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साधारण धान छोड़ अपनाएं काला नमक चावल की खेती, कम खाद-पानी में किसानों की तिजोरी भरेगी यह फसल

Kala Namak Rice Cultivation: कम लागत और कम पानी में तैयार होने वाला काला नमक चावल अपनी लाजवाब खुशबू और औषधीय गुणों की वजह से आजकल मार्केट में धूम मचा रहा है. जानें इसकी खेती का सही तरीका.

Kala Namak Rice Cultivation: अगर आप हर साल सामान्य धान की खेती करके सीमित मुनाफा कमा रहे हैं. तो इस बार काला नमक धान एक बेहतर विकल्प बन सकता है. अपनी खास खुशबू, बेहतरीन स्वाद और प्रीमियम बाजार कीमत की वजह से यह धान किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश की पहचान बन चुकी यह पारंपरिक किस्म अब दूसरे इलाकों के किसानों का भी ध्यान खींच रही है. 

इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे सामान्य धान की तुलना में कम रासायनिक खाद और कम पानी की जरूरत पड़ती है. यही वजह है कि खेती की लागत घटती है और अच्छी कीमत मिलने से किसानों की कमाई बढ़ने की संभावना भी रहती है. बदलते मौसम में भी यह किस्म बेहतर प्रदर्शन करने वाली धान की फसलों में गिनी जाती है.

काला नमक धान की खेती क्यों है खास?

काला नमक धान प्राकृतिक खेती के लिए काफी उपयुक्त माना जाता है. इस फसल में रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जरूरत अपेक्षाकृत कम पड़ती है. जिससे लागत घटती है और मिट्टी की गुणवत्ता भी बनी रहती है. इसकी फसल कम पानी में भी अच्छी तरह तैयार हो जाती है, इसलिए जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा सीमित है वहां भी किसान इसे आसानी से उगा सकते हैं. 

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इसकी खुशबू और स्वाद इसे सामान्य चावल से अलग पहचान देते हैं, जिसके कारण बाजार में इसकी मांग लगातार बनी रहती है. कई किसान प्राकृतिक खेती के जरिए इस धान का उत्पादन कर बेहतर दाम हासिल कर रहे हैं. इसके अलावा यह किस्म कई सामान्य रोगों के प्रति भी बेहतर सहनशील मानी जाती है.

क्या है इसकी खेती का सही तरीका?

काला नमक चावल की खेती की शुरुआत जून के महीने में नर्सरी डालने से होती है. लगभग 25 से 30 दिन में जब पौधे रोपाई के लायक हो जाते हैं. तब जुलाई के दौरान इन्हें तैयार खेतों में लगा दिया जाता है. इसकी खेती में लाइन से लाइन की दूरी का ध्यान रखा जाता है जिससे पौधों को फैलने की पूरी जगह मिले. 

चूंकि यह एक पारंपरिक और जैविक फसल है. इसलिए इसमें रासायनिक कीटनाशकों की जगह नीम का तेल या देसी नुस्खे इस्तेमाल किये जाते हैं. अक्टूबर के आखिरी या नवंबर की शुरुआत में जब इसकी बालियां सुनहरी और नीचे की तरफ झुकने लगती हैं तब इसकी कटाई की जाती है. ध्यान रहे कि कटाई के समय नमी सही हो जिससे दानों की खुशबू और क्वालिटी एकदम परफेक्ट बनी रहे.

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इन बीमारियों में माना जाता है फायदेमंद

काला नमक चावल सिर्फ अपनी खुशबू और स्वाद के लिए ही नहीं बल्कि पोषण के लिए भी जाना जाता है. इसमें आयरन, जिंक और एंटीऑक्सीडेंट जैसे कई जरूरी पोषक तत्व पाए जाते हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक यह एनीमिया, मधुमेह, पाचन संबंधी समस्याओं और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाए रखने में मददगार माना जाता है. इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स सामान्य चावल की तुलना में कम होता है. इसलिए इसे संतुलित मात्रा में डायबिटीज के मरीजों के लिए भी बेहतर ऑप्शन माना जाता है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

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