सस्ते होंगे घर के इलेक्ट्रॉनिक सामान, कॉपर पर GST घटाएगी सरकार?
भारत के कॉपर उत्पादक रिकॉर्ड कीमतों के बीच सरकार से जीएसटी घटाने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि टैक्स घटने से कारोबार में फंसी अरबों डॉलर की पूंजी मुक्त होगी और उद्योग को विस्तार के लिए धन मिलेगा.

कॅापर कि कीमतों में लगातार तेजी ने भारतीय उद्योग के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी गई है. धातु महंगी होने के साथ ही कारोबार में इस्तेमाल होने वाली वर्किंग केपिटल की जरूरत भी बढ़ गई है. इसी के चलते कॅापर उत्पादकों ने सरकार के सामने टैक्स से जुड़ी एक बढ़ी मांग सामने रखी है.
इंडियन प्राइमरी कॅापर प्रोडयूसर्से एसोसिएशन सरकार से कॅापर के कुछ उत्पादों पर GST की दर 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत करने की मांग रखी गई है. एसोसिएशन के अध्यक्ष रोहित पाठक का कहना है कि ऐसा होने पर टैक्स के तौर पर फंसी करीब 3.6 अरब डॅालर तक कि पूंजी कारोबार में वापस आ सकती है.
उद्योग ने क्या कहा?
उद्योग का यह कहना है कि मौजूदा टैक्स व्यवस्था में कॅापर की खरीदारी और प्रोसेसिंग के दौरान बढ़ी रकम पहले ही टैक्स भुगतान में चली जाती है. कीमतों के बढ़ने के साथ-साथ रकम में भी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. जिसके चलते कंपनी के पास कारोबार और विस्तार के लिए उपलब्ध पूंजी पर दबाव पड़ रहा है.
कॅपर की कीमत पहुंची रिकोर्ड स्तर पर
बताया जा रहा है कि इस साल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कॅापर की कीमतों में भी जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है. सितंबर के महीने में लंदन मेटल एक्सचेंज पर इसकी कीमत 14,700 डॅालर प्रति टन से ऊपर पहुंच गई है. बढ़ती कॅापर की कीमतों के कारण भारत में कॅापर से जुड़े कारोबार और निर्माताओं की लागत पर भी असर देखने को मिल रहा है.
देखा जाए तो भारत पहले की तुलना में कॅापर आयत पर ज्यादा निर्भर है. साल 2018 में वेदांता के स्टरलाइट स्मेल्टर के बंद होने के बाद घरेलू स्पलाई पर इसका असर पड़ा और आयात की भूमिका बढ़ी है.
कंपनियों के लिए बढ़ी वर्किंग कैपिटल की जरूरत
कॉपर उत्पादकों के अलावा केबल बनाने वाली कंपनियां और डीलर्स भी महंगी कीमतों से प्रभावित हो रहे हैं. कीमतों में तेजी के कारण कारोबार पहले की तरह लंबे समय तक स्टॉक रखने से बच रहे हैं. एसोसिएशन के अनुसार, कई जगह इन्वेंट्री अब हफ्तों के बजाय कुछ दिनों के हिसाब से रखी जा रही है.
उद्योग का कहना है कि GST में कमी से फंसी हुई पूंजी को कारोबार में दोबारा लगाया जा सकेगा. इससे कंपनियों को अपनी मौजूदा जरूरतें पूरी करने के साथ नए निवेश और विस्तार की योजनाओं के लिए भी अधिक वित्तीय गुंजाइश मिल सकती है.
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