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BLOG: निर्मला सीतारमण का रक्षा मंत्री बनना महिलाओं के लिए शुभ संकेत है और खुशखबरी भी

सबसे पहले देश की प्रथम पूर्णकालिक महिला रक्षा मंत्री को एक पुरुष प्रधान समाज की सोच में एक बड़ा बदलाव लाना है.

नई दिल्ली : निर्मला सीतरमण का रक्षा मंत्री बनना देश के लिये गौरव की बात होने के साथ-साथ सेना में महिलाओं के लिये अनेक मौके प्रदान कर सकता है. रक्षा मंत्री बनने के तुरंत बाद सीतरमण का बयान कि वो खुले दिमाग से महिलाओं को सेना में लड़ाकू भूमिका देने के बारे में विचार करेंगी. यह एक शुभ संकेत है और महिलाओं के लिये खुशखबरी भी.

सबसे पहले देश की प्रथम पूर्णकालिक महिला रक्षा मंत्री को एक पुरुष प्रधान समाज की सोच में एक बड़ा बदलाव लाना है. फौज और रक्षा से जुड़े अनेक लोगों में महिलाओं को लेकर कई भ्रांतियां हैं जिसके कारण भारतीय सेना में महिलाओं की कॉम्बैट ऑपरेशन व जवान स्तर पर भर्ती नहीं हो पाई है. एक ऐसे समय जहां विश्व की अनेक सेनाओं में जिसमें अमेरिका, इज़राइल, ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, इंग्लैंड फ्रांस और अन्य देश शामिल हैं. जहां महिलाएं पुरुषों के साथ साथ-साथ लड़ाई व राष्ट्रीय सुरक्षा में भाग लेती हैं तो भरतीय महिलाएं क्यों वंचित रहें? दरअसल महिलाओं के विवेक, उनकी जिस्मानी शक्ति, दुश्मन द्वारा यातना दिये जाने तर्क को सामने रख महिलाओं को फौज में जवान स्तर पर भर्ती होने से रोका जाता रहा है. विवेक और सूझबूझ में तो महिलाओं ने राजनीति से लेकर इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी में अपना सिक्का जमाया हुआ है. देश की आज़ादी से पहले केवल 14 फीसदी को वोट देने का अधिकार था और यह कहा जाता था की पढ़ाई लिखाई के बिना महिलाएं राजनीति में क्या योगदान दे सकेंगी लेकिन कांस्टिट्यूशन असेंबली ने समस्त भारत की महिलाओं को वोट का अधिकार दिया और आज पढ़ाई-लिखाई मे भी महिलाओं ने बराबर का स्थान पा लिया है. सोचने की बात यह है की जब अमरीकी फौज की महिलाएं इराक़ और अफगानिस्तान में लड़ सकती हैं तो भरतीय महिलाएं क्यों नही? अगर पैरामिलिट्री फोर्सेस में महिलाओं की भागीदारी हो सकती है तो सेना में क्यों नही? यूनिट और एड्वान्स पोस्ट, फॉरवर्ड एरियाज में अलग बाथरूम या निजता के प्रश्न उठाना, बचकाना और तर्क संगत नही हैं. पुरुष समाज को महिलाओं के प्रति हर स्तर पर संवेदनशील होना चहिए और उसमें घर बाहर या फॉरवर्ड और पीस स्टेशन का भेद करना अनुचित है. जहां तक गर्भवती महिलाओं का सवाल है उसके लिए पर्याप्त छुट्टी के प्रावधानों की आवश्कता है न की ना-नुकुर की. रही बात दुश्मन द्वारा यौन प्रताड़ना की तो इस सम्बन्ध में अंतर्राष्ट्रीय नियम कायदे कानून है और दुश्मन को ऐसा करने का दुस्साहस ही नही होना चाहिये. अमरीकी फौज ने इस सम्बन्ध में कड़े नियम वा जीरो टॉलरेंस पॉलिसी बना रखी है जिसका भारत व मित्र राष्ट्र अनुसरण कर सकते हैं. रक्षा मंत्रालय में निर्मला सीतरमण को शरूआत से ही एक बात पर जोर देना है कि लिंग के आधार पर सेना में भेदभाव नही किया जा सकता है, ना ही करना चहिए. अगर अमरीकी, इजराइली, इंग्लिश या फ्रेंच महिलाएं जवान स्तर पर पुरुषों के साथ अपने देश की रक्षा कर सकती हैं तो भारत में क्यों नही? सोच बदलने की आवश्कता पुरुषों को है न की महिलाओं को. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

गौरतलब बात यह भी है कि केवल ऑफिसर लेवल पर महिलाओं का प्रतिनिधत्व करने से बात नही बनती है. फौज और मिलिट्री एक निर्बाध संस्था के रूप में काम करती है, जहां हर स्तर पर मिश्रित लिंग से राह आसान होगी. जब जवान स्तर पर महिलाएं शामिल होंगी तभी पुरुष जवानों का महिला ऑफिसर पर विश्वास मजबूत होगा और सेना सशक्त हो कर उभरेगी.

देश की निगाहें निर्मला सीतरमण पर लगी है कि क्या वो महिलाओं को जवान स्तर पर और कॉम्बैट लड़ाकों के रूप में शामिल कर सकेंगी?

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार और आंकड़ें लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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