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कैसे होती कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, इससे किसानों को कितना फायदा?

खेती शुरू होने से पहले ही फसल का खरीदार मिल जाए और रेट भी पहले से तय हो जाए तो किसान की कई परेशानियां कम हो सकती हैं. कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग इसी तरीके पर काम करती है. जान लें इससे किसानों को कितना फायदा

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  • कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग फसल बुवाई से पहले खरीदार संग लिखित समझौता है.
  • फसल का प्रकार, मात्रा, क्वालिटी, रेट पहले से ही तय कर लिए जाते हैं.
  • किसान समझौता करते समय शर्तें, भुगतान, लागत सारी चीजें जान कर ही साइन करें.

खेती में किसान के लिए सिर्फ अच्छी पैदावार लेने की ही चिंता नहीं होती. फसल तैयार होने के बाद सही खरीदार खोजना और फसल के सही भाव हासिल करना भी मुश्किल काम होता है. कई बार मंडी में अचानक कीमत गिर जाती है. जिससे लागत निकालना तक मुश्किल हो जाता है. यहीं काम आती है कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग. इसमें किसान फसल की बुवाई से पहले किसी कंपनी, प्रोसेसिंग यूनिट, कारोबारी, एक्सपोर्टर और रिटेल चेन के साथ समझौता करता है.

एग्रीमेंट में फसल की किस्म, क्वालिटी, क्वांटिटी, कीमत और डिलीवरी से जुड़ी शर्तें पहले तय की जाती हैं. किसान को माल बेचने के लिए आखिरी समय पर बाजार नहीं खोजना पड़ता. हालांकि इसे कमाई की गारंटी समझना सही नहीं होगा. मौसम, प्रोडक्शन, क्वालिटी और एग्रीमेंट की शर्तें किसान के फायदे को प्रभावित कर सकती हैं. इसलिए कॉन्ट्रैक्ट साइन करने से पहले कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को पूरी तरह समझना जरूरी है. 

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किस तरह की जाती है?

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की शुरुआत किसान और खरीदार के बीच लिखित एग्रीमेंट से होती है. खरीदार कोई फूड प्रोसेसिंग कंपनी, बीज कंपनी, एक्सपोर्टर, होटल सप्लायर और बड़ा कारोबारी हो सकता है. कंपनी किसान को बताती है कि उसे कौन सी फसल, कितनी क्वांटिटी और किस क्वालिटी में चाहिए. इसके बाद जमीन के रकबे, फसल तैयार होने के समय और खरीद के रेट पर सहमति बनाई जाती है. कुछ कॉन्ट्रैक्ट में कीमत पहले से फिक्स रहती है. कुछ में मंडी भाव से जोड़कर न्यूनतम रेट तय किया जाता है.

कई कंपनियां किसान को बीज, खाद, दवा और खेती से जुड़ी टेक्निकल सलाह भी देती हैं. फसल तैयार होने पर उसका वजन और क्वालिटी चेक की जाती है. तय मानकों पर खरी उतरने के बाद खरीदार फसल लेकर किसान को भुगतान करता है. इसमें जमीन का मालिकाना हक किसान के पास ही रहता है. कंपनी का अधिकार सिर्फ एग्रीमेंट में दर्ज फसल की खरीद तक ही रहना चाहिए. बातचीत के आधार पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग शुरू न करें बल्कि साइन किया हुआ लिखित एग्रीमेंट लें उसके बाद ही काम करें.


कैसे होती कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, इससे किसानों को कितना फायदा?

किसानों को कितना फायदा मिलता है?

इस तरीके का सबसे बड़ा फायदा यह है कि किसान को बुवाई से पहले खरीदार मिल जाता है. इससे फसल बेचने की चिंता कम हो सकती है. कीमत पहले तय होने पर बाजार में भाव गिरने का असर ज्यादा नहीं होता है. कंपनी अगर अच्छे बीज, खेती की ट्रेनिंग और एक्सपर्ट की सलाह देती है तो उत्पादन के साथ फसल की क्वालिटी सुधर सकती है. आलू, टमाटर, मक्का, मसाले, औषधीय पौधे और प्रोसेसिंग वाली कई फसलों में ऐसे समझौते देखने को मिलते हैं.

किसान को कितना फायदा होगा इसका कोई फिक्स आंकड़ा नहीं है. कमाई फसल, उत्पादन, भाव, लागत और क्वालिटी पर डिपेंड करती है. मसलन बाजार में फसल का अनुमानित भाव 15 रुपये किलो है और कंपनी 18 रुपये किलो का रेट देती है तो किसान को प्रति किलो 3 रुपये ज्यादा मिल सकते हैं. दूसरी तरफ बाजार भाव 22 रुपये पहुंच जाए और कॉन्ट्रैक्ट रेट 18 रुपये हो तो किसान एक्सट्रा कमाई से चूक सकता है. इसलिए कीमत तय करने से पहले मार्केट भाव को लेकर नियम तय करना जरूरी है. 


कैसे होती कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, इससे किसानों को कितना फायदा?

यह भी पढ़ें: 90 दिन में तैयार हो जाता है चिप्सोना आलू, किसान कैसे करें इसकी खेती?

एग्रीमेंट करते समय इन बातों का रखें ध्यान

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के एग्रीमेंट में फसल का नाम, किस्म, क्वांटिटी, क्वालिटी पैरामीटर, खरीद रेट, वजन का तरीका और भुगतान की तारीख साफ लिखी होनी चाहिए. फसल रिजेक्ट होने के लिए किन मानकों को आधार बनाया जाएगा. इसका जिक्र भी जरूरी है. किसान यह जरूर चेक करे कि बीज, खाद, ट्रांसपोर्ट और पैकिंग का खर्च कौन उठाएगा. प्राकृतिक आपदा से उत्पादन घटने पर जिम्मेदारी किसकी होगी. यह शर्त भी पहले तय होनी चाहिए.

कंपनी का पुराना रिकॉर्ड और पेमेंट का तरीका चेक किए बिना कॉन्ट्रैक्ट न करें. बड़े एरिया में खेती हो तो किसान उत्पादक संगठन की मदद से बातचीत करना बेहतर हो सकता है. अगर कोई विवाद होता है तो शिकायत कहां की जाएगी. इसकी जानकारी एग्रीमेंट में होनी चाहिए. आखिर में बिना पूरा पढ़े एग्रीमेंट बिल्कुल साइन न करें.

यह भी पढ़ें: अपने किचन गार्डन में कैसे उगा सकते हैं करेला, सब्जी के साथ बीमारियों से भी छुट्टी

About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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