Paddy Cultivation: धान की फसल में ऐसे पहचानें बीमारियां, इस तरीके से करें रोगी फसल का इलाज
Paddy Crop Management: धान की फसल में बीमारियों की रोकथाम के लिये निगरानी करते रहना चाहिये. जिससे रोगों के लक्षणों की पहचानकर फसल का सही इलाज किया जा सके.

Disease Control in Paddy: भारत में धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, लेकिन फसल को सही देखभाल न मिलने के कारण धान की ज्यादा पैदावार नहीं मिल पाती. कभी-कभी धान की क्वालिटी भी गिर जाती है, जिसके पीछे कीड़े और बीमारियों का आतंक एक बड़ा कारण है. इस समस्या के समाधान के लिये फसलों की निगरानी करके कीड़े और रोगों के लक्षणों की पहचान करें, ताकि समय रहते छिड़काव का काम किया जा सके.
ब्लास्ट रोग
- ये बीमारी धान की नर्सरी और रोपाई के बाद पौधों की पत्तियों, तना और गांठों पर असर डालती है.
- ब्लास्ट रोग होने पर धान की पत्तियां नीले रंग के धब्बों से घिर जाती हैं, जो बाद में भूरे रंग के दिखते हैं.
- इस बीमारी के लगने पर 30 से 40 फीसदी तक धान की पैदावार खराब हो जाती है.
- इसके समाधान के लिये बुवाई से पहले ट्राइकोडर्मा विरिडी की 10 ग्राम दवा से एक किलो बीजों का उपचार करना चाहिये.

ब्राउन स्पॉट
- धान की नर्सरी में फूल आने के दो सप्ताह बाद ये बीमारी पत्तियों और फूलों में साफ दिख जाती है.
- इसे लोकल भाषा में फफूंद या झुलसा रोग भी कहते हैं, जिसमें पौधों की पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बे नजर आते हैं.
- इस बीमारी की रोकथाम के लिये भी विशेषज्ञ ट्राइकोडर्मा विरिडी की 5-10 ग्राम मात्रा से एक किलो बीजों का बीजोपचार करके बुवाई करने की सलाह देते हैं.
- किसान चाहें तो नीम से बने कीट नाशकों का फसल पर छिड़काव करने से भी काफी लाभ मिलता है.
स्टेम रॉट
- धान में लगने वाली इस बीमारी में पत्तियों में घाव बन जाते हैं, बाद में पत्तियां पीली पड़कर सड़ने लगती है और टूट जाती है.
- इसकी रोकथाम के लिये एक ग्राम स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट और टेट्रासाइक्लीन के साथ कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की 30 ग्राम मात्रा को दस लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिड़कें.
सफेदा रोग
- सफेदा रोग की समस्या नर्सरी में लौह तत्वों की कमी के कारण बढ़ती है.
- इस बीमारी में धान की नई पत्तियां कागज जैसी सफेद हो जाती हैं.
- इसके समाधान के लिये 5 ग्राम फेरस सल्फेट, 20 किलो यूरिया या फिर ढाई किलो बुझे चूने को 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें.

खैरा रोग
- फसल में जिंक की कमी से खैरा रोग होता है, जिसमें पहले पत्तियां पीली और बाद में भूरे रंग के धब्बे पत्तियों पर पड़ने लगते हैं.
- इसके समाधान के लिये खेत तैयार करते समय 20 से 25 किलो जिंक सल्फेट को आखिरी जुताई से पहले मिट्टी में मिलायें.
- खड़ी फसल में खैरा रोग लगने पर 5 किलो जिंक सल्फेट को 20 किलो यूरिया या ढाई किलो बुझे चूने में घोलकर फसल में डालना चाहिये.
Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और जानकारियों पर आधारित है. ABPLive.com किसी भी तरह की जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.
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Source: IOCL
























