मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद हवन और गंगाजल, संसद में गूंजा मामला...जानें धर्मग्रंथ क्या कहते हैं

मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद मंच पर हवन और गंगाजल से ‘शुद्धिकरण’. ये मामला अब संसद तक पहुंच चुका है, लेकिन बड़ा सवाल राजनीति से आगे है...क्या किसी इंसान के आने से कोई स्थान अशुद्ध हो सकता है ?
मल्लिकार्जुन खरगे की हल्द्वानी रैली के बाद रामलीला मैदान में हवन और गंगाजल छिड़ककर कथित 'शुद्धिकरण' किया गया. अब यह मामला संसद तक पहुंच गया है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल राजनीति का नहीं, धर्म का है. क्या किसी व्यक्ति के आने से कोई मंच अशुद्ध हो सकता है? वेद, उपनिषद और गीता इस बारे में क्या कहते हैं?
हल्द्वानी के रामलीला मैदान में छिड़का गया गंगाजल अब संसद तक पहुंच गया है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके भाषण देने के बाद मंच का 'शुद्धिकरण' किया गया. खरगे अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं. इसलिए उन्होंने इस घटना को अपनी सामाजिक पहचान से जोड़ते हुए सवाल किया कि क्या उनके साथ अछूत जैसा व्यवहार किया गया?
यह केवल किसी एक पार्टी, नेता या संगठन से जुड़ा विवाद नहीं है. इसका असली सवाल कहीं बड़ा है. क्या सनातन धर्म किसी मनुष्य की मौजूदगी को अपवित्र मानता है? क्या गंगाजल और हवन का उपयोग राजनीतिक विरोध जताने या किसी व्यक्ति के चले जाने के बाद स्थान को 'शुद्ध' करने के लिए किया जाना चाहिए?
इसका उत्तर भावनाओं, नारों या राजनीतिक बयानों में नहीं, उन्हीं धर्मग्रंथों में खोजना चाहिए जिनके नाम पर ऐसी गतिविधियों को उचित ठहराने की कोशिश होती है. शास्त्रों को सामने रखकर देखा जाए तो मनुष्य को अशुद्ध बताने वाली यह सोच सनातन के मूल आध्यात्मिक सिद्धांतों के सामने टिकती दिखाई नहीं देती.
खरगे ने संसद में कहा- क्या मेरे साथ अछूत जैसा व्यवहार हुआ?
मल्लिकार्जुन खरगे ने 8 अगस्त 2026 को हल्द्वानी के रामलीला मैदान में 'विजय शंखनाद' रैली को संबोधित किया था. इसके बाद श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास के सदस्यों ने मैदान में हवन किया और गंगाजल छिड़का. इस आयोजन को 'शुद्धिकरण' बताया गया.
13 अगस्त को खरगे ने राज्यसभा में यह मामला उठाया. उन्होंने कहा कि उनके संबोधन के बाद मंच का शुद्धिकरण किया जाना बेहद गंभीर है. उन्होंने इस कृत्य को दलित सम्मान और अस्पृश्यता से जोड़ते हुए कार्रवाई की मांग की.
जवाब में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने घटना पर दुख जताया. उन्होंने कहा कि भाजपा ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती. नड्डा ने मामले की जांच कराने का आश्वासन भी दिया. वहीं, संबंधित संगठन का कहना है कि उसका विरोध खरगे की जाति से नहीं था. संगठन के अनुसार, कार्यक्रम में कथित आपत्तिजनक नारे लगाए गए थे और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व वाले रामलीला मैदान का इस्तेमाल राजनीतिक आयोजनों के लिए नहीं होना चाहिए.
संगठन की सफाई अपनी जगह है. लेकिन सवाल फिर भी बचा रहता है. यदि आपत्ति किसी नारे, भाषण या राजनीतिक आयोजन से थी तो उसका लोकतांत्रिक विरोध किया जा सकता था. मंच को 'अशुद्ध' बताकर गंगाजल छिड़कना बिल्कुल अलग और बेहद संवेदनशील संदेश देता है. खासकर तब, जब वहां से संबोधित करने वाला देश का एक बड़ा दलित नेता हो.
धर्मग्रंथों ने भी खोल दी इस पाखंड की पोल
सनातन परंपरा में गंगाजल, हवन और शुद्धि का अत्यंत पवित्र स्थान है. इनका उद्देश्य मन, वातावरण और आचरण में सात्विकता लाना है. लेकिन किसी मनुष्य के जाने के बाद उसके इस्तेमाल किए गए मंच को अशुद्ध घोषित करना धार्मिक शुद्धि नहीं कहा जा सकता.
गीता, उपनिषद और वैदिक दर्शन का मूल विचार यह है कि प्रत्येक जीव में एक ही परमात्मा का अंश मौजूद है. ऐसे में जन्म, जाति या सामाजिक पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति के स्पर्श अथवा मौजूदगी को अपवित्र मानना इसी आध्यात्मिक विचार का विरोध बन जाता है.
धार्मिक प्रतीकों का उपयोग यदि किसी इंसान को नीचा दिखाने के लिए किया जाए तो उससे धर्म की रक्षा नहीं होती. उल्टा धर्म की उदार और समावेशी छवि को नुकसान पहुंचता है.
गीता का 'समदर्शन' क्या सिखाता है?
श्रीमद्भगवद्गीता के पांचवें अध्याय के 18वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥
इसका भाव है कि सच्चा ज्ञानी विद्या और विनय से संपन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और उस समय समाज के सबसे उपेक्षित माने जाने वाले व्यक्ति में भी एक ही आत्मतत्त्व देखता है.
यह श्लोक सामाजिक भूमिकाओं को मिटाने की सीधी राजनीतिक घोषणा नहीं है. लेकिन इसका आध्यात्मिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट है. आत्मा के स्तर पर कोई मनुष्य अपवित्र, छोटा या घृणा के योग्य नहीं है. जो व्यक्ति सबमें एक ही परम तत्व देखता है, गीता उसे ज्ञानी बताती है.
गीता के छठे अध्याय में भी योगी की पहचान बताते हुए कहा गया है कि वह सभी प्राणियों में आत्मा और आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है. इसलिए किसी व्यक्ति की उपस्थिति को प्रदूषित मानना गीता के 'समदर्शन' से मेल नहीं खाता.
'गुण और कर्म' का अर्थ जन्म से श्रेष्ठता नहीं
इस विवाद में गीता के चौथे अध्याय का प्रसिद्ध श्लोक भी महत्वपूर्ण है-
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः.
यहां भगवान श्रीकृष्ण सामाजिक विभाजन की चर्चा 'गुण' और 'कर्म' के आधार पर करते हैं. इस श्लोक को केवल एक पंक्ति में जन्म आधारित जाति व्यवस्था की संपूर्ण स्वीकृति या अस्वीकृति घोषित करना शास्त्रीय रूप से जल्दबाजी होगी.
भगवान श्रीकृष्ण साफ कहते हैं कि समाज का यह वर्गीकरण किसी के जन्म (जाति) के आधार पर नहीं, बल्कि उसके गुण (Attributes,Talent) और कर्म (Action, Profession) के आधार पर है. अलग-अलग आचार्यों ने इसकी अलग व्याख्याएं की हैं.
इसके बावजूद इतना स्पष्ट है कि इस श्लोक में किसी मनुष्य के स्पर्श से भूमि, मंच या समाज के अशुद्ध हो जाने की बात नहीं कही गई. न ही यह किसी नेता के जाने के बाद हवन कर स्थान को पवित्र करने का आधार देता है.
यदि कोई धार्मिक आचरण व्यक्ति के गुण और कर्म को छोड़कर केवल उसकी सामाजिक पहचान पर निर्णय सुनाता है तो वह गीता के बताए विवेक से दूर जाता है.
उपनिषद कहते हैं- सबमें स्वयं को देखने वाला घृणा कैसे करेगा?
ईशावास्य उपनिषद का छठा मंत्र इस विषय को और साफ करता है. इसमें कहा गया है कि जो सभी प्राणियों को अपने भीतर और स्वयं को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा नहीं करता.
यह सनातन दर्शन की सबसे ऊंची शिक्षाओं में से एक है. यहां शुद्धता शरीर, जाति या सामाजिक दर्जे से नहीं, दृष्टि से जुड़ी है. मन में घृणा, अहंकार और भेद हो तो केवल गंगाजल छिड़क देने से चेतना पवित्र नहीं हो जाती.
यही इस विवाद की सबसे बड़ी विडंबना है. गंगा को भारतीय परंपरा करुणा, मोक्ष और सबके कल्याण का प्रतीक मानती है. उसी गंगाजल को यदि किसी मनुष्य के बाद स्थान साफ करने के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया जाए तो यह गंगा की समावेशी भावना को ही संकुचित कर देता है.
हर शुद्धिकरण छुआछूत नहीं, लेकिन संदर्भ को नजरअंदाज नहीं कर सकते
यह समझना भी जरूरी है कि हिंदू परंपरा में प्रत्येक शुद्धिकरण अनुष्ठान जातिगत भेदभाव नहीं होता. मंदिरों, घरों और धार्मिक स्थलों पर विशेष पूजा, प्राण प्रतिष्ठा, जीर्णोद्धार, मृत्यु-संबंधी संस्कार या किसी निर्धारित धार्मिक नियम के बाद शुद्धि विधियां होती हैं.
लेकिन हल्द्वानी की घटना का संदर्भ अलग है. यहां एक सार्वजनिक राजनीतिक रैली के तुरंत बाद उसी स्थान पर 'शुद्धिकरण' किया गया. रैली को एक ऐसे नेता ने संबोधित किया जो दलित समुदाय से आता है. इसी कारण इस अनुष्ठान के प्रतीकात्मक अर्थ पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
आयोजकों की मंशा की अंतिम पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है. बिना जांच के यह घोषित करना उचित नहीं होगा कि अनुष्ठान केवल खरगे की जाति के कारण हुआ. लेकिन यह कहना भी पर्याप्त नहीं कि यह सामान्य धार्मिक आयोजन था. 'शुद्धिकरण' शब्द का चयन और घटना का समय सामाजिक रूप से गंभीर संदेश देते हैं.
संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया, कानून ने दंडनीय बनाया
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और उसके किसी भी रूप में व्यवहार को प्रतिबंधित करता है. अस्पृश्यता से उत्पन्न निर्योग्यता लागू करना कानून के अनुसार दंडनीय है. हालांकि किसी विशिष्ट घटना में अपराध बनता है या नहीं, इसका फैसला तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी जांच से होगा.
इसलिए राजनीतिक बयान और कानूनी निष्कर्ष के बीच अंतर रखना आवश्यक है. खरगे ने कार्रवाई की मांग की है. नड्डा ने जांच का आश्वासन दिया है. अब जिम्मेदारी संबंधित प्रशासन और जांच एजेंसियों की है कि वे पता लगाएं कि आयोजन किसने किया, उसका घोषित उद्देश्य क्या था और उसमें शामिल लोगों ने वास्तव में क्या कहा.
धर्म की रक्षा गंगाजल से नहीं, सही आचरण से होगी
हल्द्वानी की घटना हमें एक असहज प्रश्न के सामने खड़ा करती है. क्या हम धार्मिक प्रतीकों का उपयोग मनुष्य को जोड़ने के लिए कर रहे हैं या उसे अपमानित करने के लिए?
सनातन धर्म की शक्ति उसकी विशालता में है. वह एक ही आत्मा को सभी जीवों में देखने की शिक्षा देता है. वह मन की शुद्धि, अहंकार के त्याग और समदृष्टि की बात करता है. ऐसे धर्म के नाम पर किसी मनुष्य की मौजूदगी को अशुद्ध बताना धर्म की रक्षा नहीं, उसकी मूल भावना को छोटा करना है.
गंगाजल छिड़कने से पहले मन में जमा जातिगत अहंकार, राजनीतिक घृणा और सामाजिक भेदभाव का शुद्धिकरण अधिक जरूरी है. क्योंकि गीता का संदेश साफ है, ज्ञानी वह नहीं जो दूसरों को अशुद्ध घोषित करे, बल्कि वह है जो सबमें उसी एक परमात्मा को देख सके.
यही सनातन का वास्तविक सत्य है. और इसी सत्य के सामने धर्म के नाम पर किया गया प्रत्येक भेदभाव अंततः पाखंड साबित होता है.


























