एक्सप्लोरर

Opinion: भारतीय ज्ञान परंपरा का वह जीवंत विज्ञान, जिसका भूलते जा अर्थ

श्रावण का महीना है. गुजरात की किसी पुष्टिमार्गीय हवेली में ठाकुरजी के सामने फलों का मनोरथ सजा है. कहीं आम, कहीं केले, कहीं जामुन, कहीं ककड़ी, कहीं सीताफल, तो कहीं नारियल और अनार से भगवान का मुकुट अलंकृत किया गया है. देखने वाला कह सकता है - "यह तो केवल धार्मिक सजावट है." लेकिन यदि हम भारतीय संस्कृति को केवल आंखों से नहीं, उसके विचार से देखें, तो यह दृश्य एक पूरी सभ्यता का दर्शन कराता है.

ऐसा ही दृश्य नाथद्वारा में श्रीनाथजी के सवा लाख आम के मनोरथ में दिखाई देता है. महाराष्ट्र में गणेशोत्सव के दौरान मौसमी फलों का भोग लगता है. गोवा और तटीय कर्नाटक में गणपति को स्थानीय फलों से सजाया जाता है. पुरी में भगवान जगन्नाथ का महाप्रसाद हजारों लोगों तक पहुंचता है. पंजाब के गुरुद्वारों में लंगर किसी जाति, वर्ग या आर्थिक स्थिति का भेद नहीं देखता. तमिलनाडु में पोंगल नई फसल का पहला अन्न भगवान को समर्पित करता है. केरल का ओणम, असम का बिहू, गुजरात का श्रावण, ब्रज का अन्नकूट, बंगाल की दुर्गापूजा और आदिवासी समाज के करम और सरहुल-भारत के हर क्षेत्र में प्रकृति, अन्न, फल, फूल और भगवान का एक अद्भुत संबंध दिखाई देता है.

पहली दृष्टि में ये अलग-अलग परंपराएं लगती हैं, पर गहराई से देखें तो इन सबके केंद्र में एक ही विचार है- "भगवान को वही अर्पित करो, जो प्रकृति ने तुम्हें दिया है और जो भगवान को अर्पित हो, वह समाज के साथ बांटो." यही भारतीय ज्ञान परंपरा का वह मौन सामाजिक विज्ञान है, जिसे हमने उत्सव के रूप में तो बचा लिया, पर उसके पीछे का दर्शन धीरे-धीरे विस्मृत कर दिया. भारतीय संस्कृति में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं रहा. उपनिषद कहते हैं-"अन्नं ब्रह्म". अन्न स्वयं ब्रह्म है. इसलिए पहली फसल, पहला फल, पहला दूध, पहला घी, पहला पकवान- सबसे पहले ईश्वर को समर्पित किए जाते हैं. यह भगवान की आवश्यकता नहीं, मनुष्य के संस्कार की आवश्यकता है. यह अहंकार को कृतज्ञता में बदलने की प्रक्रिया है.

भारतीय ज्ञान परंपरा का सौंदर्य यही है कि उसने अपने दर्शन को केवल ग्रंथों में नहीं रखा. उसने उन्हें जीवन में उतार दिया. यज्ञ केवल वेदों में नहीं रहा, वह किसान की पहली बालियों में उतर आया. उपनिषद केवल आश्रमों तक सीमित नहीं रहे, वे मंदिरों के नैवेद्य बन गए. प्रकृति का सम्मान केवल विचार नहीं रहा, वह भोग और प्रसाद की परंपरा बन गया. यदि इस दर्शन का सबसे जीवंत रूप आज भी कहीं दिखाई देता है, तो वह गुजरात और राजस्थान की पुष्टिमार्गीय हवेलियों में है. यहां ठाकुरजी केवल पूजे नहीं जाते, बल्कि ऋतु के अनुसार उनके वस्त्र बदलते हैं, भोग बदलते हैं, संगीत बदलता है, श्रृंगार बदलता है और यहां तक कि उनके विश्राम का स्वरूप भी बदलता है. ग्रीष्म में शीतल पेय और चंदन, वर्षा में हरियाली और फलों के मनोरथ, शरद में अलग सेवा और शीत ऋतु में ऊष्मा देने वाले भोग- यह सब केवल भक्ति नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ चलने की जीवन-पद्धति है.

श्रावण मास में हवेलियों में होने वाले फल-मनोरथ केवल सौंदर्य का विषय नहीं हैं. वे हमें बताते हैं कि इस ऋतु में धरती ने जो दिया है, वही सर्वोत्तम है. भगवान को विदेशी या दुर्लभ वस्तुओं से नहीं, बल्कि अपनी धरती के मौसमी उपहारों से प्रसन्न किया जाता है. यह "लोकल", "सीज़नल" और "सस्टेनेबल" जीवन का ऐसा मॉडल है, जिसे आधुनिक दुनिया आज नए सिद्धांतों के रूप में खोज रही है. आज "Seasonal Diet", "Local Food", "Sustainable Living" और "Circular Economy" जैसे शब्द वैश्विक विमर्श का हिस्सा हैं. किंतु भारतीय समाज ने इन्हें हजारों वर्षों से अपनी संस्कृति के माध्यम से जिया है. 

हमारे मंदिर स्थानीय किसान से जुड़े रहे. माली, दुग्ध उत्पादक, कुम्हार, बुनकर, रसोइए, चित्रकार, संगीतकार, पुष्प-उत्पादक और कारीगर-सभी मंदिर व्यवस्था का हिस्सा रहे. मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं था, वह स्थानीय अर्थव्यवस्था का भी केंद्र था. नाथद्वारा में श्रीनाथजी का सवा लाख आम का मनोरथ इसका अत्यंत सुंदर उदाहरण है. यदि कोई केवल आमों की संख्या देखे, तो उसे यह वैभव का प्रदर्शन लगेगा. परंतु जब वही आम प्रसाद बनकर भक्तों और आसपास के समाज तक पहुँचते हैं, तब उसका अर्थ बदल जाता है. जिस परिवार के लिए उस मौसम का श्रेष्ठ फल खरीदना कठिन हो, उसके घर भी भगवान के प्रसाद के रूप में वही फल पहुँचता है. 

भारतीय संस्कृति ने इसे कभी "वितरण नीति" नहीं कहा, पर व्यवहार में यह सामाजिक पुनर्वितरण (Social Redistribution) का अत्यंत प्रभावी मॉडल था. यही बात पुरी के महाप्रसाद में दिखाई देती है. यही भाव सिख परंपरा के लंगर में दिखाई देता है. यही दर्शन अन्नकूट में दिखाई देता है. यही भावना दक्षिण भारत के मंदिरों में नई फसल के नैवेद्य में दिखाई देती है. यही परंपरा असम के बिहू, पंजाब की बैसाखी, केरल के ओणम और तमिलनाडु के पोंगल में दिखाई देती है. विविधता अनेक है, पर दर्शन एक है - प्रकृति का सम्मान, ईश्वर के प्रति कृतज्ञता और समाज के साथ साझेदारी.

यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है- क्या भारतीय मंदिर केवल पूजा के केंद्र थे? यदि इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन किया जाए, तो उत्तर स्पष्ट है- नहीं. वे आध्यात्मिक केंद्र थे, पर साथ ही कृषि संस्कृति के संरक्षक भी थे. वे कला और संगीत के विश्वविद्यालय थे. वे स्थानीय अर्थव्यवस्था के संवाहक थे. वे अन्न, प्रसाद और भंडारों के माध्यम से सामाजिक समरसता के केंद्र थे. वे ऋतु और स्वास्थ्य के अनुसार जीवन जीने की प्रेरणा देते थे. दूसरे शब्दों में, मंदिर भारतीय समाज की "Living Knowledge Institutions" थे - जीवंत ज्ञान संस्थान.

यहीं भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता दिखाई देती है. उसने शिक्षा को केवल पुस्तकों में नहीं रखा, बल्कि उत्सवों में बदल दिया. बच्चे को यह समझाने की आवश्यकता नहीं थी कि वर्षा ऋतु में कौन-सा फल खाना चाहिए. वह मंदिर जाता, वही फल भगवान को चढ़ते देखता, वही प्रसाद के रूप में पाता और वही उसके भोजन का हिस्सा बन जाता. ज्ञान जीवन बन जाता था. आज सवाल ये नहीं है कि हमारी परंपराएं समाप्त हो रही हैं. प्रश्न ये है कि क्या हम उनके पीछे का अर्थ समझ रहे हैं?

दुर्भाग्य से आज कई स्थानों पर परंपरा का उद्देश्य पीछे छूटता जा रहा है. कहीं प्राकृतिक सजावट की जगह प्लास्टिक ने ले ली है. कहीं स्थानीय मौसमी उपज की जगह केवल दिखावे की संस्कृति आ गई है. कहीं प्रसाद का भाव कम और आयोजन का प्रदर्शन अधिक दिखाई देता है. कहीं भगवान के चरणों में अर्पित वस्तुएं समाज तक पहुंचने के बजाय अपव्यय का कारण बन जाती हैं. यह हमारी संस्कृति का दोष नहीं, हमारी समझ का क्षरण है. अक्सर आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी जीवनशैली का अंधानुकरण भी इस दूरी का कारण बनता है. यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि समस्या पश्चिम नहीं है. पश्चिम से विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन और अनेक उपयोगी विचार सीखे जा सकते हैं. समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम अपनी परंपराओं को बिना समझे पिछड़ा मान लेते हैं. परिणाम यह होता है कि नई पीढ़ी उत्सव तो मनाती है, पर यह नहीं जानती कि उसके पीछे पर्यावरण, पोषण, कृषि, समाज और आध्यात्मिकता का कितना गहरा विज्ञान छिपा है.

आज यदि कोई बच्चा पूछे कि भगवान को पहला आम क्यों चढ़ाते हैं, तो हम अक्सर कहते हैं - "ऐसी परंपरा है." जबकि सही उत्तर होना चाहिए - "क्योंकि भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है कि प्रकृति का पहला उपहार कृतज्ञता के साथ स्वीकार करो, उसे साझा करो और उसके प्रति सम्मान रखो." आज आवश्यकता परंपराओं को बचाने की नहीं, उनके अर्थ को पुनर्जीवित करने की है. यदि विद्यालयों में भारतीय ज्ञान परंपरा पढ़ाई जा रही है, तो उसे केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रखना चाहिए. बच्चों को मंदिरों की ऋतु-सेवा, प्रसाद व्यवस्था, स्थानीय कृषि, अन्नकूट, लंगर, महाप्रसाद और लोक-उत्सवों के माध्यम से यह समझाना होगा कि भारत का ज्ञान जीवन से अलग नहीं है.

भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता नहीं, बल्कि उस विविधता को जोड़ने वाला साझा दर्शन है. गुजरात की हवेली हो या पंजाब का गुरुद्वारा, पुरी का रसोईघर हो या तमिलनाडु का पोंगल, असम का बिहू हो या केरल का ओणम - हर जगह संदेश एक ही है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका सहभागी है, अन्न केवल उपभोग की वस्तु नहीं, प्रसाद है और समृद्धि का वास्तविक अर्थ संग्रह नहीं, साझेदारी है. शायद यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में धर्म कभी केवल मंदिर की चौखट तक सीमित नहीं रहा. वह खेतों में उगा, ऋतुओं के साथ बदला, लोकगीतों में गाया गया, मंदिरों में अर्पित हुआ, प्रसाद बनकर समाज तक पहुँचा और अंततः मनुष्य को यह सिखा गया कि जीवन का सबसे बड़ा उत्सव वही है, जिसमें प्रकृति, भगवान और समाज - तीनों एक साथ उपस्थित हों.

आज जब पूरी दुनिया टिकाऊ जीवन, स्थानीय आहार, सामुदायिक साझेदारी और पर्यावरणीय संतुलन की नई परिभाषाएं लिख रही है, तब भारत के सामने चुनौती किसी नए दर्शन की खोज नहीं, बल्कि अपनी ही सांस्कृतिक स्मृति को पुनः जागृत करने की है. क्योंकि हमारे पूर्वजों ने जो ज्ञान शास्त्रों में लिखा, उसे परंपराओं में जीकर भी दिखाया. अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम उन परंपराओं को केवल निभाएं नहीं, बल्कि समझें, संरक्षित करें और नई पीढ़ी तक उनके वास्तविक अर्थ के साथ पहुंचाएं. क्योंकि जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि भगवान के चरणों में रखा गया पहला फल अंततः समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने के लिए है, उसी दिन हम यह भी समझ जाएंगे कि भारतीय संस्कृति में प्रसाद केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि करुणा, कृतज्ञता, समरसता और भारतीय ज्ञान परंपरा का जीवंत घोष है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

View More

ओपिनियन

Sponsored Links by Taboola
Advertisement
Advertisement
25°C
New Delhi
Rain: 100mm
Humidity: 97%
Wind: WNW 47km/h
Advertisement

टॉप हेडलाइंस

जनगणना 2027 में OBC कॉलम पर कांग्रेस का बड़ा प्लान, दिल्ली में होगी बैठक
जनगणना 2027 में OBC कॉलम पर कांग्रेस का बड़ा प्लान, दिल्ली में होगी बैठक
रांची प्रोटेस्ट: JSSC CGL एग्जाम रद्द, CM हेमंत सोरेन का बड़ा ऐलान
रांची प्रोटेस्ट: JSSC CGL एग्जाम रद्द, CM हेमंत सोरेन का बड़ा ऐलान
गॉल टेस्ट के चौथे दिन कैसा रहेगा मौसम, बारिश बिगाड़ेगी टीम इंडिया का खेल? जानिए
गॉल टेस्ट के चौथे दिन कैसा रहेगा मौसम, बारिश बिगाड़ेगी टीम इंडिया का खेल? जानिए
आम्रपाली दुबे ने पवन सिंह को दिया शादी का ऑफर, काजल राघवानी ने तेज प्रताप संग रचाया 'रास'
आम्रपाली दुबे ने पवन सिंह को दिया शादी का ऑफर, काजल राघवानी ने तेज प्रताप संग रचाया 'रास'

वीडियोज

ChatGPT Viral Video: AI का कमाल! भीड़ में खोई चप्पल, ChatGPT ने ऐसे ढूंढ निकाली, वीडियो चौंका देगा!
Himanshi Khurana का बड़ा खुलासा, Asim Riaz संग रिश्ते में लगा था भगवान को धोखा देने का डर
Lalit Modi ने ठुकराई Bigg Boss 20 में एंट्री की खबर, Salman Khan के शो पर दिया बड़ा बयान
Shah Rukh Khan, Ajay Devgn और Tiger Shroff को Vimal Elaichi Ad पर Maharashtra FDA का नोटिस
Sansani: कैमरे में कैद मर्डर की LIVE पिक्चर

पर्सनल कार्नर

टॉप आर्टिकल्स
टॉप रील्स
जनगणना 2027 में OBC कॉलम पर कांग्रेस का बड़ा प्लान, दिल्ली में होगी बैठक
जनगणना 2027 में OBC कॉलम पर कांग्रेस का बड़ा प्लान, दिल्ली में होगी बैठक
रांची प्रोटेस्ट: JSSC CGL एग्जाम रद्द, CM हेमंत सोरेन का बड़ा ऐलान
रांची प्रोटेस्ट: JSSC CGL एग्जाम रद्द, CM हेमंत सोरेन का बड़ा ऐलान
गॉल टेस्ट के चौथे दिन कैसा रहेगा मौसम, बारिश बिगाड़ेगी टीम इंडिया का खेल? जानिए
गॉल टेस्ट के चौथे दिन कैसा रहेगा मौसम, बारिश बिगाड़ेगी टीम इंडिया का खेल? जानिए
आम्रपाली दुबे ने पवन सिंह को दिया शादी का ऑफर, काजल राघवानी ने तेज प्रताप संग रचाया 'रास'
आम्रपाली दुबे ने पवन सिंह को दिया शादी का ऑफर, काजल राघवानी ने तेज प्रताप संग रचाया 'रास'
क्या ईरान पर परमाणु हथियारों से हमला करेंगे ट्रंप? कांग्रेसवुमन के दावे से हड़कंप
क्या ईरान पर परमाणु हथियारों से हमला करेंगे ट्रंप? कांग्रेसवुमन के दावे से हड़कंप
संगठन में वापसी पर स्मृति ईरानी का पहला रिएक्शन, 'मेरे जैसे कार्यकर्ता का...'
संगठन में वापसी पर स्मृति ईरानी का पहला रिएक्शन, 'मेरे जैसे कार्यकर्ता का...'
Viral Video: ट्रेन की पेंट्री में दिखा चूहा, वायरल वीडियो पर आया IRCTC का जवाब
ट्रेन की पेंट्री में दिखा चूहा, वायरल वीडियो पर आया IRCTC का जवाब
'बंटवारा 1947' के फैंस के लिए खुशखबरी, मंगलवार को 99 रुपये में देख पाएंगे फिल्म
'बंटवारा 1947' के फैंस के लिए खुशखबरी, मंगलवार को 99 रुपये में देख पाएंगे फिल्म
Embed widget