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Opinion: “दोस्ती”, “डील” और “डर” के बीच फंसी रूबियो की भारत यात्रा

अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबीओ चार दिनों के सरकारी दौरे पर भारत पहुंचे हैं,उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाक़ात की और कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की,अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रीबीओ का भारत दौरा सिर्फ  एक राजनयिक यात्रा नहीं है. यह उस बदलती दुनिया की तस्वीर भी है, जहां दोस्ती भी हित देखकर निभाई जाती है और रणनीति भी बाजार की भाषा में तय होती है. ऊपर से सब कुछ मुस्कुराता हुआ दिख रहा है, हाथ मिल रहे हैं, कैमरे चमक रहे हैं, “स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” जैसे भारी-भरकम शब्द बोले जा रहे हैं, लेकिन असल कहानी इन औपचारिक तस्वीरों के पीछे छिपी हुई है.

एक तरफ अमेरिका कह रहा है कि भारत उसके सबसे अहम साझेदारों में से एक है, दूसरी तरफ वही अमेरिका पिछले महीनों में भारतीय उत्पादों पर टैरिफ बढ़ाता रहा, रूस से तेल नहीं  खरीदने पर दबाव बनाता रहा और पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को भी फिर से मज़बूत करता दिखा. ऐसे में सवाल यह है कि क्या यह यात्रा सचमुच रिश्ते सुधारने आई है, या फिर अमेरिका को अचानक भारत की जरूरत ज्यादा महसूस होने लगी है? 

रुबियो के भारत दौरे के मायने

आज की दुनिया में कोई भी रिश्ता सिर्फ “दोस्ती” पर नहीं चलता. अमेरिका को चीन की बढ़ती ताकत रोकनी है. उसे इंडो-पैसिफिक में एक ऐसा साथी चाहिए जो चीन को बैलेंस कर सके. और यहां भारत सबसे बड़ा खिलाड़ी बनकर सामने आता है. इसी वजह से क्वैड — यानी भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह, अब सिर्फ एक कूटनीतिक मंच नहीं बल्कि एक रणनीतिक संदेश बन चुका है.

लेकिन भारत की अपनी मजबूरियां और अपनी सोच भी है. भारत अमेरिका का साथी जरूर बनना चाहता है, लेकिन “कैंप पॉलिटिक्स” का हिस्सा नहीं बनना चाहता. भारत रूस से तेल भी खरीदेगा, ईरान से रिश्ते भी रखेगा और अमेरिका के साथ रक्षा समझौते भी करेगा. यही भारत की पुरानी “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” है, जिसे पश्चिम देश कभी पूरी तरह समझ नहीं पाए .

रूबियो की यात्रा में सबसे ज्यादा जोर ऊर्जा यानी एनर्जी पर दिखा. अमेरिका खुलकर कह रहा है कि वह भारत को ज़्यादा  से ज़्यादा तेल और गैस बेचना चाहता है. इसका एक कारण आर्थिक है, लेकिन दूसरा कारण राजनीतिक भी है. अमेरिका चाहता है कि भारत धीरे-धीरे रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करे. मगर यहां भारत का नजरिया बहुत साफ है, भारत भावनाओं से नहीं, अपने राष्ट्रीय हित को धयान में रखते हुए ऊर्जा खरीदेगा. अगर रूस सस्ता तेल देगा, तो भारत उसे खरीदेगा. अगर अमेरिका बेहतर शर्तें देगा, तो भारत उस पर भी विचार करेगा. 

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका खुद भी इस समय एक अजीब दुविधा में फंसा हुआ दिखता है. एक तरफ वह चीन को चुनौती मानता है, दूसरी तरफ कई मामलों में उसे चीन से बातचीत भी करनी पड़ रही है. यही कारण है कि भारत में कुछ रणनीतिक हलकों में यह बेचैनी है कि कहीं अमेरिका जरूरत पड़ने पर फिर कोई “रीसेट” चीन के साथ न कर ले. 

रूबियो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को व्हाइट हाउस आने का न्योता भी दिया है. इसे केवल एक औपचारिक निमंत्रण मानना भूल होगी. यह संदेश है कि तमाम तनावों के बावजूद वॉशिंगटन अभी भी नई दिल्ली को खोना नहीं चाहता. खासकर तब, जब दुनिया में नए गठबंधन बन रहे हैं और पुराने समीकरण टूट रहे हैं.

जितना मजबूत, उतना ही नाजुक

लेकिन यहां एक और पहलू भी है, जिस पर भारत में कम चर्चा होती है. अमेरिका भारत से सिर्फ बाजार या रणनीतिक समर्थन नहीं चाहता. वह चाहता है कि भारत उसकी वैश्विक सोच के साथ ज्यादा तालमेल बिठाए. जबकि भारत की विदेश नीति कभी भी "यस सर"वाली नहीं रही है . भारत जिओ पॉलिटिक्स के पेचीदा रिश्तों और देश के हित देखते हुए फ़ैसला करता है. चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध हो, ईरान का मामला हो या गाजा का संकट, भारत हर जगह संतुलन साधने की कोशिश करता है.

यही वजह है कि यह रिश्ता जितना मजबूत दिखता है, उतना ही नाजुक भी है. दोनों देशों को एक-दूसरे की जरूरत है, लेकिन विडंबना ये है की दोनों ही देश एक-दूसरे पर पूरी तरह भरोसा भी नहीं करते. अमेरिका को डर है कि भारत पूरी तरह उसके खेमे में नहीं आएगा. भारत को डर है कि अमेरिका कभी भी अपने हित बदल सकता है.

शायद इसी वजह से रूबियो की यह यात्रा सिर्फ “रिश्ते मजबूत” करने की कोशिश नहीं, बल्कि “भरोसा बचाने” की कवायद ज्यादा लगती है. और आखिर में सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या भारत और अमेरिका सचमुच लंबे समय के रणनीतिक साथी बन पाएंगे, या फिर यह रिश्ता भी दुनिया की बाकी अंतरराष्ट्रीय दोस्तियों की तरह सिर्फ “हितों की साझेदारी” बनकर रह जाएगा? क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्त नहीं होते… सिर्फ स्थायी हित होते हैं.

[यह आर्टिकिल लेखक का निजी विचार है]

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