लायी जब कुलदीप का चुनाव हो गया. कुलदीप ने यह दिखा दिया कि मजबूत इरादों और सच्चे प्रयास के आगे बड़ी से बड़ी परेशानी भी घुटने टेक देती है और हौंसला इतना अटल हो तो आईएएस क्या दुनिया की कोई भी परीक्षा पास की जा सकती है.

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