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क्या वाकई सबसे सिक्योर है आईफोन, फिर बातचीत के तुरंत बाद क्यों दिखते हैं विज्ञापन?

Iphone Security: आईफोन को सबसे सिक्योर माना जाता है लेकिन बातचीत के बाद दिखने वाले ऐड लोगों को सोचने पर मजबूर कर देते हैं. कहीं फोन बातें तो नहीं सुनता है? जानिए पूरी सच्चाई.

Iphone Security: आईफोन को दुनिया के सबसे सेफ स्मार्टफोन्स में गिना जाता है. एप्पल कंपनी की ओर से बार बार दावा किया जाता है कि वह यूजर की प्राइवेसी को सबसे ऊपर रखता है. एंड टू एंड एन्क्रिप्शन, ऐप ट्रैकिंग ट्रांसपेरेंसी और मजबूत सिक्योरिटी चिप्स जैसी चीजें इसी का हिस्सा हैं. लेकिन इसके बावजूद बहुत से लोगों के साथ एक अजीब अनुभव होता है. 

आप किसी दोस्त से किसी प्रोडक्ट या जगह के बारे में बात करते हैं और कुछ ही देर बाद वही चीज आपके फोन पर विज्ञापन बनकर दिखने लगती है. तब मन में सीधा सवाल उठता है, क्या फोन हमारी बातें सुन रहा है. और अगर आईफोन इतना सिक्योर है तो फिर यह विज्ञापन आते कैसे हैं. चलिए आपको बताते हैं इस बारे में जानकारी.

आईफोन की सिक्योरिटी कितनी मजबूत है?

आईफोन की सिक्योरिटी सिर्फ मार्केटिंग लाइन नहीं है. तकनीकी तौर पर एप्पल बाकी कंपनियों के मुकाबले यूजर डेटा पर ज्यादा कंट्रोल देता है. फेस आईडी, आईमैसेज, फेसटाइम जैसी सर्विसेज एंड टू एंड एन्क्रिप्टेड होती हैं. यानी एप्पल खुद भी आपकी बातचीत नहीं पढ़ सकता. ऐप स्टोर के नियम भी सख्त हैं. कोई भी ऐप सीधे आपके माइक्रोफोन या कैमरे को तब तक एक्सेस नहीं कर सकता. जब तक आप खुद परमिशन न दें. 

सेटिंग्स में जाकर आप देख सकते हैं कि कौन सा ऐप कब माइक्रोफोन यूज कर रहा है. अगर आईफोन सच में चुपचाप आपकी बातें रिकॉर्ड कर रहा होता. तो यह एप्पल के पूरे बिजनेस मॉडल और कानूनी ढांचे के लिए बहुत बड़ा रिस्क होता. अब तक ऐसा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है कि आईफोन यूजर की बातचीत सुनकर ऐड दिखाता है.

फिर बातचीत के बाद ऐड क्यों दिखते हैं?

कई बार लोग आईफोन पर बातचीत करते हैं. तो काॅल कटने के बाद स्क्रीन पर ऐड नजर आने लगते हैं. लोगों के मन में सवाल आता है क्या आईफोन बातें सुन रहा है? तो आपको बता दें  यह माइक्रोफोन का वजह से नहीं बल्कि डेटा की वजह से होता है. आज आप जो सर्च करते हैं जिन पोस्ट पर रुकते हैं. जिन वीडियो को पूरा देखते हैं. जिन लोकेशन पर जाते हैं. इन सब से आपका एक डिजिटल पैटर्न बनता है. एल्गोरिद्म इसी पैटर्न से अंदाजा लगाता है कि आपकी दिलचस्पी किस चीज में हो सकती है. 

कई बार ऐसा होता है कि आप पहले से ही किसी प्रोडक्ट से जुड़ा कंटेंट देख चुके होते हैं.नलेकिन ध्यान नहीं जाता. बाद में जब उसी विषय पर बातचीत होती है और फिर ऐड दिखता है. तो दिमाग दोनों को जोड़ देता है. इसे कन्फर्मेशन बायस कहते हैं. इसके अलावा एक ही वाई फाई नेटवर्क पर मौजूद लोगों के सर्च और एक्टिविटी भी ऐड प्रोफाइल को अफेक्ट कर सकती है. इसलिए लगता है कि फोन सुन रहा है जबकि वह आपके डिजिटल बिहेवियर के चलते हो रहा होता है.

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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