ओरेकल ने 30 हजार कर्मचारियों को दूध में से मक्खी की तरह निकाला, कैंसर पीड़ित शख्स को भी नहीं बख्शा,सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस
दिग्गज टेक कंपनी ‘ओरेकल’ ने एक झटके में दुनिया भर में अपने करीब 30,000 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. लेकिन यह सिर्फ नौकरी जाने की खबर नहीं है, यह भरोसे के टूटने की कहानी है.

आज के दौर में जिसे हम ‘प्रगति’ और ‘टेक्नोलॉजी का भविष्य’ कहकर सराह रहे हैं, उसकी असली कीमत अब धीरे-धीरे सामने आने लगी है. चमकती हुई कॉर्पोरेट दुनिया के पीछे छिपा एक सख्त सच अचानक सबके सामने आ गया है. एक ऐसा फैसला, जिसने हजारों घरों की नींद उड़ा दी और लाखों लोगों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर इस तेज रफ्तार विकास की असली कीमत कौन चुका रहा है. दिग्गज टेक कंपनी ‘ओरेकल’ ने एक झटके में दुनिया भर में अपने करीब 30,000 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. लेकिन यह सिर्फ नौकरी जाने की खबर नहीं है, यह उस भरोसे के टूटने की कहानी है, जो कर्मचारियों ने सालों की मेहनत, वफादारी और उम्मीदों के साथ खड़ा किया था.
सुबह 6 बजे का वो 'जहरीला' ईमेल
कल्पना कीजिए, आप सुबह सोकर उठते हैं और आपके फोन पर एक ईमेल होता है. बिना किसी मीटिंग के, बिना अपने बॉस से बात किए, सिर्फ एक क्लिक में आपको बता दिया जाता है कि आपकी सालों की सेवा अब खत्म हो गई. ओरेकल के हजारों कर्मचारियों के लिए यह सुबह किसी बुरे सपने जैसी थी. कंपनी जिसे 'बिजनेस रिस्ट्रक्चरिंग' कह रही है, कर्मचारी उसे 'धोखा' मान रहे हैं.
जब कैंसर से जूझते पिता को मिला 'टर्मिनेशन लेटर'
सोशल मीडिया पर एक कहानी ने सबका कलेजा चीर दिया है. एक शख्स ने बताया कि उसके पिता, जिन्होंने 20 साल तक एक ही कंपनी और एक ही बॉस को अपनी जिंदगी दे दी, उन्हें उस वक्त नौकरी से निकाल दिया गया जब वे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से लड़ रहे हैं. 20 साल की वफादारी के बदले उन्हें फोन तक नहीं किया गया. आज उनके पास न नौकरी है, न बीमा और न ही इलाज का सहारा.
भारत पर गिरी सबसे ज्यादा गाज
इस छंटनी का सबसे बुरा असर भारत पर पड़ा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग 12,000 भारतीय पेशेवर बेरोजगार हो गए हैं. बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे टेक हब में सन्नाटा पसरा है, विडंबना देखिए कि कंपनी का मुनाफा (Net Income) 95% बढ़ चुका है, लेकिन फिर भी 'स्टारगेट' जैसे AI प्रोजेक्ट्स के लिए बजट बनाने के चक्कर में 30,000 जीती-जागती जिंदगियों को 'बोझ' समझकर हटा दिया गया.
मजदूर नहीं, मजबूर हैं हम?
सोशल मीडिया पर लोग अपना दर्द अलग-अलग तरह से बयां कर रहे हैं.
आस्था का सहारा: कोई कह रहा है कि "जब एक रास्ता बंद होता है, तो भगवान नया रास्ता खोलता है." लोग इस त्रासदी को 'डिवाइन पिवट' (ईश्वरीय बदलाव) मानकर मन को तसल्ली दे रहे हैं. थकान और राहत: कुछ कर्मचारी इतने टूट चुके थे कि उन्होंने इसे 'आजादी' करार दिया. एक कर्मचारी ने लिखा, "अब कम से कम मैं चैन से सो तो सकूंगा."
यह भी पढ़ें: "मुझे पाकिस्तान पसंद है" भारत घूमने आए विदेशी टूरिस्ट ने किया दावा तो उठा ले गई पुलिस, वीडियो हुआ वायरल
Source: IOCL



























