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अपने किचन गार्डन में कैसे उगा सकते हैं करेला, सब्जी के साथ बीमारियों से भी छुट्टी

सेहत के मामले में करेला काफी सही माना जाता है. अब आपको इसे बाजार से खरीदने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. किचन गार्डन में कुछ आसान स्टेप्स अपनाकर इसकी ताजी सब्जी पा सकते है. जानिए घर पर करेला उगाने का तरीका

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  • सही देखभाल, कीट नियंत्रण करें, 55-70 दिन में फल पाएं.

करेले का नाम सुनकर कई लोग इसके कड़वे स्वाद से दूरी बना लेते हैं. मगर हेल्थ को लेकर सतर्क रहने वाले लोगों की किचन लिस्ट में यह सब्जी जरूर शामिल रहती है. बाजार में मिलने वाला करेला कई बार पुराना होता है. उस पर कीटनाशक के इस्तेमाल की चिंता भी बनी रहती है. 

ऐसे में घर के किचन गार्डन में करेले की बेल लगाना अच्छा ऑप्शन बन सकता है. इसके लिए बहुत बड़ी जमीन की जरूरत नहीं पड़ती. सही साइज का गमला, थोड़ी धूप और बेल चढ़ाने की जगह मिल जाए तो शुरुआत आसानी से की जा सकती है.

करेले में फाइबर, विटामिन सी और कई जरूरी न्यूट्रिएंट्स पाए जाते हैं. डाइट में इसे शामिल करना पाचन और वजन मैनेजमेंट के लिए फायदेमंद माना जाता है. इसमें सबसे अच्छी बात यह है कि थोड़ी देखभाल के बाद एक बेल से कई दिनों तक ताजा करेला मिल सकता है. जान लें पूरा तरीका.

बीज लगाने से पहले तैयार करें मिट्टी

करेले की बुवाई गर्म मौसम में करना बेहतर माना जाता है. फरवरी से अप्रैल के बीच बीज लगाए जा सकते हैं. बारिश के मौसम में भी इसकी बेल अच्छी ग्रोथ कर सकती है. पौधा लगाने के लिए करीब 15 से 18 इंच गहरा गमला लें. गमले के नीचे पानी निकालने के लिए पर्याप्त छेद जरूर होने चाहिए. पानी जमा रहने पर जड़ें खराब हो सकती हैं. मिट्टी तैयार करने के लिए करीब 50 प्रतिशत सामान्य मिट्टी, 30 प्रतिशत पुरानी गोबर खाद और 20 प्रतिशत रेत मिलाएं.

बीजों को सीधे मिट्टी में लगाने से पहले करीब 10 से 12 घंटे पानी में भिगोकर रखा जा सकता है. इससे बीज का बाहरी हिस्सा नरम होता है और अंकुर निकलने की चांस बढ़ जाते है. गमले में करीब एक इंच गहराई पर दो से तीन बीज लगाएं. ऊपर से हल्की मिट्टी डालकर थोड़ा पानी दें. मिट्टी को नम रखें मगर हर दिन बहुत ज्यादा पानी न डालें. आमतौर पर सात से दस दिनों के भीतर छोटे पौधे दिखाई देने लगते हैं. अपने किचन गार्डन में कैसे उगा सकते हैं करेला, सब्जी के साथ बीमारियों से भी छुट्टी

बेल को धूप के साथ मजबूत सहारा दें

करेला बेल वाली सब्जी है. इसलिए पौधे के बढ़ने से पहले ही चढ़ने का इंतजाम कर देना चाहिए. गमले के पास बांस, मजबूत रस्सी, लोहे की जाली समेत कोई ऊंचा सपोर्ट लगाया जा सकता है. बेल को जमीन पर फैलने देने से पत्तियों में नमी बनी रहती है और फंगस लगने का खतरा बढ़ सकता है. 

ऊपर चढ़ी बेल को अच्छी हवा और बराबर धूप मिलती है. इससे फूलों के साथ फलों की ग्रोथ भी बेहतर हो सकती है.गमले को ऐसी जगह रखें जहां पौधे को रोज कम से कम छह घंटे सीधी धूप मिले. गर्मियों में मिट्टी बहुत जल्दी सूख सकती है. 

ऐसे में सुबह हल्का पानी देना सही रहता है. मिट्टी पहले से गीली दिखे तो पानी देने से बचें. पौधे की ग्रोथ बढ़ाने के लिए हर 15 से 20 दिनों में थोड़ी वर्मीकम्पोस्ट डाली जा सकती है. बेल बहुत घनी हो जाए तो सूखे और खराब पत्ते काट दें. इससे पौधे के बीच हवा आती रहेगी. 

यह भी पढ़ें: सेंड बोआ सांप को खेत में छोड़ने से क्या होता है फायदा? जानें इसके लाभ

इतने दिन में मिलेगा ताजा करेला

करेले की बेल पर सफेद मक्खी, माहू और दूसरे छोटे कीड़े नजर आ सकते हैं. शुरुआत में इन्हें कंट्रोल करने के लिए नीम के तेल का स्प्रे किया जा सकता है. करीब एक लीटर पानी में तीन से पांच मिलीलीटर नीम का तेल और कुछ बूंद हल्का लिक्विड सोप मिलाएं. इस घोल को शाम के समय पत्तियों के दोनों तरफ स्प्रे करें. तेज धूप में स्प्रे करने से पत्तियां झुलस सकती हैं.

संक्रमित पत्तों को समय रहते पौधे से अलग करना भी जरूरी है बुवाई के करीब 55 से 70 दिनों बाद फल मिलने शुरू हो सकते हैं. करेले को ज्यादा बड़ा होने का इंतजार न करें. हरा और मुलायम रहते हुए तोड़ने पर इसका स्वाद बेहतर मिलता है. नियमित तुड़ाई से बेल पर नए फल आने की रफ्तार भी बनी रहती है. 


अपने किचन गार्डन में कैसे उगा सकते हैं करेला, सब्जी के साथ बीमारियों से भी छुट्टी

यह भी पढ़ें: 5 एकड़ में लगाएं ये पौधा, पहले साल में होगी इतने लाख की कमाई

About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

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