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स्कूल में बुली करने वाले को मदद की ज्यादा जरूरत है या बुली होने वाले को, क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

Bullying in school: स्कूल में होने वाली बुलिंग कई बार गंभीर रूप ले लेती है. कैसे पहचानें कि आपका बच्चा दूसरे बच्चों को परेशान तो नहीं कर रहा. किस बिहेवियर पर सतर्क हो जाना चाहिए?

Violence And Bullying In School: जब-जब स्कूल में बुलिंग की बात उठती है तो हमारे मन में बुली करने वाले बच्चों के प्रति निगेटिव रिएक्शन आता है. हमें लगता है कि कितने गंदे बच्चे हैं जो दूसरों को परेशान करते हैं. पर सच तो ये है कि इन बच्चों को नफरत या अवहेलना की नहीं बल्कि कम्पेशन और सिम्पथी की ज्यादा जरूरत होती है. कम से कम एक्सपर्ट की राय तो यही कहती है. बुली होने वाले बच्चे तो परेशान होते ही हैं पर जो बुली करते हैं, वे भी अंदर से बहुत परेशान होते है.

घर का वातावरण निभाता है अहम भूमिका

इस बारे में बात करते हुए एजुकेशनल काउंसलर और साइकोलॉजिस्ट डॉ. अमिता बाजपेयी कहती हैं कि बच्चे की परवरिश इसमें अहम भूमिका निभाती है. बुलिंग जैसे कामों में दो तरह के बच्चे ज्यादा इनवॉल्व होते हैं. एक तो वे जिनके यहां एक्सट्रीम स्ट्रिक्नेस होती है और वे अपनी मर्जी से कुछ नहीं कर सकते और दूसरे वो जिनके यहां एक्सट्रीम में लिबर्टी दी जाती है.

एक्सट्रीम हर चीज का खराब है

वे आगे कहती हैं कि जब घर में कुछ करने का, कहने का अपने मन से रहने का मौका ही नहीं मिलता तो ऐसे बच्चे बाहर जाकर अपनी सत्ता स्थापित करना चाहते हैं. ऐसे में वे आसपास वालों पर रौब झाड़ना, उन्हें परेशान करना शुरू कर देते हैं. इसी तरह से ऐसे बच्चे जिनकी हर बात घर में मानी जाती है, कभी किसी गलती के लिए नहीं रोका जाता, उन्हें आदत हो जाती है कि वे हर जगह अपनी चलाते हैं, बॉसी हो जाती हैं. ऐसी कंडीशन में भी वे स्कूल में बुली करने की कोशिश करते हैं.

जो बुली हो रहा है

बुली करने वाले बच्चे की ही तरह बुली होने वाले बच्चे भी एक खास तरह के घरेलू वातावरण से आते हैं. इन बच्चों में आमतौर पर कॉन्फिडेंस की कमी होती, ये कम बोलते हैं या ठीक से अपनी बात रख नहीं पाते. अपने लिए स्टैंड लेना इनके लिए मुश्किल होता है. ये ऐसी फैमिली से हो सकते हैं जहां इन्हें इग्नोर किया जाता है, इनकी बात नहीं सुनी जाती और बोलने का मौका ही नहीं मिलता. बुली करने वाले स्टूडेंट भी इनकी तरह की सॉफ्ट टारगेट तलाशते हैं.

तीसरी पार्टी भी होती है

इन दोनों के अलावा एक तीसरी पार्टी होती है जो ये सब होते देखती है पर बोलती नहीं. इस जगह असली काम शुरू होता है पैरेंट्स, टीचर्स, स्कूल और काउंसलर्स का. स्कूलों के लिए जरूरी है कि वे ऐसी व्यवस्था करें जहां बुलिंग जैसे केस न हों और हों तो उन पर कार्यवाही इतने गुप्त रूप से हो कि बताने वाले बच्चे पर शक न जाए. पैरेंट्स के पास बच्चे की शिकायत पहुंचे तो उसे माइंडफुली हैंडल करें.

क्या है उपाय

बच्चे को काउंसलर के पास ले जाएं और उसकी मेंटल हेल्थ पर काम करें. उसे अच्छा सपोर्टिव और पॉजिटिव एनवायरमेंट दें. नाकि उस पर गुस्सा करने लगें. समस्या की तह तक पहुंचें और बार-बार उसे स्कूल बदलने या स्कूल से निकालने जैसे हल न तलाशें. इससे बच्चे के मन में गुस्सा और बढ़ता है और वो ज्यादा बुली करता है.

जो बुली हो रहे हैं

जिन बच्चों को बुली किया जा रहा है उन्हें बोलना सिखाएं. उनसे ऐसा रिलेशन बनाएं कि वे अपनी बात कहने से डरें नहीं. अगर बच्चे के बिहेवियर में अचानक बदलाव देखें तो उसे नोटिस करें, उस पर काम करें. वो खाना-पीना कम कर दें, स्कूल न जाने के बहाने तलाशे, शरीर में कहीं खरोंच हों, कम बात करे, डरा-डरा रहे तो जानने की कोशिश करें कि समस्या क्या है. इससे पहले की समस्या एक्सट्रीम रूप ले ले उसे काउंसलर के पास ले जाएं.

इस हद तक न पहुंचे बात

ये भी जान लें कि जब बच्चा गुस्से या तैश में आकर एक्सट्रीम हद तक का कोई कदम उठाता है तो वो केवल इसलिए कि उसे लगता है उसकी कोई सुन नहीं रहा. इसलिए बच्चा कुछ कहे तो उस पर ध्यान दें. कई बार जब बुली केसेस में बच्चों की डेथ तक हुई है तो उसके पीछे बच्चे का मकसद किसी की जान लेना नहीं होता बल्कि समस्या से छुटकारा पाना होता है. वे किसी को मारना नहीं चाहते बल्कि अपनी बुलिंग से पीछा छुटाना चाहते हैं और बात यहां तक बढ़ जाती है. 

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