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Opinion: राजनीतिक दलों के लिए क्यों इतना जरूरी हो गया IT सेल?

 संघटन के ढांचे को मजबूत करने पर जोर देने के बजाय आईटी सेल के जरिये लोगों के बीच अपने नारे और विपक्ष के लिए जबाव पहुंचाना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है. राजनीतिक पार्टियों के लिए कार्यकर्ता तैयार करने की प्रक्रिया को स्थगित करना और आईटी सेल के लिए ठेके पर बहाली के बजट का इंतजाम करना प्राथमिक हो गया है. इसकी वजहों को समझने के लिए अपने देश के संदर्भ में समझने के साथ वैश्विक स्तर पर राजनीतिक उद्देश्यो में आए बदलाव की पृष्ठभूमि पर नजर डाली जा सकती है .

दूसरे विश्व युद्ध के बाद से पूरी दुनिया में लोगों के बीच बराबरी और आजादी के विचारों का प्रभाव बढ़ा, लेकिन राजनीतिक स्तर पर इस विचार का प्रभाव धीरे धीरे इस सदी आखिरी वर्षों में बेहद कमजोर हो गए. खासतौर से पूरी दुनिया के लिए बना गई ग्लोबलाइजेशन की नीतियों ने इन विचारों के आधार पर होने वाली राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा को उल्टी दिशा में मौड़ दिया. ग्लोबलाइजेशन और नई टेक्नॉलॉजी के बीच गहरा रिश्ता बनाया गया है.  

मार्क गुटेनबर्ग के  प्रिंटिंग प्रेस और 20वी सदी तक रेडियो-टेलीविजन के बाद 1950 के दशक में इंटरनेट आया और तकरीबन 1989 तक वो www यानी वर्ल्ड वाइड वेब से जुड़ा जिसने एक सूचना की क्रांति को जन्म दिया. जब सोशल मीडिया आया तो इसने इंटरनेट के मिज़ाज़ को बदल दिया. उसने प्रत्येक व्यक्ति को एक उपभोक्ता में बदल दिया. यह देखा गया कि सोशल मीडिया का सर्वाधिक प्रभाव 2011 के बाद देखने को मिला. इस तरह इंटरनेट की तकनीक के विस्तार के साथ पूरी दुनिया में राजनीतिक मिजाज को बदलते देखा जा सकता है.
  
इसी तरह भारत में दिसंबर, 2003 के अंत में देश में ब्रॉडबैंड, इंटरनेट और पर्सनल कंप्यूटर (पीसी) की पहुंच क्रमशः 0.02%, 0.4% और 0.8% थी, लेकिन भारत में इंटरनेट केनक्शन 2014 में 25.15 करोड़ से बढ़कर 2024 में 96.96 करोड़ हो गए. 85.5 प्रतिशत घरों के पास कम से कम एक स्मार्ट फोन है. वर्ष 2024 में 48 प्रतिशत इंटरनेट यूजर्स ने ऑनलाइन वीडियों देखें. 43 प्रतिशत ने सोशल मीडिया एक्सेस किया. 40 प्रतिशत ने ईमेल का इस्तेमाल किया. सोशल मीडिया के लिए 35 करोड़ उपयोगक्रताओं की हिस्सेदारी है.

राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा में पार्टियां लोगों को किसी मुद्दे पर एकजूट करने और सहमति बनाने के लिए वास्तविक तौर पर सक्रिय करने की जरुरत महसूस करती रही है. इसके लिए संगठन तैय़ार करने होते थे, लेकिन राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा के लिए वास्तविक जमीन और लोगों से संपर्क की जगह नई तकनीक की जगह बन गई. इस देश में 2004 में सत्ता परिवर्तन हुआ. यह दौर था जब मनमोहन सिंह के नेतृत्व में ग्लोबलाइजेशन की नीतियों के अनुरुप भारतीय समाज में नई तकनीक का तेजी से विस्तार करने पर जोर दिया गया. भाजपा मुख्य विपक्षी पार्टी के रुप में उस गति को और तेज करने की प्रतिस्पर्द्धा कर रही थी. यह स्पष्ट रुप से देखा जा सकता है कि ग्लोबलाइंजेशन की नीतियों को ज्यादा तेज गति से लागू करने पर भाजपा का जोर रहा तो दूसरी तरफ उसी तरह पार्टी के स्तर पर नई तकनीक से जोड़ने की कोशिश भी चल रही थी.

2014 तक भारत में 25 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट कनेक्शन उन लोगों के बीच था जिनका तमाम क्षेत्रों में दबदबा था. यह इंटरनेट वर्ग ग्लोबलाइजेशन की नीतियों के बीच विकसित हुआ और वह ग्लोबलाइजेशन की नीतियों को लागू करने की गति को तेज करने के पक्ष में था. भाजपा उन्हें नई तकनीक के मिजाज के मुताबिक संबोधित करने में सफल रही. दरअसल नई तकनीक से राजनीतिक सत्ता केलिए सफलता के इस दावे ने राजनीतिक प्रतिस्पर्द्दा की सूरत बदल दी. पुरानी पीढ़ी राजनीति से बाहर होने के कागार पर खड़ी थी और नई पीढ़ी को पुरानी राजनीतिक प्रक्रियाओं से रिश्ता भंग था. लिहाजा नई तकनीक को स्वीकार करने और उसका एक ढांचागत स्वरुप खड़ा करने की प्रतिस्पर्दधा राजनीति के लिए मुख्य हो गई. भाजपा के पास गुजरात जैसे संपन्न राज्य में सत्ता थी. नई तकनीक के लिए संसाधनों की किल्लत नहीं महसूस हुई. 

संसदीय राजनीति में प्रतिस्पर्द्दा का लक्ष्य सत्ता हासिल करना है. इसके दो रास्ते हो सकते हैं. एक रास्ता तो राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए सत्ता और सत्ता के लिए तकनीक का इस्तेमाल करना हो सकता है. दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि नई तकनीक और सत्ता के जरिये अपना वर्चस्व कायम करना. भारत में संसदीय पार्टियां दूसरे रास्ते पर चलने की प्रतिस्पर्द्धा में ढल गई. हर संसदीय पार्टी ने नई तकनीक पर जोर दिया और अपनी अपनी हैसियत के मुताबिक तकनीक आधारित एक ढांचा तैयार कर लिया. नई तकनीक आधारित ढांचे के निर्माण के साथ नई तकनीक को तरह तरह से बरतने के लिए प्रशिक्षित लोगों और विशेषज्ञों की जरुरत ने प्रमुखता कर ली. 

मजे की बात यह है कि नई तकनीक का और उसके जरिये करोबार करने दुनिया की बड़ी बड़ी कंपनियों ने राजनीतिक पार्टियों के बीच अपने एप्स, विशेषक्षता को इस्तेमाल किए जाने की जरुरतें पैदा की और पार्टियों ने उसके लिए बजट और मिजाज का इंतजाम को प्राथमिकता देने लगी. मसलन 2019 के चुनाव के लिए यह माना जाता है कि उस चुनाव में सबसे ज्यादा कामयाबी व्हाट्स एप के जरिये हासिल की गई. यानी एप्स का इस्तेमाल, सोशल मीडिया के मंचों का इस्तेमाल, लोगों के बारे में डाटा की जरुरत , उन डाटा को इस्तेमाल करने के लिए विशेषज्ञों की जरुरत आदि एक बड़े और खर्चीले मास मीडिया के ढांचे की तरफ राजनीतिक पार्टियों को ले जाता है. इसे ही आईटी सेल कहते हैं.

वहां केवल अपनी बात इस तकनीक का इस्तेमाल करने वालों के बीच ले जानी है बल्कि नई तकनीक का इस्तेमाल करने वाले लोगों के बीच भ्रम की भाषा तो तैयार करने, झूठ फैलाने, विरोधियों के लिए उकसाने या विरोधियों को लाजबाव करने आदि कामों के लिए प्रशिक्षित लोगों की जरुरतें होने लगी. 

राजनीतिक पार्टियों का आईटी सेल किसी एक बड़ी कंपनी का वर्क प्लेस सा दिखता है, लेकिन यह वर्क प्लेस वार रुम कहलाता है. आईटी सेल ने राजनीति को वार यानी युद्ध में बदल दिया है. नई तकनीक आक्रमकता के लिए इस्तेमाल की जा रही है क्योंकि वह वर्चस्व कायम रखने व करने की होड़ में लगाई गई है. आईटी सेल का लक्ष्य बराबरी और आजादी का नारा नहीं हैं.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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