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Ash Gourd Cultivation: आगरा जैसा बेहतरीन पेठा बनाने के लिए अपने इलाके में उगाएं पेठा कद्दू, टूट जाएंगे कमाई के सभी रिकॉर्ड

Ash Gourd Cultivation: एक हेक्टेयर खेत में पेठा कद्दू की खेती करने पर 250-300 क्विंटल तक का उत्पादन मिल जाता है, जिसकी बिक्री के बाद आराम से 2 लाख से 3 लाख तक की आमदनी ले सकते हैं.

Petha Pumpkin Ash Gourd Cultivation: भारत की 'ताज नगरी' (Ash Gourd Cultivation)आगरा का पेठा पूरी दुनिया में मशहूर है. वैसे तो पेठे की मिठाई कई राज्यों में बनाई और बेची जाती है, लेकिन आगरा के पेठों का स्वाद कुछ अलह ही होता है. इसके पीछे बेहतरीन क्वालिटी और उन्नत किस्मों के कद्दू (Ash Gourd Variety) के साथ-साथ किसानों की मेहनत भी होती है, जिससे उनकी कमाई में भी मिठास भर जाती है. बता दें कि पेठा कद्दू मिठाई (Petha Sweet of Agra) के साथ-साथ सब्जी और कई प्रकार के व्यंजन बनाने के काम भी आता है. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में इसे भतुआ कोहड़ा, भूरा कद्दू, कुष्मान या कुष्मांड फल के नाम से भी जानते हैं.

इन राज्यों में उगायें कद्दू पेठा
पेठा कद्दू का रंग हल्का हरा होता है, जिस पर पाउडर जैसी परत चढ़ी होती है. इसकी उन्नत प्रजातियों के फल 1 से 2 मीटर तक की लंबाई वाले होते है, लेकिन गोल-आयताकार पेठा कद्दू की ज्यादा मांग रहती है. बात करें इसकी खेती के बारे में तो पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान समते भारत के कई किसान इसकी खेती करके अच्छी आमदनी कमा लेते हैं. सबसे अच्छी बात यही है कि पेठा कद्दू फसल के खराब होने का खतरा नहीं होता, क्योंकि पेठा मिठाई बेचने वाले इस सब्जी को हाथोंहाथ खरीद लेते हैं. किसान चाहें तो अपने इलाके में पेठा कद्दू की खेती और मिठाई कारोबार शुरू करके अच्छा पैसा कमा सकते हैं.

पेठा कद्दू की उन्नत किस्में
पेठा कद्दू की फसल से अच्छी आमदनी कमाने के लिये इसकी उन्नत किस्मों से ही खेती करें. इसके लिये कृषि वैज्ञानिकों ने  पूसा हाइब्रिड 1, काशी हरित कद्दू, पूसा विश्वास, पूसा विकास, सीएस 14, सीओ 1 व 2, हरका चंदन, नरेंद्र अमृत, अरका सूर्यमुखी, कल्यानपुर पंपकिंग 1, अंबली, पैटी पान, येलो स्टेटनेप, गोल्डेन कस्टर्ड जैसी देसी और हाइब्रिड किस्में विकसित की हैं, जो रोगरहित उत्पादन देती है. 

पेठा कद्दू की खेती का समय 
वैसे तो पेठा कद्दू की खेती साल भर में कई बार की जाती है, जिसमें सितंबर से अक्टूबर, फरवरी से मार्च और जून से जुलाई का महीना शामिल है, लेकिन जिसकी कीट-रोग रहित स्वस्थ फसल के लिये सितंबर से अक्टूबर के बीच पौधों की रोपाई करने की सलाह दी जाती है. किसान चाहें तो गंगा या यमुना नदी किनारे खाली पड़े रेतीले खेतों में भी इसकी फसल लगा सकते हैं. प्रति हेक्टेयर खेत में इसकी खेती के लिये 7-8 किलोग्राम बीजों के साथ नर्सरी तैयार की जाती है. 

खेत की तैयारी
पेठा कद्दू की खेती के लिये प्रति हेक्टेयर जमीन पर जुताई करके मिट्टी को भुरभुरा बना लें और पाटा लगायें. आखिरी जुताई से एक हेक्टेयर की दर से  40-50 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद, 20 किग्रा नीम की खली और 30 किलोग्राम अरंडी की खली मिलाना फायदेमंद रहता है. इसके अलावा बुवाई के समय 80 किग्रा नाइट्रोजन, 80 किग्रा फास्फोरस और 40 किग्रा पोटाश डालकर मिट्टी तैयार करना भी फायदेमंद रहता है.

पेठा कद्दू का फसल प्रबंधन
जाहिर है कि पेठा कद्दू एक बागवानी फसल है, जिसकी जैविक खेती करनेपर किसानों की लागत कम होती है और फसलों की क्वालिटी बढ़ती है. जैविक खेती के कारण फसल काफी अच्छे दामों पर बिक जाती है, इसलिये मिट्टी की जांच के आधार पर जैविक खाद-उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिये. पेठा कद्दू की फसल में अकसर खरपतवारों की समस्या बढ़ जाती है, जिसके लिये निराई-गुड़ाई करने की सलाह दी जाती है. फसल पर पत्तियों और फलों में अकसर कीट-रोगों का प्रकोप भी मंडराने लगता है, जिसकी रोकथाम के लिये गौमूत्र और नीम से बने जैविक कीटनाशक का प्रयोग करना फसल के लिहाज से फायदमंद रहता है.

पेठा कद्दू की तुड़ाई और आमदनी
पेठा कद्दू एक मध्यम अवधि की फसल है, दो रोपाई के बाद 3 से 4 महीने के अंदर पककर तैयार हो जाती है. इस समय फलों के ऊपर सफेद रंग के पाउडर की परत चढ़ जाती है, जिसकी तुड़ाई के लिये धारदार चाकू का इस्तेमाल करना चाहिये. एक हेक्टेयर खेत में पेठा कद्दू की खेती (Ash Gourd Cultivation) करने पर 250-300 क्विंटल तक का उत्पादन (Ash Gourd Production) मिल जाता है, जिसे 800-1000 रुपए प्रति क्विंटल के भाव पर बेचा जाता है. इस बीच पेठा कद्दू की खेती (Ash Gourd Farming) में मात्र 35,000 की लागत आती है, जिसकी बिक्री के बाद आराम से 2 लाख से 3 लाख तक की आमदनी ले सकते हैं. 

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और जानकारियों पर आधारित है. ABPLive.com किसी भी तरह की जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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