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फसल की बर्बादी और घाटे का टेंशन खत्म, इस सरकारी स्कीम के तहत किसानों को मिलती है पूरी सुरक्षा

PM-AASHA Scheme: पीएम-आशा योजना किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव और घाटे से बचाने का एक मजबूत सरकारी कवच है. इसके तहत एमएसपी पर फसल खरीद और नुकसान की सीधी भरपाई की गारंटी मिलती है.

PM-AASHA Scheme: खेती-किसानी में सबसे बड़ी टेंशन यही होती है कि दिन-रात मेहनत करके फसल तो उगा ली. लेकिन अगर मार्केट में सही दाम नहीं मिला या मौसम की मार पड़ गई तो पूरी लागत डूब जाती है. इसी घाटे और अनिश्चितता के डर को खत्म करने के लिए सरकार ने एक बेहद दमदार कवच तैयार किया है. जिसका नाम है प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान यानी पीएम-आशा योजना. 

यह कोई आम स्कीम नहीं है बल्कि देश के अन्नदाताओं की जेब को सुरक्षित रखने और उन्हें उनकी उपज का वाजिब हक दिलाने वाली एक फुल-प्रूफ गारंटी है. आज का मॉडर्न किसान सिर्फ फसल उगाना नहीं जानता बल्कि वह अपने अधिकारों और सरकारी फायदों के प्रति भी पूरी तरह अपडेट रहता है. तो जान लीजिए कैसे यह योजना किसानों को बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाकर उनके मुनाफे को पक्का करती है.

पीएम-आशा योजना कैसे काम करती है?

इस कमाल की योजना को जमीन पर पूरी तरह कामयाब बनाने के लिए सरकार इसे तीन अलग-अलग हिस्सों में चलाती है. जिससे किसी भी राज्य के किसान को कोई दिक्कत न हो. इसका पहला हिस्सा है मूल्य समर्थन योजना (PSS), जिसके तहत दालों, तिलहन और खोपरा जैसी फसलों की बाजार में कीमत गिरने पर सरकारी एजेंसियां खुद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर इसे सीधे किसानों से खरीदती हैं. 

दूसरा हिस्सा है मूल्य न्यूनता भुगतान योजना (PDPS) जो खास तौर पर तिलहन फसलों के लिए है. इसमें अगर किसान अपनी फसल मंडी में एमएसपी से कम दाम पर बेचता है. तो सरकारी रेट और बेचे गए रेट के बीच का जो भी अंतर यानी घाटा होता है वह पैसा सीधे किसान के बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता है. तीसरा हिस्सा निजी क्षेत्र की भागीदारी का है जहां प्राइवेट प्लेयर भी एमएसपी पर खरीद का जिम्मा संभालते हैं.

यह भी पढ़ें: खेत के बीच नहीं, किनारों पर भी होती है कमाई! जानिए मेड़ पर खेती से कितना मुनाफा?

किसानों को कैसे मिलता है इसका फायदा?

पीएम-आशा योजना का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह किसानों को बिचौलियों और आढ़तियों के चंगुल से पूरी तरह आजाद कराती है. पहले जब बंपर पैदावार होती थी. तो बाजार में अचानक दाम गिर जाते थे और किसानों को मजबूरी में अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ती थी. जिससे लागत निकालना भी भारी हो जाता था. लेकिन इस स्कीम के आने के बाद किसानों को अपनी उपज की सुरक्षित कीमत की पक्की गारंटी मिल गई है. 

कैसे खत्म होता है घाटा?

जब सरकार खुद एमएसपी पर फसल खरीदने या नुकसान की भरपाई करने की जिम्मेदारी उठाती है. तो बाजार में भी फसलों के दाम एक लिमिट से नीचे नहीं गिर पाते. इससे छोटे और सीमांत किसानों को सीधे तौर पर आर्थिक मजबूती मिलती है. उनका हौसला बढ़ता है और वे बिना किसी डर के आधुनिक खेती में नया निवेश कर अपनी इनकम को कई गुना बढ़ा सकते हैं.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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