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आत्मनिर्भर भारत की बदहाल तस्वीर, कानपुर देहात से विलुप्त होता बुनकर समाज, मजदूरी करने को मजबूर

कानपुर देहात के इन बुनकर समाज के लोगों का सरकार ने भी कोई ध्यान नहीं दिया और इनको किसी प्रकार की सुविधाएं नहीं दी. आर्थिक स्थित ठीक न होने के कारण बुनकर समाज के 50 परिवारों ने ये काम बंद कर दिया है.

कानपुर: यूपी के कानपुर देहात में पूर्वजों से बुनकर समाज के लोग सूती वस्त्र बनाने का काम करते चले आ रहे हैं. ये लोग हस्त निर्मित सूती वस्त्र तैयार कर आस पास के गांवों में बेंचते हैं लेकिन आज के आधुनिक समय में तरह तरह फैन्सी कपड़ों ने अपनी जगह बना ली है जिससे जनपद का हस्त निर्मित सूती वस्त्र उद्योग बन्द होने की कगार पर है. जनपद की ये हस्त उद्योग कलाएं विलुप्त होती दिखाई दे रही हैं. बुनकर समाज के लोगों को बाहर जाकर मजदूरी करने को विवश होना पड़ रहा है.

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया की बात करते हैं लेकिन कानपुर देहात में देश के प्रधानमंत्री का मेक इन इंडिया और मेड इन इंडिया का सपना साकार होते नहीं दिख रहा है. एक समय हमारे हिंदुस्तान की हस्त निर्मित खादी वस्त्र पहचान हुआ करती थी. जो अब विलुप्त होती जा रही है. कानपुर देहात के भोगनीपुर तहसील क्षेत्र के मूसानगर बांगर में सन 1964 से बुनकर समाज के 70 परिवार हस्त निर्मित सूती वस्त्र उद्योग का कार्य करते आ रहे थे. लेकिन आर्थिक स्थित ठीक न होने के कारण बुनकर समाज के 50 परिवारों ने ये काम बंद कर दिया है. उनकी मशीनें जंग खा रही हैं.

वहीं आज के समय सिर्फ 20 परिवार ही ये काम कर रहे हैं. काम बंद करने का इनका मुख्य कारण रहा है कि बुनकर समाज को हस्त निर्मित सूती वस्त्र को तैयार करने के बाद कोई अच्छा प्लेटफार्म नहीं मिला जिससे इनके बनाये हुए वस्त्रों को अच्छी मार्केट मिल जाती और इनके कपड़ों की बिक्री बढ़ जाती. दूसरा ये कि आज के आधुनिक समय में लोग हस्त निर्मित सूती वस्त्रों को भूलकर तरह तरह के फैन्सी कपड़ों ने इनकी जगह ले ली है. ऐसे में अब बुनकर समाज के लगभग 20 ही परिवार बचे हैं जो आज भी ये काम कर रहे हैं जो हस्त निर्मित सूती वस्त्र तैयार कर यहीं लोकल बाजार में बेंचते हैं. जिससे इनके घर का खर्च तक नहीं निकलता है. इनको परिवार चलाने में दिक्कत होती है जिसके कारण ये बुनकर समाज के लोग ईंट भट्ठों में काम करने लगे हैं या फिर दूसरे राज्यों में जाकर काम धंधा कर परिवार का पेट पाल रहे है. 

बुनकर समाज के लोगों का सरकार ने भी कोई ध्यान नहीं दिया

कानपुर देहात के इन बुनकर समाज के लोगों का सरकार ने भी कोई ध्यान नहीं दिया और इनको किसी प्रकार की सुविधाएं नही दी. अगर सरकार ने इनके बारे में सोचा होता तो शायद बुनकर समाज के लोगो को बाहर जाकर नौकरी नहीं करनी पड़ती.

एबीपी गंगा की टीम ने मूसानगर बांगर पहुंच बुनकर समाज के लोगों से मुलाकात की और उनके द्वारा बनाये जाने वाले हस्त निर्मित सूती वस्त्रों को देखा. मूसानगर बांगर में देखा कि घर घर लोग सूती वस्त्र बनाने का काम करते थे. लेकिन जब बुनकर समाज से उनकी आमदनी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि इस काम को हमारे पूर्वज करते चले आ रहे हैं लेकिन आमदनी नहीं होने से लगभग 50 परिवारों ने ये काम बंद कर दिया है. अब 20 परिवार ही काम कर रहे हैं. अब इस काम से घर का खर्च नहीं चल पाता है और यहां के लोग ईंट भट्ठों में जाकर मजदूरी करते है या फिर दूसरे राज्य जाकर नौकरी करते हैं. क्योंकि हम लोग सूती कपड़े तैयार तो कर लेते हैं लेकिन कोई खरीददार नहीं है. अगर हमारे बनाये हुए सूती कपड़ों की अच्छी मार्किट मिल जाये तो हम लोगों का व्यापार अच्छे से चलेगा और लोगों को बाहर जाकर नौकरी नहीं करनी पड़ेगी. सरकार ने भी हम लोगों का ध्यान नहीं दिया. किसी भी प्रकार की सरकारी सुविधाएं नहीं मिली. अगर सरकार हमारी तरफ ध्यान दे दे तो हम लोगों का रोजगार अच्छे से चल जायेगा. और एक बार फिर से देश के सूती वस्त्र उद्योग को नई पहचान मिल जायेगी.

वहीं जब बुनकर समाज की समस्या के बारे में जनपद के मुख्य विकास अधिकारी से बात की गई तो मुख्य विकास अधिकारी सौम्या पाण्डे ने बताया कि बुनकर समाज की आर्थिक स्थित सुधारने के लिये और उनको अच्छी मार्केटिंग देने के लिये वहां के नगर पंचायत के अधिशाषी अधिकारी और जीएम डीआईसी जो इंडस्ट्रीज प्रोमोट करते हैं, इनको लगाकर इनके द्वारा बनाये गए हस्त निर्मित सूती कपड़ों की मार्केटिंग बढ़ायी जाएगी.

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