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CBSE की थ्री लैंग्वेज पॉलिसी पर क्या है स्टूडेंट्स और पैरेंट्स की राय? जान लें उनके 'मन की बात'

CBSE Three Language Policy को लेकर क्या है छात्रों और पैरेंट्स की राय? जानिए 10वीं बोर्ड एग्जाम्स में लागू होने वाले इस 3 भाषा फॉर्मूले पर पब्लिक का रिएक्शन और लेटेस्ट अपडेट.

CBSE की नई थ्री लैंग्वेज पॉलिसी अब देशभर में बड़ी बहस बन चुकी है. कुछ हफ्ते पहले तक यह बदलाव सिर्फ कक्षा 6 के छात्रों तक सीमित माना जा रहा था, लेकिन अब बोर्ड ने कक्षा 9 और 10 के लिए भी नया सर्कुलर जारी कर दिया है. इसके बाद छात्रों, पैरेंट्स और स्कूलों के बीच कई सवाल खड़े हो गए हैं कि क्या बच्चों पर अचानक नया बोझ डाला जा रहा है? क्या सच में भाषा चुनने की आजादी होगी? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या जिन बच्चों ने अभी तक कभी तीसरी भारतीय भाषा नहीं पढ़ी, उन्हें अब अचानक नई भाषा पढ़ने में परेशानी नहीं होगी?

पहले क्या कहा था CBSE ने?

CBSE ने 9 अप्रैल 2026 को पहला बड़ा सर्कुलर जारी किया था, जिसमें academic session 2026-27 से कक्षा 6 में तीसरी भाषा यानी R3 लागू करने की बात कही गई थी. उस समय बोर्ड ने इसे NEP 2020 और NCFSE 2023 के तहत 'फेज़ वाइज़ रोलआउट' बताया था. मतलब शुरुआत केवल कक्षा 6 से होगी और वही बैच आगे बढ़ते हुए 2030-31 तक पूरी तरह नए सिस्टम में पहुंचेगा. उस समय कई रिपोर्ट्स और बोर्ड अधिकारियों के बयानों में साफ कहा गया था कि कक्षा 9 के छात्रों पर अभी यह नियम लागू नहीं होगा. हालांकि, करीब 37 दिन बाद अब CBSE ने नया सर्कुलर जारी कर दिया है, जिसमें कहा गया है कि 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 में भी तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य होगा. यानी अब सिर्फ जूनियर क्लासेज नहीं, बल्कि सेकेंडरी लेवल के छात्रों पर भी यह नियम लागू किया जा रहा है.

क्या इस साल 10वीं बोर्ड देने वाले छात्रों पर भी लागू होगा नियम?

नहीं. अभी जो छात्र 2026 में कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा दे रहे हैं, उन पर यह नया नियम लागू नहीं होगा. यह बदलाव academic session 2026-27 से लागू किया जा रहा है और इसका असर उन छात्रों पर पड़ेगा, जो इस साल जुलाई 2026 से कक्षा 9 में प्रवेश लेंगे. यानी मौजूदा बोर्ड बैच को बीच में भाषा बदलने की जरूरत नहीं होगी, लेकिन जो छात्र अगले सत्र में 9वीं शुरू करेंगे, उन्हें तीन भाषाओं वाला नया सिस्टम अपनाना पड़ेगा.

आखिर नया नियम है क्या?

CBSE के नए नियम के अनुसार छात्रों को R1, R2 और R3 यानी तीन भाषाएं पढ़नी होंगी. इनमें कम से कम दो भाषाएं भारतीय होनी जरूरी है. अगर कोई छात्र French, German या दूसरी विदेशी भाषा पढ़ना चाहता है तो वह तीसरी भाषा के रूप में तभी चुनी जा सकेगी, जब बाकी दो भाषाएं भारतीय हों. CBSE का कहना है कि इसका मकसद भारतीय भाषाओं और बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देना है. बोर्ड फिलहाल 19 भारतीय भाषाओं की किताबें तैयार कर रहा है, जिनमें तमिल, तेलुगु, पंजाबी, बंगाली, गुजराती, मलयालम और मराठी जैसी भाषाएं शामिल हैं. हालांकि, राहत की बात यह है कि तीसरी भाषा यानी R3 की कक्षा 10 में बोर्ड परीक्षा नहीं होगी. उसकी परीक्षा स्कूल स्तर पर होगी और अंक केवल सर्टिफिकेट में दर्ज किए जाएंगे.

अचानक नई भाषा कैसे संभालेंगे बच्चे?

यही सवाल अब सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है. कई पैरेंट्स का कहना है कि जिन बच्चों ने अभी तक French या German पढ़ी है या सिर्फ दो भाषाओं के पैटर्न में पढ़ाई की है, उनके लिए अचानक नई भारतीय भाषा शुरू करना आसान नहीं होगा. खासकर कक्षा 9 में, जब पढ़ाई का दबाव पहले से काफी बढ़ जाता है. दिल्ली पैरेंट्स असोसिएशन की प्रेसिडेंट अपराजिता गौतम ने इस फैसले पर कई सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि समस्या किसी भाषा से नहीं, बल्कि उसे लागू करने के तरीके से है. उनके मुताबिक, 'अगर कोई बदलाव करना है तो पहले तैयारी होनी चाहिए. पैरेंट्स पहले ही किताबें खरीद चुके हैं. बच्चों ने विषय चुन लिए हैं. ऐसे में अचानक नियम बदलना कई परिवारों के लिए परेशानी बढ़ा सकता है. उनका एक और बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े फैसले से पहले पैरेंट्स से राय क्यों नहीं ली गई?'

NEP कुछ कहती है, जमीन पर कुछ और?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति यानी NEP 2020 में साफ लिखा गया है कि किसी भी छात्र पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी. छात्रों को फ्लेक्सिबिलिटी दी जाएगी और वे अपनी पसंद की भाषा चुन सकेंगे. कई पैरेंट्स का कहना है कि जमीनी स्तर पर चीजें अलग दिखाई दे रही हैं. कुछ स्कूल सीधे संस्कृत को R3 बना रहे हैं. वहीं French और German जैसी भाषाओं को धीरे-धीरे हॉबी या अतिरिक्त गतिविधि तक सीमित किया जा रहा है, जिसे 4th Language के रूप में पढ़ाया जाएगा. कई अभिभावकों का दावा है कि उन्हें सही मायने में विकल्प नहीं दिए गए.

पैरेंट्स की राय भी अलग-अलग

इस पूरे मुद्दे पर अभिभावकों की राय एक जैसी नहीं है. द्वारका में रहने वाली अभिभावक दीपाली कहती हैं कि उनका बच्चा French पढ़ रहा था और उससे इंटरनेशनल एक्सपोजर मिल रहा था. उनके मुताबिक, आज के समय में ग्लोबल लैंग्वेज सीखना जरूरी है, क्योंकि आगे पढ़ाई और करियर के कई मौके उससे जुड़े होते हैं. अब उन्हें डर है कि बच्चे को अलग से ट्यूशन लगवानी पड़ेगी. वहीं, ईस्ट दिल्ली के एक निजी स्कूल की अभिभावक ममता कहती हैं कि उन्होंने अपने बच्चे को दूसरी भाषा के रूप में संस्कृत दिलवाई है, क्योंकि वह खुद उस भाषा में मदद कर सकती हैं. हालांकि उनका बच्चा अभी इस बदलाव के साथ पूरी तरह सहज नहीं है. 

एक अन्य पैरेंट मीनू का कहना है कि उन्होंने अपने बच्चे के लिए French इसलिए चुनी थी, क्योंकि वह इंटरनेशनल माहौल में पढ़ता है . उसके स्कूल का नाम भी इंटरनेशनल है और आगे विदेश में पढ़ाई की संभावना भी है.  उनके मुताबिक, अगर दो भारतीय भाषाएं पढ़ाई जानी हैं तो वह हिंदी और दूसरी संस्कृत चुनेंगी, लेकिन इंग्लिश के साथ-साथ जर्मन का ट्यूशन भी बच्चे को पढ़ाएंगी.

स्कूलों के सामने भी तैयारी की चुनौती

CBSE ने स्कूलों को 30 जून 2026 तक OASIS पोर्टल पर अपनी तीसरी भाषा की जानकारी अपडेट करने को कहा है. जिन स्कूलों में भाषा शिक्षक नहीं हैं, वहां ऑनलाइन क्लास, हाइब्रिड सिस्टम या रिटायर्ड शिक्षकों की मदद लेने की इजाजत दी गई है. हालांकि, सवाल यह भी है कि क्या देशभर के सभी स्कूल इतनी जल्दी तैयार हो पाएंगे? कई स्कूलों में पहले से भाषा शिक्षकों की कमी है. ऐसे में नई भाषा लागू करना सिर्फ बच्चों के लिए नहीं, बल्कि स्कूलों के लिए भी बड़ी चुनौती बन सकता है. 

अब आगे क्या?

CBSE का कहना है कि इस बदलाव का मकसद बच्चों पर बोझ डालना नहीं बल्कि उन्हें बहुभाषी बनाना है. फिलहाल सबसे बड़े सवाल यही हैं.

  • क्या यह बदलाव शिक्षा को बेहतर बनाएगा?
  • क्या बच्चों को सच में भाषा चुनने की आजादी मिलेगी?
  • या फिर यह धीरे-धीरे नया अकादमिक दबाव बन जाएगा?

इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में स्कूलों और CBSE के अगले कदम तय करेंगे. 

ये भी पढ़ें: CBSE ने बदला 9वीं-10वीं क्लास का लैंग्वेज स्कीम, अब दो भारतीय भाषाएं पढ़ना होगा जरूरी

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