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डरावना खुलासा: बड़े खतरे से घिरे हैं दिल्ली के लाखों बच्चे, 35 फीसदी स्कूलों के पास फायर NOC नहीं

दिल्ली पेरेंट्स एसोसिएशन की तरफ से एक आरटाई दाखिल की गई थी. जिसके जवाब में पता चला है कि राजधानी दिल्ली में 100 में 35 स्कूलों के पास फायर एनओसी ही नहीं है. दिल्ली में करीब 5 हजार 773 सरकारी और गैर सरकारी स्कूल हैं. जिनमें से 2011 स्कूलों की फायर एनओसी एक्सपायर्ड है.

नई दिल्ली: दिल्ली के बड़े स्कूलों में बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है. एक आरटीआई  के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के 35 फीसदी स्कूल आग से निपटने के मानकों पर खरे नहीं हैं. दरअसल एक बार फायर एनओसी लेने के बाद हर तीसरे साल इसे रिन्यू करना जरूरी होता है. यानी दिल्ली के कई स्कूल ऐसे हैं, जिन्होंने 9 साल से फायर एनओसी ही रिन्यू नहीं करवाया है. पूरी दिल्ली में करीब 5 हजार 773 सरकारी और गैर सरकारी स्कूल हैं. जिनमें से 2011 स्कूलों की फायर एनओसी एक्सपायर्ड है.

दिल्ली के किस जोन में कैसे हालात?

आरटीआई के मुताबिक, साउथ दिल्ली में 32 फीसदी स्कूलों के पास आग से निपटने के इंतजाम नहीं हैं. इनके पास फायर एनओसी नहीं है. साउथ वेस्ट दिल्ली के 31 फीसदी स्कूल बिना फायर एनओसी के चल रहे हैं. ईस्ट दिल्ली में 42 फीसदी स्कूलों ने अभी तक फायर एनओसी नहीं लिया है. सेंट्रल दिल्ली के स्कूलों का सबसे बुरा हाला है, जहां 48 फीसदी स्कूल बगैर फायर एनओसी के चल रहे हैं. वेस्ट दिल्ली के 29 फीसदी और नॉर्थ दिल्ली के 30 फीसदी स्कूल बगैर फायर एनओसी के चल रहे हैं.

दिल्ली के मदर्स ग्लोबल स्कूल के डॉयरेक्टर अशोक कुमार जेठी ने खुद माना कि उनके पास फायर एनओसी नहीं है. इसके पीछे दलील दी कि उनके स्कूल में मरम्मत का काम चल रहा है, जिस वजह से उन्होंने फायर एनओसी नहीं ली है. जल्दी इस काम को पूरा करवा कर सर्टिफिकेट ले लिया जाएगा.

दरअसल 9 मीटर से ज्यादा ऊंचे स्कूलों के लिए फायर एनओसी जरूरी है. अगर स्कूल की बिल्डिंग 2 मंजिला या इससे ऊंची है तो भी फायर एनओसी हालिल करनी होगी.

फायर एनओसी हासिल करने के मानक क्या हैं?

  • अगर क्लास में 45 से ज्यादा हैं तो हर क्लास में 2 दरवाजे होंगे.
  • ऊपर जाने के लिए 1.5 मीटर से लंबी सीढ़ी होगी.
  • 300 स्क्वायर मीटर में आग बुझाने के उपकरण लगे हों.
  • बेसमेंट में स्पिंकल का इंतजाम होना चाहिए.
  • आग पर काबू पाने के लिए 5 हजार लीटर की पानी टंकी हो.
  • स्कूल में स्मोक मैनेजमेंट सिस्टम होना चाहिए.
  • स्कूल में लगे बिजली के तार फायर प्रूफ से कवर होने चाहिए.
  • साथ ही बिल्डिंग में एग्जिट का साइन साफ साफ लिखा हो.

इसी साल मई में गुजरात के सूरत जिले में एक कोचिंग सेंटर में आग लगने से 20 से ज्यादा बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई थी. जांच में पता चला कि उस कोचिंग सेंटर में कोई इमरजेंसी एग्जिट प्वाइंट नहीं था. जिसकी वजह से कई बच्चे कोचिंग सेंटर में ही फंस गये थे. लगभग उसी तरह के हाल दिल्ली के कई स्कूलों के है.

कैसे हुआ स्कूलों की लापरवाही का खुलासा?

दरअसल दिल्ली पेरेंट्स एसोसिएशन की तरफ से एक आरटाई दाखिल की थी. इस आरटीआई में जवाब मांगा गया था कि कौन-कौन से स्कूल हैं जो जिनके पास फायर एनओसी नहीं हैं. जिसके जवाब में ये चौंकाने वाली बात सामने आई कि दिल्ली में 100 में 35 स्कूलों के पास फायर एनओसी ही नहीं है.

दिल्ली पेरेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष अपराजिता गौतम का कहना है, ‘’फायर एनओसी एक्सपायर होने से 6 महीने पहले रिन्यू करना पड़ता है. करीब 2 हजार स्कूलों के पास फायर एनओसी नहीं है. यानी 20 लाख बच्चों की जान खतरे में डाली गई है.’’

बच्चों की हितों की रक्षा करने वाले आयोग DCPCR को भी जानकारी नहीं

स्कूल से जुड़े कई विभाग हैं, जिनको इसकी जानकारी ही नहीं थी.  बच्चों की हितों की रक्षा करने वाले आयोग DCPCR के पास भी ये जानकारी नहीं थी कि कितने स्कूलों में फायर एनओसी नहीं है. जबकि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से ये सख्त निर्देश हैं कि जब किसी स्कूल की बिल्डिंग बनेगी तब तक उसका इंस्पेक्शन जरूरी होगा. फायर विभाग के अलावा अन्य एजेंसियां भी इस जांच में शामिल होंगी.

फायर एनओसी को रिन्यू नहीं करने के पीछे क्या वजह है?

फायर एनओसी को रिन्यू नहीं करने के पीछे एक और वजह सामने आई है. पहले स्कूल छोटा होता है तो उन्हें आसानी से एनओसी मिल जाती है. क्योंकि सिंगल फ्लोर के स्कूलों के लिए फायर एनओसी की जरूरत नहीं होती है. लेकिन जैसे जैसे स्कूल का स्ट्रक्चर बड़ा होता जाता है, फायर एनओसी के मानकों के लेकर लापरवाही बरती जाती है.

अब सवाल उठता है कि क्या दिल्ली के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सुरक्षित है और अगर बच्चे स्कूलों में सुरक्षित नहीं हैं तो बच्चों के साथ लापरवाही करने वाले स्कूलों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? क्या स्कूल प्रशासन या दिल्ली सरकार किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है?

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