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433 साल तक चलेगी बैटरी! NASA की ये नई टेक्नोलॉजी ने सबको कर दिया हैरान

NASA Americium 241: इस खास तरह की बैटरी में रेडियोएक्टिव तत्व के धीरे-धीरे टूटने से निकलने वाली गर्मी का इस्तेमाल किया जाता है. इस गर्मी को खास डिवाइसों की मदद से बिजली में बदला जाता है.

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NASA Americium 241: दूर अंतरिक्ष में काम करने वाले स्पेसक्राफ्ट के लिए ऊर्जा सबसे बड़ी चुनौती होती है क्योंकि वहां सूरज की रोशनी पर्याप्त नहीं पहुंचती. ऐसे में सोलर पैनल ज्यादा कारगर साबित नहीं होते. इसी वजह से NASA कई वर्षों से रेडियोआइसोटोप पावर सिस्टम का इस्तेमाल करता आ रहा है जो प्लूटोनियम-238 जैसे तत्वों से ऊर्जा पैदा करते हैं. अब वैज्ञानिक एक नए विकल्प पर काम कर रहे हैं जो इस तकनीक को और आगे ले जा सकता है.

कैसे काम करती है यह न्यूक्लियर बैटरी?

इस खास तरह की बैटरी में रेडियोएक्टिव तत्व के धीरे-धीरे टूटने से निकलने वाली गर्मी का इस्तेमाल किया जाता है. इस गर्मी को खास डिवाइसों की मदद से बिजली में बदला जाता है. यह प्रोसेस लगातार चलती रहती है और इसमें किसी तरह की चार्जिंग या मेंटेनेंस की जरूरत नहीं होती. इस तकनीक में इस्तेमाल होने वाले कन्वर्टर लंबे समय तक बिना ज्यादा घिसावट के काम कर सकते हैं जो अंतरिक्ष जैसे माइक्रोग्रैविटी वातावरण के लिए बेहद जरूरी है.

Americium-241 क्यों है खास?

अब वैज्ञानिक प्लूटोनियम-238 की जगह Americium-241 नाम के तत्व को आजमा रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी उम्र है. जहां प्लूटोनियम-238 की आधी उम्र करीब 88 साल है वहीं Americium-241 लगभग 433 साल तक एक्टिव रह सकता है. यही कारण है कि यह नई बैटरी कई पीढ़ियों तक ऊर्जा देने में सक्षम हो सकती है. भले ही इसकी शुरुआती पावर थोड़ी कम हो लेकिन लंबे समय तक लगातार ऊर्जा देने की क्षमता इसे खास बनाती है.

इस तकनीक के फायदे

इस तरह की बैटरी का सबसे बड़ा फायदा इसकी लंबी कार्यक्षमता है. यह बिना किसी रुकावट के सैकड़ों साल तक ऊर्जा दे सकती है. इसके अलावा, इसे सूरज की रोशनी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता जिससे यह गहरे अंतरिक्ष में भी आसानी से काम कर सकती है. यह बैटरी लगातार और स्थिर ऊर्जा प्रदान करती है जिससे स्पेसक्राफ्ट के उपकरण, कम्युनिकेशन सिस्टम और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स लंबे समय तक चलते रह सकते हैं.

भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों पर असर

अगर यह तकनीक पूरी तरह सफल होती है तो अंतरिक्ष मिशनों की दिशा ही बदल सकती है. जहां पहले मिशन कुछ दशकों में कमजोर पड़ जाते थे वहीं अब वे सैकड़ों साल तक सक्रिय रह सकते हैं. इससे दूर-दराज के ग्रहों और सौर मंडल के बाहर तक खोज करना आसान हो जाएगा.

हालांकि यह तकनीक अभी परीक्षण के दौर में है और इसे पूरी तरह लागू होने में समय लगेगा लेकिन शुरुआती नतीजे काफी उत्साहजनक हैं. आने वाले समय में यह मानवता को अंतरिक्ष की गहराइयों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है.

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