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उत्तराखंड में पर्यटन बढ़ा, पहाड़ का दम घुटा, लेकिन सरकार की तैयारी कितनी?

Uttarakhand News In Hindi: नैनीताल, मसूरी और ऋषिकेश से लेकर चारधाम तक पर्यटकों की बढ़ती संख्या के बीच कई सवाल खड़े हो गए हैं. जिसमें बताया गया कि पहाड़ में सिर्फ जगह होना पर्याप्त नहीं है.

उत्तराखंड में पर्यटन का दायरा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ पहाड़ के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया है. नैनीताल, मसूरी और ऋषिकेश से लेकर चारधाम तक पर्यटकों और श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के बीच क्या इन पर्यटन स्थलों की सड़क, पार्किंग, पानी, सीवेज, कचरा और आवास जैसी सुविधाएं भी उसी रफ्तार से बढ़ी हैं?

अलग-अलग पर्यटन स्थलों की क्षमता को लेकर हुए वैज्ञानिक आकलन संकेत देते हैं कि पहाड़ में सिर्फ जगह होना पर्याप्त नहीं है. किसी पर्यटन स्थल की वास्तविक क्षमता इस बात से तय होती है कि वहां उपलब्ध संसाधन और बुनियादी सुविधाएं कितने लोगों का दबाव लंबे समय तक संभाल सकती हैं.

नैनीताल में 8.34 लाख की जगह, लेकिन प्रभावी क्षमता 8,422

नैनीताल इस पूरे मामले को समझने का सबसे बड़ा उदाहरण है. शहर की सिर्फ भौतिक क्षमता को देखें तो यहां प्रतिदिन करीब 8.34 लाख लोगों तक की गुंजाइश दिखाई देती है, लेकिन जब पानी, सीवेज, पार्किंग, आवास और दूसरी जरूरी सुविधाओं को गणना में शामिल किया जाता है तो प्रभावी क्षमता घटकर करीब 8,422 लोग प्रतिदिन रह जाती है. यानी किसी शहर में कितनी जगह है और वह वास्तव में कितने पर्यटकों को सुविधाजनक और टिकाऊ तरीके से संभाल सकता है, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं.

नैनीताल की अलग-अलग सुविधाओं के आंकड़े भी यही तस्वीर दिखाते हैं. सीवेज ट्रीटमेंट की क्षमता करीब 2,445 लोगों, पार्किंग करीब 2,740, आवासीय सुविधा करीब 7,226, सार्वजनिक शौचालय करीब 25,200 और पानी की आपूर्ति लगभग 35,736 लोगों तक की क्षमता के बराबर आंकी गई है. इसका सीधा मतलब है कि पीक सीजन में पर्यटकों की संख्या अचानक बढ़ने पर सबसे पहले शहर की कमजोर सुविधाओं पर दबाव पड़ता है. फिर यही दबाव सड़क पर जाम, पार्किंग की कमी, पानी की मांग, सीवेज और कचरे की समस्या के रूप में दिखाई देता है.

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दो दशक में नैनीताल पहुंचे तीन गुना पर्यटक

नैनीताल में पर्यटन बढ़ने की रफ्तार भी इस चिंता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. वर्ष 2000 में करीब 2.58 लाख पर्यटक नैनीताल पहुंचे थे, जबकि 2023 में यह संख्या बढ़कर करीब 7.84 लाख हो गई. यह पूरे साल का आंकड़ा है, इसलिए इसे प्रतिदिन की क्षमता से सीधे जोड़ना सही नहीं होगा. लेकिन यह जरूर बताता है कि दो दशक से ज्यादा समय में पर्यटन का दबाव काफी बढ़ा है और पीक सीजन में इसका असर शहर की सुविधाओं पर और ज्यादा दिखाई दे सकता है.

चारधाम यात्रा में यह सवाल और गंभीर हो जाता है. बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के लिए किए गए वैज्ञानिक आकलन में अलग-अलग टिकाऊ दैनिक क्षमता सामने आई है. इसके मुताबिक बद्रीनाथ में करीब 15,778, केदारनाथ में 13,111, गंगोत्री में 8,178 और यमुनोत्री में करीब 6,160 श्रद्धालु-पर्यटक प्रतिदिन की क्षमता आंकी गई है.

चारधाम यात्रा में हाल के वर्षों में श्रद्धालुओं की संख्या तेजी से बढ़ी है. वर्ष 2023 में यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या करीब 50 लाख तक पहुंच गई थी. ऐसे में चुनौती सिर्फ श्रद्धालुओं की संख्या को संभालने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि पीक सीजन में बढ़ने वाला दबाव इन संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों की क्षमता से बाहर न चला जाए.

नैनीताल में सड़क की क्षमता से कई गुना ज्यादा वाहन

मसूरी की स्थिति भी अलग नहीं है. पहाड़ी क्षेत्र में सड़कें सीमित हैं, पार्किंग सीमित है और पानी तथा सीवेज की व्यवस्था पर भी दबाव रहता है. मसूरी क्षेत्र में करीब 510 होटल, होमस्टे, धर्मशाला और अन्य आवासीय प्रतिष्ठानों में लगभग 17,470 बेड की क्षमता बताई गई है. वहीं सार्वजनिक पार्किंग की क्षमता करीब 1,240 वाहनों की है.

पर्यटन सीजन में जब बड़ी संख्या में वाहन मसूरी पहुंचते हैं तो सवाल केवल ट्रैफिक का नहीं रह जाता. अतिरिक्त वाहन कहां खड़े होंगे, पर्यटकों के लिए पानी कहां से आएगा, होटल और होमस्टे से निकलने वाला सीवेज किस क्षमता तक ट्रीट किया जा सकता है और बढ़ता कचरा कहां जाएगा—ये सभी सवाल उसी समय सामने आते हैं.

नैनीताल में भी वाहन दबाव की तस्वीर काफी गंभीर है. पीक सीजन में शहर में प्रतिदिन 2,100 से ज्यादा वाहन पहुंचने का आंकड़ा सामने आया है, जबकि सड़क नेटवर्क की क्षमता करीब 600 से 800 वाहन प्रतिदिन बताई गई है. शहर के प्रमुख पार्किंग स्थलों की क्षमता भी करीब 1,000 वाहनों की है. अतिरिक्त वाहनों को बाहरी पार्किंग क्षेत्रों में रोकने की व्यवस्था की जाती है, लेकिन इसके बावजूद पर्यटन सीजन में नैनीताल की सड़कों पर जाम और भीड़ की समस्या बनी रहती है. इसका मतलब साफ है कि पर्यटकों की संख्या बढ़ाने से पहले परिवहन और पार्किंग व्यवस्था की क्षमता बढ़ाना भी जरूरी है.

ऋषिकेश में नदी और एडवेंचर टूरिज्म पर दबाव

ऋषिकेश की चुनौती कुछ अलग है. यहां पर्यटकों का दबाव केवल सड़क और होटल तक सीमित नहीं है. गंगा नदी, घाट, रिवर राफ्टिंग, कैंपिंग और एडवेंचर टूरिज्म भी लगातार बढ़ रहा है. ऐसे में पर्यटन गतिविधियों का दबाव सीधे नदी और आसपास के प्राकृतिक क्षेत्रों तक पहुंचता है. गंगा में राफ्टिंग के लिए 576 राफ्ट की सीमा तय किया जाना भी बताता है कि प्राकृतिक संसाधनों की अपनी क्षमता होती है. अगर नदी आधारित पर्यटन को भी बिना सीमा के बढ़ाया जाए तो इसका असर पर्यटकों की सुविधा के साथ-साथ पर्यावरण पर भी पड़ सकता है.

नैनीताल, मसूरी, ऋषिकेश और चारधाम के अलावा औली, धनोल्टी, कौसानी, रानीखेत और चोपता जैसे पर्यटन स्थल भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. इन जगहों पर पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ अब यह सवाल उठना जरूरी है कि क्या इन क्षेत्रों में पानी, पार्किंग, सड़क, सीवेज और कचरा प्रबंधन की क्षमता भी उसी अनुपात में बढ़ी है? अगर किसी छोटे पर्यटन स्थल पर अचानक हजारों लोग पहुंचते हैं और वहां की बुनियादी सुविधाएं पहले से ही सीमित हैं तो इसका असर स्थानीय लोगों पर भी पड़ता है. पानी की खपत बढ़ती है, कचरा बढ़ता है, सड़कें जाम होती हैं और प्राकृतिक क्षेत्रों पर दबाव बढ़ता है.

सरकार के सामने अब सिर्फ पर्यटक बढ़ाने की चुनौती नहीं

उत्तराखंड के लिए पर्यटन बेहद महत्वपूर्ण है. इससे स्थानीय कारोबार, रोजगार और गांवों की अर्थव्यवस्था को फायदा मिलता है. इसलिए पर्यटकों को रोकना समाधान नहीं है. जरूरत इस बात की है कि पर्यटन को पहाड़ की क्षमता के हिसाब से व्यवस्थित किया जाए.

हर बड़े पर्यटन केंद्र के लिए अलग-अलग वैज्ञानिक carrying capacity तय करनी होगी. यह देखना होगा कि वहां एक दिन में कितने लोग पहुंच सकते हैं, कितने वाहन आ सकते हैं, पानी कितने लोगों के लिए पर्याप्त है, सीवेज कितनी मात्रा में ट्रीट किया जा सकता है और कचरे के निस्तारण की क्षमता कितनी है. इसके साथ पीक सीजन के लिए अलग व्यवस्था भी तैयार करनी होगी.

कितने पर्यटक आए नहीं, कितने संभाले जा सकते हैं?

उत्तराखंड में पर्यटन की बहस अब सिर्फ इस आंकड़े तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि इस साल कितने पर्यटक आए. बड़ा सवाल यह है कि किस पर्यटन स्थल की वास्तविक क्षमता कितनी है और वहां आने वाले पर्यटकों को सुरक्षित, सुविधाजनक और पर्यावरण के लिहाज से टिकाऊ तरीके से कितना संभाला जा सकता है. नैनीताल का 8,422 लोगों का प्रभावी क्षमता वाला आंकड़ा इस पूरे सवाल को गंभीर बना देता है. वहीं चारधाम के अलग-अलग आंकड़े बताते हैं कि हर पर्यटन स्थल की अपनी परिस्थितियां और अपनी सीमा है. इसलिए पूरे उत्तराखंड के लिए एक ही फार्मूला लागू नहीं हो सकता.

अगर पर्यटन की संख्या बढ़ती रही लेकिन पानी, सीवेज, पार्किंग, सड़क और कचरा प्रबंधन की क्षमता उसी गति से नहीं बढ़ी तो आज की भीड़ कल बड़ी समस्या बन सकती है. उत्तराखंड के सामने चुनौती साफ है—पर्यटन भी बढ़ाना है और पहाड़ की वह क्षमता भी बचानी है, जिसकी वजह से पर्यटक यहां आते हैं.

सवाल यह है कि सरकार पर्यटकों को उत्तराखंड आने का न्योता तो दे रही है, लेकिन क्या उन्हें घंटों जाम में फंसने, पार्किंग के लिए भटकने और बुनियादी सुविधाओं की कमी झेलने के लिए बुलाया जा रहा है? नैनीताल में जून 2026 में पर्यटन और होटल कारोबारियों ने खुद पार्किंग, ट्रैफिक मैनेजमेंट और पर्यटक सुविधाओं को बढ़ाने की जरूरत उठाई. सरकार की तरफ से टनल पार्किंग, मल्टीलेवल पार्किंग और रोपवे जैसी योजनाओं की बात हो रही है, लेकिन असली सवाल यह है कि बढ़ती पर्यटक भीड़ की रफ्तार के मुकाबले ये योजनाएं कब पूरी होंगी और तब तक पहाड़ कितना दबाव झेलेगा? 

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अतुल चौहान को पत्रकारिता के क्षेत्र में लगभग 35 वर्षों का अनुभव है. एबीपी न्यूज़ के साथ 17 सालों से जुड़े हैं और उत्तराखंड की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. इससे पहले एएनआई समेत अन्य बड़े संस्थानों से जुड़े रहे हैं.   वे कुमाऊं रीजन, उत्तराखंड के ब्यूरो चीफ रहे और क्षेत्रीय पत्रकारिता को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अतुल चौहान ने तीन दशक से अधिक के पत्रकारिता जीवन में राजनीति, प्रशासन, आपदा, विकास, सामाजिक सरोकार, चुनाव, अपराध और जनहित के अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर रिपोर्टिंग की है. मेल आईडी- atul.media@gmail.com

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