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सरकार ने बैन किया खेतों में इस्तेमाल होने वाला जानलेवा पैराक्वाट, जानें यह कितना खतरनाक?

Paraquat Dichloride Ban In India: खेतों में घास मारने वाला खतरनाक केमिकल पैराक्वाट अब भारत में बैन होने जा रहा है. जान लें यह इंसानों के लिए कितना खतरनाक.

Paraquat Dichloride Ban In India: खेतों में खरपतवार साफ करने के लिए इस्तेमाल होने वाला केमिकल पैराक्वाट डाइक्लोराइड अब भारत में इतिहास का हिस्सा बनने जा रहा है. सरकार ने इस खतरनाक हर्बिसाइड के निर्माण, इम्पोर्ट, सेल और डिस्ट्रिब्यूशन पर पूरी तरह रोक लगाने का फैसला किया है. दुनिया के 70 से भी ज्यादा देशों में यह पहले से ही बैन है और अब भारत सरकार ने भी कीटनाशक अधिनियम 1968 के तहत इस पर कड़ा एक्शन लिया है. 

सरकार ने 30 दिनों का समय देकर आपत्तियां मांगी हैं. जिसके बाद यह पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाएगा. दरअसल यह केमिकल खेतों के लिए जितना असरदार माना जाता था. इंसानी जान के लिए उससे कहीं ज्यादा बड़ा खतरा साबित हो रहा था. सबसे डरावनी बात तो यह है कि मेडिकल साइंस के पास आज तक इस जानलेवा केमिकल का कोई तोड़ यानी एंटीडोट ही नहीं है. 

क्यों इसे माना गया है इतना खतरनाक?

पैराक्वाट सिर्फ खेतों की अनचाही घास को ही नहीं हटाता. बल्कि इसके संपर्क में आने वाले हर एक पौधे को पूरी तरह झुलसाकर सुखा देता है. यह पौधों में फोटोसिंथेसिस की प्रोसेस को ही रोक देता है. लेकिन यह जितना खतरनाक पौधों के लिए है. उससे कहीं ज्यादा इंसानों और जानवरों के लिए है. गांवों में किसान अक्सर बिना मास्क या दस्तानों के यानी बिना किसी सेफ्टी गियर के इसका छिड़काव करते हैं. 

ऐसे में यह स्किन के जरिए या सांस के रास्ते शरीर के अंदर चला जाता है. चूंकि इसका कोई एंटीडोट नहीं है. इसलिए शरीर में इसकी बेहद मामूली मात्रा भी सीधे मौत का कारण बन जाती है. इसी वजह से वैज्ञानिक लंबे समय से इसे बैन करने की मांग कर रहे थे. 

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शरीर में जाते ही करता है अटैक

अगर यह केमिकल गलती से भी किसी इंसान के शरीर में चला जाए तो यह सबसे पहले उसके रेस्पिरेट्री सिस्टम और आहारनाल पर अटैक करता है. इसके बाद मुंह और गले में भयंकर सूजन, पेट दर्द, खूनी उल्टी, डायरिया और नाक से खून आने जैसे खतरनाक लक्षण दिखने लगते हैं. कुछ ही घंटों में मरीज का ब्लड प्रेशर तेजी से गिरने लगता है. दिल की धड़कनें बेकाबू हो जाती हैं और दौरे पड़ने लगते हैं. 

यह सीधा लिवर, किडनी, फेफड़ों और हार्ट को डैमेज कर देता है. जिससे इंसान तड़प-तड़प कर दम तोड़ देता है. अस्पताल में ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट और सीटी स्कैन से इसका पता तो चल जाता है, लेकिन कोई सटीक इलाज न होने की वजह से डॉक्टर सिर्फ प्रभावित अंगों को सपोर्ट देने की कोशिश ही कर पाते हैं. यही वजह है कि अब इसे देश भर में बैन किया जा रहा है. 

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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