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भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बचाने और बढ़ाने का समय, विस्तार के लिए नए नजरिए की जरूरत

दुनिया के कई देश आर्थिक मंदी से जूझ रहे हैं. कोविड-19 महामारी के प्रभाव अभी तक मौजूद हैं और यूक्रेन पर रूस के हमले की वजह से ऊर्जा एवं खाद्य आपूर्ति का संकट भी बना हुआ है. विश्व की कई बड़ी एजेंसियां कह रही हैं कि भारत मंदी के चपेट में नहीं आएगा.

हालाँकि ग्रामीण भारत में रोजमर्रा के इस्तेमाल के उत्पादों (एफएमसीजी) की खपत में लगातार छह तिमाहियों तक गिरावट देखी गई है. इसका प्रमुख कारण लोगों का रोजगार है. वर्तमान में ग्रामीण बाजार की एफएमसीजी उत्पादों की बिक्री में लगभग 35 प्रतिशत हिस्सेदारी है. गांवों को आत्मनिर्भर बनाकर ही भारत को आत्मनिर्भर बनाने की शुरुआत हो सकती है. नीति निर्माताओं को इन मुद्दों पर विशेष ध्यान देना चाहिए.

प्रवासी मजदूर चाहे किसी भी राज्य के हों, लेकिन इन सबकी समस्याएं एक हैं. वे महामारी से होने वाले विध्वंस के कारण पिछले तीन साल से अनियमित रोजगार के साथ जी रहे हैं. जबकि इन मज़दूरों के पैसों पर ही उनके गांव के परिजन भी बहुत हद तक निर्भर हैं. ये प्रवासी मजदूर भी अब ये अनुभव कर रहे हैं कि "अब मैं राशन की क़तारों में नज़र आता हूँ! अपने खेतों से बिछड़ने की सज़ा पाता हूँ!!"

क्रिफ हाई मार्क कंपनी ने भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के साथ मिलकर तैयार अपनी रिपोर्ट में ये बताया है कि ग्रामीण ऋणों के, गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) में तब्दील होने की दर बढ़ी है.

''भारत ग्रामों में निवास करता है. भारत को जानना है तो गांव को जानना पड़ेगा.'' स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी यह बात प्रासंगिक है.

कृषि भारत की मूल संस्कृति है. भारतीय राजनीति में खेती-किसानी और गरीबों का मुद्दा सबसे प्रमुख है. भारतीय आबादी का लगभग 45% कृषि और संबद्ध उत्पादों में कार्यरत है और दो-तिहाई जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है. फिर भी कार्यबल जनसंख्या के हिसाब से जीडीपी में कृषि का योगदान काफी कम, लगभग 18% है, जिससे प्रति व्यक्ति आय भी बहुत कम हो जाती है.

आज भी देश का एक बड़ा इलाका अगर इस आपदा से बचा है, तो वह ग्रामीण इलाका है. कृषि क्षेत्र आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है. कोविड और वैश्विक मंदी के समय में ग्रामीण भारत, अर्थव्यवस्था की गाड़ी को खींचता हुआ दिखाई दे रहा है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था किस तरह बचेगी और बढ़ेगी यह सवाल हमारे लिए तात्कालिक महत्व का है.

वंचितों को थोड़ी मात्रा में धन वितरित करना अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा. हमें ग्रामीण बुनियादी ढ़ाचे को मजबूत करने के लिए बड़ी और समावेशी वित्तीय खर्च और सुदृढ़ योजना की दरकार है. भारत को अपने सामाजिक-आर्थिक ढांचे को फिर से तैयार करने की आवश्यकता है और इस पुनर्गठन के प्रमुख तत्व कृषि और प्रवासी मजदूर हैं.

ग्रांट थॉर्नटन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास ग्रामीण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अवसरों का एक विशाल क्षेत्र है. कृषि को मजबूत करने के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अतिरिक्त मज़दूरों के लिए गैर-कृषि रोज़गार के मौके बढ़ाने की जरूरत है और जो स्किल इंडिया और शिक्षा के अधिकार की पहल से ही सम्भव है.

कोरोना ने कृषि स्टार्ट-अप के नवीन विचार को पंख लगा दिए हैं. मानव पूंजी को ज्ञान और कौशल से सशक्त करना होगा. श्रम-उन्मुख रोजगार सृजन के बजाय, मनरेगा को ज्ञान आधारित रोजगार सृजन को बढ़ावा देना चाहिए, जिसका अर्थ यह है कि किसानों को प्रौद्योगिकी के बारे में सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. हमारे नीति निर्माताओं को ग्रामीण कार्यबल को मजदूरों के रूप में देखने के बजाय, एक प्रमुख मानव संसाधन के रूप में देखना चाहिए.

ग्रामीण क्षेत्रों में विकास, कृषि आधारित औद्योगीकरण द्वारा संचालित होना चाहिए. गांवों के जीवन और अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए खेत से बाजार की पहुँच, उपज के लिए स्टोर और वितरण की परतों को कम करना इत्यादि आवश्यक बिंदु हैं. किसानों और फसल वैज्ञानिकों के बीच ज्ञान की विशाल खाई को पाटना होगा. किसानों को सूक्ष्म सिंचाई, सूक्ष्म प्रवर्धन, नवीनतम कृषि प्रौद्योगिकी, उर्वरकों के स्मार्ट उपयोग, फसल चक्र की बेहतर समझ आदि पर प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.

गैर सरकारी संगठन व फार्मर प्रोडूसर्स आर्गेनाइजेशन (FPO) को बिजनेस स्कूलों के साथ गठजोड़ कर के एक मजबूत उद्यमशीलता पारिस्थितिकी तंत्र विकसित किया जा सकता है जिससे एक जीवंत ग्रामीण अर्थव्यवस्था का निर्माण हो सकेगा और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा. हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि जैव प्रौद्योगिकी पर ध्यान देने की आवश्यकता है.

भूमि और श्रम कानूनों में सुधार करके एक सक्षम कारोबारी माहौल तैयार किया जा सकता है. साथ ही आईसीटी का उपयोग करने की आवश्यकता है, यह उत्पाद-सेवाओं और वित्त तक पहुंच में बड़ा उपकरण साबित होगा. पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प दुनिया भर में मशहूर है, जिसमें 65% से अधिक अमेरिका और यूरोप को निर्यात होता है. हाथ से बने साबुन, लकड़ी के खिलौने और बांस के उत्पाद घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी मांग में हैं, इसके साथ ही उत्पादों की ब्रांडिंग और पैकेजिंग पर भी विशेष ध्यान दिया जाय. ग्रामीण उत्पादों को बाजार मुहैया कराने के लिए रूरल लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा देना होगा.

ग्रामीण भारत में कृषि के अलावा आजीविका के प्रमुख स्रोत के रूप में, सौर पंप, आटा मिल, डेयरी, जूट के उत्पाद, विलेज होम स्टे और कोल्ड स्टोरेज आदि, आय पैदा करने वाले व्यवसाय हो सकते हैं. कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के बीच एक मजबूत संबंध विकसित करने की आवश्यकता है.

भारत का इलाज करने के लिए लाइलाज होते गांवों के इलाज को प्राथमिकता देनी होगी. ग्रामीण अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार आवश्यक है क्योंकि पूरा संसार चाहे जितना डिजिटल अर्थव्यवस्था की बात करे, पर भारत हमेशा कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बिना अधूरा होगा.

गांधीजी के विचारानुसार आदर्श ग्राम पूर्णतया स्वावलम्बी होना चाहिए. खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने, आय बढ़ाने और रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए कृषि की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण बनी रहेगी, भले ही हम डिजिटल अर्थव्यवस्था का कितना भी प्रचार कर लें, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था के लिए कृषि और श्रमिक बहुत जरूरी हैं. 2025 तक भारतीय एग्रीटेक बाजार की क्षमता 22 अरब डॉलर होने का अनुमान है, जिसमें से अब तक बमुश्किल 2% पर ही हम पहुंच पाए हैं. 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए, आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विस्तार और संपन्नता के लिए नए दृष्टिकोण की जरूरत है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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