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योगी के विकास मॉडल को चुनौती नहीं दे पा रहे अखिलेश यादव, इसलिए भड़का रहे जातिगत सेंटिमेंट

बिहार के बाद अब उत्तर प्रदेश में जातिगत जनगणना की मांग जोर पकड़ रही है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जातिगत जनगणना की मांग करते हुए अपने सभी सांसदों और विधायकों से कहा कि वे गांव-गांव जाकर इसके पक्ष में माहौल बनाएं. अखिलेश यादव के इस निर्देश पर अब समाजवादी पार्टी के सांसद और विधायक गांवों में जाकर इसके फायदे के बारे में लोगों को बताएंगे. लेकिन सवाल उठ रहा है कि नीतीश कुमार के बाद अखिलेश यादव क्यों ऐसा कर रहे हैं. दरअसल, जातिगत जनगणना पहली बार 1931 में हुआ था. इसके बाद फिर 2011 में हुआ था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने जो हलफनामा दिया उसमें उसने कहा कि जातिगत जनगणना कराना मुश्किल और पेचीदा काम है. इसके लिए अलग से विभाग बनाना होता है और कर्मियों को कम से कम एक हफ्ते की ट्रेनिंग दी जाती है.

सरकार ने ये भी कहा कि जातीय जनगणना कराने से समाज में दुराव भी बढ़ता है. केंद्र ने कहा कि यह पॉलिसी मैटर है और कोर्ट का यह काम नहीं है कि वो पॉलिसी मैटर पर सरकार को निर्देश दे. लेकिन दूसरी तरफ देखिये जैसे बिहार में जातीय जनगणना का काम नीतीश सरकार ने शुरू करा दिया...जो लोग जातिगत जनगणना की वकालत कर रहे हैं, उनका तर्क ये है कि जनगणना कराने से हमें ये पता चलेगा कि सामाजिक न्याय और आरक्षण का लाभ ओबीसी और खास करके इसमें जो छोटे-छोटे कास्ट हैं वो उन तक लाभ पहुंच रहा है कि नहीं क्योंकि जो क्लास बेस्ड सोसाइटी की बात करते हैं या क्लासलेस और कास्ट लेस सोसाइटी की बात करते हैं ये तभी मुमकिन है जब ऊपर से लेकर नीचे की जाति तक या ये कहे की समाज के हर वर्ग में बराबरी और समरसता आ जाए. 

जातिगत गणना से ही ये पता चल सकता है कि कौन सा वर्ग अभी तक इसके लाभ से अछूता है क्योंकि ओबीसी के अंदर भी जो बड़ी जातियां हैं जैसे की यादव और राजभर हैं तो इनको जो सुविधाएं मिल रही हैं वो सुविधाएं इनसे नीचे की जातियों को मिल रही हैं या नहीं. जहां तक बात यूपी की है तो वहां जो छोटी जातियों में जैसे धारू है, चेरू, कोल आदि हैं तो इनको आरक्षणा का लाभ कहां तक मिला है ये कैसे पता चलेगा.

जातिगत गणना का मकसद केवल वोटों की राजनीति 

2011 के जातिगत गणना को लेकर केंद्र सरकार का मानना है कि उसमें काफी गलतिया हैं इसलिए उसको हम मान्य नहीं कर सकते हैं. लेकिन फिर भी उसी गणना के हिसाब से यूपी में 40 प्रतिशत आबादी ओबीसी वर्ग है और 20 प्रतिशत दलित हैं, 20 प्रतिशत में ब्राह्मण, बनिया, भूमिहार और त्यागी हैं और बाकी बचे 20 प्रतिशत में मुसलमान हैं...तो ये जो बात कर रहे हैं कि जातिगत गणना की खास करके वो पार्टियां जो समाजवादी आंदोलन से निकली हैं और जो राम मनोहर लोहिया या आचार्य कृपलानी की सियासत को आगे बढ़ाने वाले हैं जैसे बिहार में नीतीश कुमार, लालू-यादव यूपी में मुलायम सिंह यादव रहे, हरियाणा में चौधरी देवी लाल रहे ये लोग जातिगत गणना की बात करते रहे हैं. 

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी इसकी बात करते रहे हैं चूंकि उनके पिता बीजू पटनायक भी बहुत बड़े समाजवादी नेता रहे थे. तो आज के समय में जो इनके पदचिन्हों पर चलते हुए इसकी वकालत कर रहे हैं उनका मकसद केवल वोटों की राजनीति करना है. हालांकि इनका कहना ये है कि हम देखना चाहते हैं कि छोटी-छोटी जातियों तक आरक्षण और सामाजिक न्याय का लाभ पहुंचा है या नहीं और जब उन तक इसका लाभ पहुंच जाएगा तो हम एक क्लासलेस सोसायटी की बात कर सकते हैं. वर्णहीन व्यवस्था की बात कर सकते हैं.

विपक्ष ओबीसी को भाजपा के विकास मॉडल से दूर करने की कोशिश कर रहा

जब वीपी सिंह का दौर था तब उन्होंने आरक्षण लागू किया था और उसका भयानक परिणाम भी हुआ था. दिल्ली विश्वविद्यालय में एक छात्र ने आत्मदाह कर लिया था. बिहार में जब 1977 में कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने थे, उन्होंने मंडल कमीशन की सिफारिश पर आरक्षण लागू किया था. देखिए, अभी मोदी जी की नेतृत्व में जो भाजपा सरकार है उसकी जो रणनीति है वो ये कि हम हिन्दुत्व के साथ-साथ विकास और सामाजिक कल्याण की बात करेंगे और उनकी पार्टी का भी नारा है 'सबका साथ-सबका विकास', और यूपी में इसका साफ तौर पर उन्हें फायदा भी हुआ है. 

योगी सरकार ने जो गरीबों को वहां फ्री का राशन दिया तो उन्होंने जातिगत व्यवस्था से ऊपर उठकर उन्हें वोट दिया क्योंकि उन्हें 20 किलो राशन मिला है. इससे भाजपा ने अपना 15 प्रतिशत वोट बैंक का बेस तैयार किया और 15 से 20 प्रतिशत के ऊपर जो सोशल वेलफेयर का जो प्रोग्राम है, विकास है जैसे हिंसा और क्राईम पर योगी जी ने रोक लगाई. अभी भी जो घटना हुई प्रयागराज में उसमें भी कल एक एनकाऊंटर में आरोपित मारा गया और उन्होंने विधानसभा में कार्रवाई करने की बात कही थी...

कानून व्यवस्था को उन्होंने दुरुस्त किया है. बिजली रह रही है, सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है और साथ में गरीबों को फ्री राशन भी मिल रहा है...तो हिंदुत्व प्लस विकास और सोशल डेवलपमेंट प्रोग्राम को मिलाकर भाजपा ने अपना लगभग 40 प्रतिशत से ऊपर का वोट बैंक तैयार किया है. अब विपक्षी पार्टियों जैसे अखिलेश यादव के पास दिक्कत ये है कि वो इस वोट बैंक को तोड़े कैसे. चूंकि वीपी सिंह के समय में आरक्षण लाया गया और मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया. इसके बाद आडवाणी जी ने रथ यात्रा निकाली तो मंडल पर कमंडल भारी पड़ गया...तो आज के समय में विपक्षी पार्टियां ये देख रही हैं कि हम ओबीसी को सिर्फ आरक्षण और रोजगार के बहाने अपने साथ जोड़कर नहीं रख सकते हैं क्योंकि वे विकास के मुद्दे पर भाजपा के साथ हैं.

हिन्दुत्व के अंदर बांटकर अलग पंथ बनाने की कोशिश

ओबीसी को अपने पक्ष में करने के लिए उन्होंने जातीय जनगणना जैसे संवेदनशील मुद्दे को छेड़ दिया है. चूंकि जातिगत जनगणना कराने बाद ये मुमकिन है कि जातिगत कलेश की भावना भड़केगी क्योंकि वो उस सेंटिमेंट को जगा रहे हैं और वे इसके जरिये हिन्दुत्व के अंदर भी इनको बांटना चाहते हैं. वो मनुवाद पर भी सवाल उठा रहे हैं जैसे सपा एमएलसी स्वामी प्रसाद मौर्य ने रामचरितमानस पर सवाल उठाया. और हिन्दुत्व के अंदर जो अंबेडकरवादी हैं जिन्होंने हिन्दू मजहब के ऊपर सवाल उठाया तो बहुत सारे नेता जो हैं उनकी भाषा बोल रहे हैं. ये एक कोशिश है कि हम हिन्दू धर्म के अंदर ओबीसी को बांट कर एक अलग पंथ चलाएं जैसे की पंजाब में हुआ रविदासी जोकि एक अलग पंथ हो गया. या मुंडा जो आदिवासी हैं झारखंड में वो सरना धर्म की बात करते हैं. 

कर्नाटक में आप लिंगायत समुदाय के लोगों का मानना है कि हम हिंदू नहीं हैं हम एक अलग पंथ हैं...तो मुझे लगता है कि इसी पैटर्न पर बैकवर्ड कास्ट के जो नेता हैं वो चाहते हैं कि आने वाले चुनाव में ओबीसी वर्ग को जातिगत गणना के नाम पर उनके सेंटीमेंट को भड़काया जाए और फिर उसके साथ ये पहचान किया जाए कि आप एक प्योर हिंदू नहीं हैं बल्कि आप उनके एक सब कल्ट हैं जैसे की रविदास हैं या सरना हैं...ये सभी इस रास्ते पर जा सकते हैं जैसा कि मेरा आकलन है और तभी ये भाजपा को 2024 के लोकसभा के चुनाव में चुनौती दे सकते हैं, अगर वे इस सेंटिमेंट को जगा पाने में सफल होते हैं तब..लेकिन सरकार को भी ये देखना होगा कि अगर हम कास्टलेस सोसायटी की बात कर रहे हैं तो भारतीय जेलों में जो जातिगत व्यवस्था हो उसको समाप्त कर देना चाहिए. राजस्थान सरकार ने ऐसा किया है. लेकिन बिहार और यूपी में देखेंगे तो पाएंगे की जेलों के अंदर जो खाना बनता है वो जातिगत व्यवस्था के हिसाब से बनता है और ये जेल मैनुअल में है और इसमें अभीतक तब्दिली नहीं की गई है..तो इसे भी देखना चाहिए.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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