गन्ने से कैसे बनता है प्लास्टिक, किसान ऐसे भी कर सकते हैं कमाई?
गन्ने के रस और बगास से बायो-प्लास्टिक बनाकर किसान अपनी आमदनी को कई गुना बढ़ा सकते हैं, पर्यावरण के अनुकूल इस तकनीक से प्लास्टिक प्रदूषण घटेगा और किसानों को फसलों का बेहतर दाम भी मिलेगा.

उत्तरप्रदेश के लखीमपुर जिले के कुंभी में देश का पहला बड़े पैमाने का गन्ने से बायो-प्लास्टिक बनाने वाला मेगा प्लांट स्थापित किया जा रहा है. बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड करीब 2,850 करोड़ रुपये के बड़े निवेश से इस परियोजना पर काम कर रही है, जो अक्टूबर 2026 से चालू होने जा रहा है. इश अत्याधुनिक प्लांट में हर साल लगभग 80,000 टन पॉलीलैस्टिक एसिड का उत्पादन करने की क्षमता होगी, जो सीधे तौर पर गन्ने से तैयार किया जाएगा. यह नई तकनीक देश के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले और कच्चे तेल पर आधारित पारंपरिक प्लास्टिक पर हमारी निर्भरता को बहुत कम कर देगी.
गन्ने से कैसे तैयार होता है यह खास प्लास्टिक
गन्ने के रस और अवशेषों से बायो-प्लास्टिक बनाने की वैज्ञानिक प्रक्रिया बहुत ही आसान और पर्यावरण के अनुकूल है. सबसे पहले गन्ने की कटाई करके उसमें से शुगर निकाली जाती है. इस शुगर को विशेष सूक्ष्म जीवों के माध्यम से फर्मेंटेशन प्रक्रिया से गुजारकर लैक्टिक एसिड में बदल दिया जाता है.
इसके बाद रासायनिक प्रक्रिया के जरिए लैक्टिक एसिड के अणुओं को आपस में जोड़कर पॉलीलैक्टिक एसिड का निर्माण किया जाता है. यही PLA वह बायो-पॉलीमर है जिसका इस्तेमाल कारखानों में बिल्कुल सामान्य प्लास्टिक की तरह-तरह के सामान बनाने में किया जाता है.
पर्यावरण के लिए बेहद गुणकारी है यह प्लास्टिक
पारंपरिक प्लास्टिक जहां सैकड़ों वर्षों तक मिट्टी और प्रदूषण फैलाता है, वहीं गन्ने से बना बायो-प्लास्टिक पूरी तरह से प्रकृति में घुलनशील होता है. यह इस्तेमाल के बाद बहुत ही कम समय में मिट्टी में मिलकर पूरी तरह नष्ट हो जाता है और खाद में बदल जाता.
इस प्रयावरण अनुकूल प्लास्टिक का उपयोग रोजाना काम आने वाले सामान जैसे कप-प्लेट, कैरी बैग, पैकिंग फिल्म और कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाली मल्चिंग शीट बनाने में किया जा सकता है. सबसे अच्छी बात यह है कि इस प्लास्टिक के निर्माण में किसी तरह के जहरीले रसायनों का उपयोग नहीं होता है.
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गन्ने के अवशेषों से किसानों की होगी मोटी कमाई
इस नई तकनीक और उधोगों के आने से देश भर के गन्ना किसानों के लिए अतिरिक्त कमाई के कई नए रास्ते खुल गए हैं. पहले किसान गन्ने का रस निकालने के बाद बची हुई खोई को कचरा समझकर या तो फेंक देते थे या खेतों में जला देते थे, जिससे प्रदूषण फैलता था.
लेकिन अब चीनी मिलों के पास ही ये बायो-प्लास्टिक प्लांट लगने से किसानों से इन अवशेषों को अच्छे दामों पर खरीदा जा रहा है. किसान अब गन्ने की मुख्य फसल चीनी मिलों को बेचने के साथ-साथ अपने कृषि कचरे को भी उधोगों को बेचकर बंपर मुनाफा कमा सकते है.
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