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दुनिया की पहली AI-डिजाइन वैक्सीन तैयार! क्या अब महामारी आने से पहले ही रुक जाएगी?

AI Vaccine: इस तकनीक ने पहले मानव परीक्षण का महत्वपूर्ण चरण भी पार कर लिया है.

AI Vaccine: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब केवल चैटबॉट, इमेज जनरेशन या डेटा विश्लेषण तक सीमित नहीं है. स्वास्थ्य क्षेत्र में भी इसकी भूमिका तेजी से बढ़ रही है. बीमारियों की पहचान और नई दवाओं के विकास के बाद अब AI ने वैक्सीन निर्माण में भी एक बड़ा कदम उठाया है. वैज्ञानिकों ने दुनिया की पहली ऐसी वैक्सीन विकसित करने का दावा किया है जिसे AI की मदद से डिजाइन किया गया है और जो किसी एक वायरस नहीं बल्कि पूरे वायरस परिवार के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करने की क्षमता रखती है.

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के शोधकर्ताओं ने बायोटेक कंपनी DIOSynVax के साथ मिलकर इस नई तकनीक पर काम किया है. उनका कहना है कि यह वैक्सीन मौजूदा वायरसों के साथ-साथ भविष्य में उभरने वाले नए वेरिएंट्स और संभावित खतरनाक वायरसों से भी बचाव कर सकती है.

इस तकनीक ने पहले मानव परीक्षण का महत्वपूर्ण चरण भी पार कर लिया है. शुरुआती क्लीनिकल ट्रायल में यह वैक्सीन सुरक्षित पाई गई है और अब इसे 200 से अधिक लोगों पर बड़े स्तर पर परखा जाएगा.

वैक्सीन विकास में एक नया दौर

अब तक अधिकांश वैक्सीन किसी खास वायरस या उसके किसी विशेष स्ट्रेन को ध्यान में रखकर बनाई जाती रही हैं. हालांकि इस रणनीति ने करोड़ों लोगों की जान बचाई है लेकिन वायरस लगातार अपना स्वरूप बदलते रहते हैं. यही कारण है कि फ्लू और कोविड-19 जैसी बीमारियों के लिए समय-समय पर वैक्सीन को अपडेट करना पड़ता है.

शोधकर्ताओं का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था में वैज्ञानिक हमेशा वायरस के पीछे भागते रहते हैं. जब तक नया वायरस पहचाना जाता है उसके खिलाफ वैक्सीन विकसित होती है और लोगों तक पहुंचती है तब तक संक्रमण काफी फैल चुका होता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के प्रोफेसर जोनाथन हीनी के अनुसार, कोविड-19 महामारी ने दिखाया कि हम वैक्सीन तेजी से बना सकते हैं लेकिन सोच अभी भी पुरानी है. उनका लक्ष्य ऐसी एक वैक्सीन विकसित करना है जो पूरे वायरस परिवार को निशाना बना सके.

AI ने कैसे तैयार की यह वैक्सीन?

इस परियोजना के लिए वैज्ञानिकों ने दुनिया भर से एकत्र किए गए कोरोनावायरस के जीनोमिक डेटा का विश्लेषण किया. इसमें पुराने प्रकोपों, वर्तमान संक्रमणों और ऐसे पशु वायरसों की जानकारी शामिल थी जो भविष्य में इंसानों को संक्रमित कर सकते हैं.

AI और मशीन लर्निंग सिस्टम ने इन आनुवंशिक आंकड़ों का अध्ययन कर यह पता लगाया कि वायरस के कौन से हिस्से लंबे समय तक लगभग अपरिवर्तित रहते हैं. वैज्ञानिक ऐसे तत्वों की तलाश में थे जो वायरस के अस्तित्व के लिए इतने महत्वपूर्ण हों कि उनमें बदलाव होने पर वायरस खुद कमजोर पड़ जाए.

इसी विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ताओं ने एक विशेष सुपर-एंटीजन तैयार किया. एंटीजन वह घटक होता है जो शरीर की प्रतिरक्षा सिस्टम को दुश्मन की पहचान करना सिखाता है.

सामान्य वैक्सीन जहां किसी एक वायरस के एंटीजन पर आधारित होती है वहीं यह नया एंटीजन कई संबंधित कोरोनावायरसों की साझा विशेषताओं को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरीके से बनी वैक्सीन वायरस में बड़े आनुवंशिक बदलाव होने के बाद भी प्रभावी रह सकती है.

क्या है यूनिवर्सल सार्बेको वैक्सीन?

मानव परीक्षण में जिस वैक्सीन का उपयोग किया गया उसे यूनिवर्सल सार्बेको कोरोनावायरस वैक्सीन कहा जाता है. सार्बेकोवायरस, कोरोनावायरस परिवार का एक समूह है जिसमें कोविड-19 के लिए जिम्मेदार SARS-CoV-2, 2003 की SARS महामारी का वायरस और चमगादड़ों में पाए जाने वाले कई अन्य कोरोनावायरस शामिल हैं.

यह वैक्सीन किसी एक वायरस को निशाना बनाने के बजाय पूरे समूह की साझा जैविक विशेषताओं को लक्ष्य बनाती है. इससे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली एक ही वायरस नहीं बल्कि कई संबंधित वायरसों को पहचानने और उनसे लड़ने में सक्षम हो सकती है.

पहले मानव परीक्षण में क्या नतीजे मिले?

जून में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, फेज-1 ट्रायल का मुख्य उद्देश्य वैक्सीन की सुरक्षा जांचना था. इस परीक्षण में 18 से 50 वर्ष आयु वर्ग के स्वस्थ स्वयंसेवकों को शामिल किया गया.

इस वैक्सीन को डीएनए आधारित फॉर्मूलेशन के रूप में एक विशेष माइक्रोफ्लूडिक जेट सिस्टम के जरिए दिया गया. इस तकनीक में पारंपरिक सुई का उपयोग नहीं होता बल्कि उच्च दबाव वाली तरल धारा त्वचा के भीतर जाकर वैक्सीन पहुंचाती है.

परीक्षण के दौरान वैक्सीन सुरक्षित पाई गई और इसने कई प्रकार के कोरोनावायरसों के खिलाफ प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न की. खास बात यह रही कि प्रतिरक्षा सक्रियता केवल SARS-CoV-2 और SARS के खिलाफ ही नहीं बल्कि कुछ ऐसे चमगादड़-जनित कोरोनावायरसों के खिलाफ भी देखी गई जो भविष्य में खतरा बन सकते हैं.

हालांकि वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया कि प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अभी शुरुआती स्तर पर रही लेकिन फेज-1 परीक्षण का उद्देश्य सुरक्षा और प्रारंभिक प्रभावों का मूल्यांकन करना होता है. आने वाले बड़े ट्रायल्स में इसकी प्रभावशीलता को और बेहतर तरीके से परखा जाएगा.

भविष्य की महामारियों को रोकने में कैसे मदद मिल सकती है?

शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि किसी वायरस परिवार के साझा गुणों को पहले से पहचान लिया जाए तो उसके खिलाफ वैक्सीन महामारी फैलने से पहले तैयार की जा सकती है.

आज दुनिया भर में निगरानी कार्यक्रम इंसानों और जानवरों में मौजूद हजारों वायरसों का डेटा एकत्र कर रहे हैं. AI की मदद से इन आंकड़ों का विश्लेषण कर वैज्ञानिक संभावित खतरों का अनुमान लगा सकते हैं और पहले से सुरक्षा उपाय विकसित कर सकते हैं. इस रणनीति का उद्देश्य महामारी आने के बाद प्रतिक्रिया देना नहीं बल्कि उससे पहले तैयारी करना है.

क्या बर्ड फ्लू और इबोला के खिलाफ भी काम करेगी यह तकनीक?

शोधकर्ता अब इसी प्लेटफॉर्म को अन्य खतरनाक वायरसों पर भी लागू कर रहे हैं. इनमें सबसे प्रमुख बर्ड फ्लू (H5N1) है जिसने दुनिया के कई हिस्सों में पक्षियों, स्तनधारियों और इंसानों को प्रभावित किया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि बर्ड फ्लू के कई अलग-अलग प्रकार मौजूद हैं और कुछ वेरिएंट इंसानों के लिए बेहद घातक साबित हुए हैं.

AI आधारित यह तकनीक ऐसे विभिन्न वेरिएंट्स के खिलाफ एक व्यापक सुरक्षा कवच तैयार करने में मदद कर सकती है. इसके अलावा इबोला वायरस परिवार के खिलाफ भी इस प्लेटफॉर्म का परीक्षण किया जा रहा है. वर्तमान वैक्सीन सभी प्रकार के इबोला वायरसों पर समान रूप से प्रभावी नहीं हैं. शोधकर्ताओं का लक्ष्य ऐसी वैक्सीन विकसित करना है जो पूरे वायरस परिवार के खिलाफ सुरक्षा प्रदान कर सके.

क्या यह स्वास्थ्य जगत में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है?

हालांकि यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है और बड़े स्तर के परीक्षण बाकी हैं लेकिन वैज्ञानिक इसे वैक्सीन विज्ञान में एक बड़ा बदलाव मान रहे हैं. यदि आगे के परीक्षण सफल रहते हैं तो भविष्य में ऐसी वैक्सीन विकसित की जा सकती हैं जो किसी एक बीमारी के बजाय पूरे वायरस परिवार के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करें.

ऐसा होने पर दुनिया महामारी फैलने के बाद वैक्सीन बनाने की दौड़ में शामिल होने के बजाय पहले से तैयार रह सकेगी. AI आधारित यह नई सोच स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में एक ऐसे भविष्य की ओर संकेत करती है जहां इंसान वायरस के पीछे नहीं बल्कि उनसे एक कदम आगे चल सकता है.

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