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मल्चिंग पॉलीहाउस तकनीक से फसलों को दें थ्री-लेयर सुरक्षा, कम पानी में होगी छप्परफाड़ पैदावार

Mulching Polyhouse Technology: मौसम और कीड़ों की मार से फसलों को बचाने के लिए मल्चिंग पॉलीहाउस तकनीक सबसे बेस्ट है. जान लें यह किस तरह काम करती है जिससे पानी की भी होती है बचत.

Mulching Polyhouse Technology:  बदलते मौसम, बढ़ती गर्मी और पानी की कमी ने खेती को पहले से ज्यादा चुनौती भरा काम बना दिया है. ऐसे में किसान ऐसी तकनीकों की तलाश में हैं, जो कम संसाधनों में बेहतर उत्पादन दे सकें. मल्चिंग पॉलीहाउस तकनीक इसी काम में तेजी से इस्तेमाल हो रही है. इस तकनीक में पॉलीहाउस, मल्चिंग शीट और ड्रिप सिंचाई का एक साथ यूज किया जाता है.

जिससे फसल को एक तरह की थ्री लेयर सुरक्षा मिलती है. तेज धूप, बारिश, ठंडी हवा और खरपतवार जैसी समस्याओं का असर काफी हद तक कम हो जाता है. इसके साथ ही पानी की बचत होती है और पौधों की बढ़वार भी बेहतर होती है. यही वजह है कि सब्जियों और बागवानी फसलों की खेती करने वाले किसान इस आधुनिक तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं.

कैसे काम करती है थ्री लेयर सुरक्षा वाली तकनीक?

इस तकनीक की पहली सुरक्षा पॉलीहाउस देता है जो फसल को तेज बारिश, ओलावृष्टि, तेज हवा और ज्यादा तापमान से बचाता है. दूसरी सुरक्षा मल्चिंग शीट देती है, जिसे पौधों के आसपास बिछाया जाता है. इससे मिट्टी की नमी लंबे समय तक बनी रहती है. खरपतवार कम उगते हैं और जड़ों को अनुकूल तापमान मिलता है. तीसरी सुरक्षा ड्रिप सिंचाई के जरिए मिलती है. 

जिसमें पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है. इससे पानी की बर्बादी काफी कम होती है और पौधों को जरूरत के मुताबिक नमी मिलती रहती है. इन तीनों तकनीकों के साथ काम करने से फसल का विकास तेज होता है. पौधे स्वस्थ रहते हैं और क्वालिटी भी बेहतर होती है. खासतौर पर टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च, स्ट्रॉबेरी और दूसरी सब्जियों की खेती में इसके अच्छे रिजल्ट देखने को मिल रहे हैं.

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कम पानी, ज्यादा उत्पादन और बेहतर मुनाफा

मल्चिंग पॉलीहाउस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इससे पानी की खपत पारंपरिक खेती की तुलना में काफी कम हो जाती है. मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और खरपतवार कम होने से मजदूरी पर होने वाला खर्च भी घटता है. नियंत्रित वातावरण मिलने की वजह से फसल पर मौसम का असर कम पड़ता है. जिससे पूरे सीजन में बेहतर क्वालिटी की उपज मिलती है. 

यही वजह है कि बाजार में ऐसी फसलों की मांग और कीमत दोनों अच्छी रहती हैं. हालांकि पॉलीहाउस लगाने में शुरुआती निवेश ज्यादा हो सकता है. लेकिन कई सरकारी योजनाओं के तहत इसके लिए सब्सिडी भी उपलब्ध है. सही फसल उसका वैज्ञानिक प्रबंधन और बाजार से सीधा जुड़ाव होने पर यह तकनीक किसानों के लिए कम लागत में ज्यादा उत्पादन और बेहतर मुनाफे दिला सकती है. 

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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