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Opinion: 5 साल के निचले स्तर पर अर्थव्यवस्था- कारखाने हैं लेकिन नौकरियां कहां?

भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर अक्सर बड़ी तस्वीर दिखाई जाती है- तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, बड़े-बड़े निर्माण कार्य, नए एक्सप्रेसवे, हवाई अड्डे, पुल और शहरों का विस्तार, लेकिन अर्थव्यवस्था की असली ताकत केवल इन चीजों से तय नहीं होती. असली सवाल यह है कि क्या आम आदमी के हाथ में पैसा बढ़ रहा है? क्या उसे अच्छी नौकरी मिल रही है? क्या कारखानों में उत्पादन बढ़ रहा है? और क्या लोग बाजार में जाकर सामान खरीदने की क्षमता रखते हैं? आज इन सवालों को गंभीरता से देखने की जरूरत है. भारत में मैन्युफैक्चरिंग यानी कारखानों में उत्पादन का हिस्सा लंबे समय से करीब 14-17 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है, जबकि लंबे समय से इसे अर्थव्यवस्था का लगभग 25 फीसदी या उससे अधिक हिस्सा बनाने का लक्ष्य रखा जाता रहा है. इतनी बड़ी आबादी वाले देश के लिए यह केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं है. इसका सीधा संबंध नौकरी, मजदूरी, गांवों की आय, युवाओं के भविष्य और बाजार की मांग से है.

विकास हो रहा है, लेकिन नौकरी कहां है?

भारत को दशकों पहले ही ऐसी अर्थव्यवस्था बन जाना चाहिए था जिसमें खेती से निकलने वाले लोगों को बड़े पैमाने पर कारखानों, निर्माण, निर्यात और आधुनिक सेवाओं में रोजगार मिल सके. चीन, दक्षिण कोरिया और कई दूसरे देशों ने इसी रास्ते से बड़ी संख्या में लोगों को कम उत्पादक काम से ज्यादा उत्पादक रोजगार की ओर पहुंचाया. भारत में यह बदलाव उतनी तेजी से नहीं हो पाया. नतीजा यह है कि आज भी बड़ी संख्या में लोग खेती, छोटे कारोबार, दिहाड़ी मजदूरी और असंगठित क्षेत्र पर निर्भर हैं. इन क्षेत्रों में काम तो मिलता है, लेकिन आमदनी अक्सर कम और रोजगार अस्थिर होता है. अगर मजबूत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तेजी से बढ़ता, तो गांवों और छोटे शहरों से आने वाले लाखों युवाओं को बेहतर रोजगार मिल सकता था. उनकी आय बढ़ती और उसी के साथ बाजार में सामान खरीदने की क्षमता भी बढ़ती.

यहीं से अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण चक्र शुरू होता है-नौकरी बढ़ती है, आय बढ़ती है, लोग सामान खरीदते हैं, कंपनियों की बिक्री बढ़ती है, कंपनियां उत्पादन बढ़ाती हैं और फिर नई नौकरियां पैदा होती हैं. आज समस्या यह है कि यह चक्र उतनी ताकत से नहीं चल रहा है जितनी भारत को जरूरत है.

मैन्युफैक्चरिंग की रफ्तार क्यों नहीं बढ़ रही?

भारत के लिए मैन्युफैक्चरिंग केवल कारखाने लगाने का सवाल नहीं है. इसके पीछे पूरी व्यवस्था काम करती है. सस्ता कर्ज चाहिए, भरोसेमंद बिजली चाहिए, अच्छी सड़क और रेल चाहिए, बंदरगाहों से तेज कनेक्टिविटी चाहिए, कच्चा माल समय पर चाहिए और दुनिया के बाजार में प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता भी चाहिए. भारत के कई श्रम-प्रधान उद्योग- जैसे कपड़ा, गारमेंट, चमड़ा, जूते और लकड़ी से जुड़े उत्पाद- अपनी पूरी क्षमता के अनुसार आगे नहीं बढ़ पाए हैं. इन क्षेत्रों की खासियत यह है कि इनमें बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार दिया जा सकता है. लेकिन अगर इनकी लागत ज्यादा होगी और विदेशी बाजार में प्रतिस्पर्धा मुश्किल होगी तो कंपनियां उत्पादन और रोजगार दोनों बढ़ाने से बचेंगी.

यही कारण है कि भारत को केवल हाई-टेक उद्योगों की सफलता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरी आधुनिक इंडस्ट्री जरूरी हैं, लेकिन भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल श्रम शक्ति है. अगर करोड़ों लोगों को रोजगार देना है तो श्रम-प्रधान उद्योगों को भी उतना ही महत्व देना होगा.

सेवाओं की रफ्तार भी पांच साल के निचले स्तर पर

चिंता सिर्फ कारखानों तक सीमित नहीं है. जुलाई में भारत के सेवा क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियों का PMI 53.4 रहा. यह आंकड़ा अभी भी 50 से ऊपर है, यानी क्षेत्र में विस्तार जारी है, लेकिन इसकी रफ्तार अगस्त 2021 के बाद सबसे धीमी बताई गई है. यहां एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी. 50 से ऊपर का आंकड़ा यह नहीं बताता कि सब कुछ शानदार चल रहा है. इसका अर्थ है कि गतिविधि बढ़ रही है, लेकिन कितनी तेजी से बढ़ रही है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है.

जुलाई में नए कारोबार की वृद्धि भी फरवरी 2022 के बाद सबसे कमजोर स्तर पर पहुंच गई. कंपनियों के सामने कड़ी प्रतिस्पर्धा, कमजोर मांग और कुछ ऑर्डर टलने जैसी समस्याएं दिखाई दीं. रोजगार के मोर्चे पर भी तस्वीर बहुत मजबूत नहीं रही. केवल करीब 6 प्रतिशत कंपनियों ने कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई, जबकि लगभग 92 प्रतिशत कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया. इसका मतलब साफ है- अर्थव्यवस्था चल रही है, लेकिन नई नौकरियां पैदा करने की गति उतनी मजबूत नहीं है.

सबसे बड़ी समस्या: लोगों के पास खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं

किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए बाजार की मांग बहुत महत्वपूर्ण होती है. कंपनियां तभी उत्पादन बढ़ाएंगी जब उन्हें भरोसा होगा कि लोग उनका सामान खरीदेंगे. लेकिन अगर मजदूरी लंबे समय तक नहीं बढ़ती, तो आम परिवार अपनी जरूरतों को सीमित करने लगता है. वह नया मोबाइल टाल देता है, कपड़े कम खरीदता है, घर की मरम्मत रोक देता है, बाहर खाना कम करता है या कोई बड़ी खरीदारी कुछ महीनों के लिए टाल देता है. यही स्थिति धीरे-धीरे पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डालती है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2010 से 2016 के बीच सालाना मजदूरी वृद्धि करीब 7 प्रतिशत के आसपास थी, लेकिन 2015-16 से 2022-23 के बीच इसमें काफी गिरावट आई और वास्तविक मजदूरी वृद्धि लगभग ठहराव के करीब पहुंच गई. अगर लोगों की आय नहीं बढ़ेगी तो बाजार में मांग कैसे बढ़ेगी? इसलिए आज भारत के सामने सिर्फ ‘Growth’ का सवाल नहीं है. सवाल है-‘Growth with demand’ यानी ऐसी वृद्धि जिसमें आम आदमी की जेब भी मजबूत हो.

कम मजदूरी का असर कंपनियों पर भी पड़ता है

यह बात पहली नजर में थोड़ी अजीब लग सकती है. कोई कह सकता है कि कम मजदूरी तो कंपनियों के लिए अच्छी होनी चाहिए, क्योंकि उनकी लागत कम रहती है. लेकिन लंबे समय में यह सोच अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक हो सकती है. कर्मचारी ही बाजार का उपभोक्ता भी है. अगर उसकी आय कम है तो वह कंपनियों के उत्पाद खरीदने में सक्षम नहीं होगा. यानी जिस कंपनी ने लागत बचाने के लिए मजदूरी को दबाकर रखा, वही कंपनी कमजोर मांग की समस्या का सामना कर सकती है. यही कारण है कि मजदूरी और मांग के बीच सीधा संबंध है. मजबूत बाजार के लिए मजबूत उपभोक्ता चाहिए और मजबूत उपभोक्ता के लिए स्थिर और पर्याप्त आय जरूरी है.

महंगा ईंधन पूरी अर्थव्यवस्था पर असर डालता है

भारत में ईंधन की कीमतों का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता. ट्रक का डीजल महंगा होता है तो सामान ढोने की लागत बढ़ती है. परिवहन महंगा होता है तो कारखाने की लागत बढ़ती है. कच्चा माल महंगा होता है तो अंतिम उत्पाद महंगा होता है. आखिर में इसका असर ग्राहक की जेब पर आता है. पेट्रोलियम आधारित कई उत्पादों की कीमत भी परिवहन और ईंधन लागत से प्रभावित होती है. इसलिए ईंधन से मिलने वाला सरकारी राजस्व जरूरी हो सकता है, लेकिन इसकी कीमत का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर देखना भी उतना ही जरूरी है. अगर लॉजिस्टिक्स महंगा है तो भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीन, वियतनाम, बांग्लादेश और दूसरे प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले महंगे पड़ सकते हैं. ऐसे में निर्यात बढ़ाना कठिन हो जाता है.

सिर्फ निर्माण से अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी

भारत में सड़क, पुल, रेलवे, बंदरगाह और इमारतों का निर्माण जरूरी है. इसमें कोई दो राय नहीं, लेकिन अर्थव्यवस्था को केवल निर्माण गतिविधियों के सहारे लंबे समय तक मजबूत नहीं किया जा सकता. एक सड़क बनती है तो वह आर्थिक गतिविधि को आसान बनाती है. लेकिन सड़क के जरिए अगर कारखाने का सामान बाजार तक नहीं पहुंच रहा, निर्यात नहीं बढ़ रहा और नए उद्योग नहीं लग रहे तो सड़क का पूरा आर्थिक लाभ नहीं मिल पाएगा. इसलिए निर्माण के साथ-साथ उत्पादन और रोजगार पर भी उतना ही ध्यान देना होगा.

एक और समस्या जमीन की है. सड़कों, शहरों और निर्माण गतिविधियों का विस्तार जमीन की कीमत बढ़ाता है. महंगी जमीन का मतलब है कि छोटे उद्योगों और मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के लिए जमीन खरीदना या किराए पर लेना मुश्किल हो जाता है. इससे उत्पादन लागत और बढ़ती है.

MSME को सस्ता कर्ज नहीं मिला तो रोजगार कैसे बढ़ेगा?

भारत में छोटे और मध्यम उद्योग रोजगार के सबसे बड़े स्रोतों में से हैं. लेकिन इन्हीं उद्योगों को अक्सर बैंक से सस्ता और आसान कर्ज पाने में परेशानी होती है. एक छोटी फैक्ट्री के लिए कामकाजी पूंजी बेहद जरूरी होती है. उसे कच्चा माल खरीदना है, मजदूरों को वेतन देना है, बिजली का बिल देना है और ग्राहक से भुगतान आने तक इंतजार करना है. अगर बैंक से पैसा महंगा मिलेगा या समय पर नहीं मिलेगा तो उसका कारोबार रुक सकता है. बड़े उद्योग किसी तरह दूसरी वित्तीय व्यवस्था से पैसा जुटा सकते हैं, लेकिन छोटे उद्योगों के पास विकल्प कम होते हैं. इसलिए MSME के लिए सस्ता, आसान और समय पर मिलने वाला कर्ज रोजगार नीति का हिस्सा होना चाहिए.

बैंकिंग व्यवस्था में भी संतुलन जरूरी

अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए बैंकिंग क्षेत्र की भूमिका बहुत बड़ी है. अगर बैंक का बड़ा हिस्सा लंबे समय के लिए किसी एक क्षेत्र में पैसा लगाने में फंस जाता है तो दूसरे क्षेत्रों के लिए कर्ज की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है. निर्माण क्षेत्र को निवेश चाहिए, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग, MSME, कृषि, निर्यात और तकनीकी उद्योगों को भी पूंजी चाहिए. भारत को ऐसी बैंकिंग नीति की जरूरत है जिसमें पैसा केवल एक या दो क्षेत्रों में केंद्रित न हो, बल्कि रोजगार पैदा करने वाले विभिन्न क्षेत्रों तक पहुंचे. यहां सवाल केवल कर्ज की मात्रा का नहीं है. सवाल यह भी है कि किस क्षेत्र को, किस कीमत पर और कितनी आसानी से कर्ज मिल रहा है.

R&D पर कम खर्च का नुकसान बहुत बड़ा है

आज दुनिया में केवल सस्ता उत्पादन पर्याप्त नहीं है. जो देश बेहतर उत्पाद बनाता है, नई तकनीक विकसित करता है और गुणवत्ता सुधारता है, वही वैश्विक बाजार में टिकता है. भारत के कई उद्योगों में रिसर्च और डेवलपमेंट यानी R&D पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है. इसका असर चमड़ा, कपड़ा, मशीनरी और दूसरे पारंपरिक उद्योगों पर भी पड़ता है. अगर भारत को केवल कम लागत वाले उत्पाद बनाने से आगे बढ़कर ज्यादा मूल्य वाले उत्पाद बनाने हैं तो कंपनियों को डिजाइन, तकनीक, ऑटोमेशन, रिसर्च और नए उत्पादों पर निवेश करना होगा. सरकार को भी इस दिशा में कर प्रोत्साहन, शोध संस्थानों और उद्योगों के बीच साझेदारी तथा आसान वित्तीय सहायता की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए.

नौकरी पैदा करने वाली इंडस्ट्री को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा

भारत के सामने आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती केवल GDP बढ़ाना नहीं है. करोड़ों युवाओं को सम्मानजनक रोजगार देना उससे भी बड़ा लक्ष्य है. इसके लिए कपड़ा, जूते, चमड़ा, फूड प्रोसेसिंग, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली, ऑटो कंपोनेंट, पर्यटन और कई अन्य रोजगार-प्रधान क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर बढ़ाना होगा. सरकार को यह देखना होगा कि कौन-सा क्षेत्र 10 लाख या 1 करोड़ नए रोजगार पैदा कर सकता है. उसी हिसाब से नीति, टैक्स, कर्ज, जमीन, कौशल और निर्यात की सुविधा तैयार होनी चाहिए.

भारत की आर्थिक नीति का अगला चरण केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितनी फैक्ट्रियां लगीं. असली सवाल होना चाहिए- कितने लोगों को रोजगार मिला? उनकी आय कितनी बढ़ी? उत्पादन कितना बढ़ा? निर्यात कितना बढ़ा? और घरेलू बाजार में मांग कितनी मजबूत हुई? अगर फैक्ट्री लगती है, लेकिन रोजगार नहीं बढ़ता, मजदूरी नहीं बढ़ती और स्थानीय बाजार में मांग नहीं आती तो आर्थिक विकास का लाभ सीमित रह जाता है. हमें ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें उद्योग बढ़ें, नौकरी बढ़े, मजदूरी बढ़े और फिर बढ़ी हुई आय से बाजार भी बढ़े.

भारत के लिए अब नीति में बदलाव का समय

भारत के पास दुनिया की बड़ी युवा आबादी, बड़ा घरेलू बाजार और तेजी से विकसित हो रही तकनीकी क्षमता है. हमारे सामने अवसर की कमी नहीं है. समस्या यह है कि इन अवसरों को रोजगार और व्यापक आय में बदलने के लिए नीति को ज्यादा केंद्रित बनाना होगा. सरकार को मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा बढ़ाने के साथ-साथ श्रम-प्रधान उद्योगों पर विशेष ध्यान देना चाहिए. MSME को सस्ता कर्ज, निर्यातकों को बेहतर लॉजिस्टिक्स, उद्योगों को कम लागत वाली ऊर्जा, जमीन और मंजूरी की आसान व्यवस्था तथा कंपनियों और विश्वविद्यालयों के बीच R&D साझेदारी बढ़ानी चाहिए. साथ ही मजदूरी और रोजगार के आंकड़ों को भी आर्थिक नीति के केंद्र में लाना होगा. केवल GDP की रफ्तार देखकर यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है.

अंतिम सवाल: विकास किसके लिए?

भारत आज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां हमें खुद से एक सीधा सवाल पूछना चाहिए- क्या हमारी आर्थिक वृद्धि आम आदमी की आय और रोजगार में भी दिखाई दे रही है? अगर कारखानों की रफ्तार धीमी है, सेवाओं में नए कारोबार की गति घट रही है, मजदूरी में लंबे समय से ठहराव है और कंपनियों को मांग की चिंता है, तो हमें समस्या की जड़ तक जाना होगा. भारत को केवल तेज GDP वृद्धि नहीं चाहिए. भारत को ऐसी वृद्धि चाहिए जो नौकरी पैदा करे, मजदूरी बढ़ाए, घरेलू मांग मजबूत करे, MSME को खड़ा करे और वैश्विक बाजार में भारतीय उद्योगों को मजबूत बनाए.

सड़कें और इमारतें देश की जरूरत हैं, लेकिन स्थायी समृद्धि कारखानों, खेतों, कारोबार, तकनीक और लोगों की बढ़ती आय से आती है. इसलिए अब समय है कि भारत अपनी आर्थिक रणनीति को एक नए सूत्र पर खड़ा करे-“Growth without demand” नहीं, बल्कि “Growth with jobs, wages and demand.” क्योंकि आखिरकार अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा आंकड़ा GDP नहीं, आम आदमी की जिंदगी में आया वास्तविक बदलाव होता है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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