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प्रेम की राह: सीधी या टेढ़ी? या फिर अबूझ है प्रेम की गली...

“अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानपन बांक नहीं.”

— तुलसीदास

प्रेम की राह सरल नहीं होती, यह तो एक ऐसी डगर है जहाँ तर्क और समझदारी की सीमाएँ टूट जाती हैं. संत तुलसीदास जब प्रेम के मार्ग को ‘अति सूधो’ बताते हैं, तो उनका संकेत इस ओर है कि सच्चे प्रेम में किसी भी प्रकार की चालाकी, स्वार्थ या कूटनीति के लिए कोई स्थान नहीं होता. यह रास्ता भले ही सुगम दिखे, लेकिन इसमें फिसलन भी उतनी ही अधिक होती है. यदि प्रेम के मार्ग पर आपके कदम लड़खड़ाते हैं, तो गिरने के लिए भी तैयार रहना होगा.

यह भाव वही है जो उर्दू शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने अपनी मशहूर नज़्म में कहा था—

“मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग…”

फ़ैज़ यहाँ प्रेम की निरंतरता पर सवाल खड़ा करते हैं. प्रेम को एकमात्र केंद्र मानने की मानसिकता पर चोट करते हुए वे कहते हैं कि दुनिया में प्रेम के अलावा भी बहुत से दुःख और संघर्ष हैं. इंसान की भावनाएं समय और अनुभवों के साथ बदलती हैं, और कभी-कभी प्रेम भी उन बदलावों की भेंट चढ़ जाता है.

प्रेम: वासना, त्याग या मधुशाला?

प्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन ने प्रेम की तुलना मधुशाला से की थी—

“राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला.”

बच्चन का यह कथन प्रेम की निरंतरता और समर्पण की ओर इशारा करता है. प्रेम में भी यदि हम एक राह पकड़कर दृढ़ता से चलते रहें, तो आखिरकार हमें हमारी मंज़िल मिल ही जाएगी. लेकिन यह राह कौन-सी होनी चाहिए, इसका निर्णय हमें स्वयं करना होगा.


प्रेम की राह: सीधी या टेढ़ी? या फिर अबूझ है प्रेम की गली...

किसी के लिए प्रेम आत्मिक अनुभव हो सकता है, तो किसी के लिए यह शारीरिक आकर्षण मात्र. किसी के लिए यह त्याग और बलिदान का प्रतीक है, तो किसी के लिए यह खुशी और वासना का मेल. सवाल यह नहीं है कि प्रेम क्या है, बल्कि यह है कि हम प्रेम से क्या चाहते हैं? क्या हम प्रेम में तुलसीदास की तरह निष्कलंक समर्पण की तलाश कर रहे हैं, या फिर हम फ़ैज़ की तरह यह मानते हैं कि प्रेम के अलावा भी दुनिया में कई जरूरी बातें हैं?

प्रेम की असुरक्षा और समाज का हस्तक्षेप

प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच का संवाद नहीं है. यह समाज की तमाम जटिलताओं, भय और असुरक्षाओं से भी घिरा होता है. बद्री नारायण की कविता ‘प्रेम पत्र’ प्रेम की नाजुकी और उसकी असुरक्षा को उजागर करती है—

“कोई रोम बचायेगा कोई मदीना

कोई चांदी बचायेगा, कोई सोना

मैं निपट अकेला कैसे बचाऊँगा तुम्हारा प्रेमपत्र?”

“प्रलय के दिनों में सप्तर्षि मछली और मनु

सब वेद बचायेंगे

कोई नहीं बचायेगा प्रेमपत्र.”

यह पंक्तियाँ प्रेम की कोमलता और उसके प्रति समाज की बेरुखी को दर्शाती हैं. प्रेम की राह में बाधाएँ केवल व्यक्तिगत नहीं होतीं; समाज, समय और परिस्थितियाँ भी इसे प्रभावित करती हैं.

ओशो का प्रेम पर दृष्टिकोण

रजनीश ओशो प्रेम को एक गहरी आध्यात्मिक यात्रा मानते थे. उनके अनुसार, प्रेम कोई वस्तु नहीं जिसे हासिल किया जाए, बल्कि यह एक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति को स्वयं को डुबो देना चाहिए. ओशो कहते हैं—

“प्रेम का अर्थ है, अपने केंद्र से जीना. प्रेम का अर्थ है, अस्तित्व में ऐसे बह जाना जैसे नदी समुद्र में बह जाती है. प्रेम का अर्थ है, पूर्ण समर्पण. जहाँ अपेक्षा होती है, वहाँ प्रेम नहीं हो सकता.”

ओशो प्रेम को किसी पराधीनता की भावना के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसकी आत्म-स्वीकृति के रूप में देखते हैं. उनका मानना था कि प्रेम कोई सौदा नहीं, बल्कि एक सहज अनुभूति है, जिसे किसी शर्त में बाँधा नहीं जा सकता.

प्रेम में संतुलन की आवश्यकता

प्रेम का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन इसे सहज बनाने का एक ही तरीका है—संतुलन. प्रेम और वास्तविकता के बीच संतुलन बनाना आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती है. हम यह तय करें कि हमें प्रेम में त्याग चाहिए या अधिकार? हमें प्रेम में स्थिरता चाहिए या अनुभवों की विविधता?

फ़ैज़ ने लिखा था—

“और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा.”

यानी प्रेम जीवन का अहम हिस्सा तो है, लेकिन यह सब कुछ नहीं है. जीवन में प्रेम के अलावा भी कई ज़रूरी चीज़ें हैं जिन पर ध्यान देना आवश्यक है.

प्रेम का भविष्य: नई हवा की खुशबू

प्रेम का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसे कैसे जीना चाहते हैं. यदि हम इसे सिर्फ एक भावना के रूप में अपनाते हैं, तो यह हमें आनंद देगा. यदि हम इसे किसी दायित्व की तरह देखते हैं, तो यह बोझ बन जाएगा. और यदि हम इसे अपनी संपूर्णता मान लें, तो यह हमें खोखला भी कर सकता है.

आइए, प्रेम को किसी एक परिभाषा में बांधने के बजाय इसे एक स्वतंत्र, बहुआयामी और विकसित होने वाली अनुभूति मानें. प्रेम का मार्ग सीधा भी हो सकता है और टेढ़ा भी, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम इसे ईमानदारी से अपनाएं.

नए दौर में नई हवा की ख़ुशबू में सराबोर आप सभी को प्रेमिल मन की शुभकामनाएँ!

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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