मार्च में 5% कम बरसे बादल, बर्फविहीन हुआ मद्महेश्वर, केदारनाथ में तेजी से पिघल रही बर्फ
केदारनाथ धाम में बीते पंद्रह दिनों से एक बार भी बर्फबारी नहीं हुई है. पहले जहां यहां कई फीट बर्फ जमी रहती थी, वहीं अब सिर्फ दो से ढाई फीट बर्फ ही बची है.

रुद्रप्रयाग जिले सहित पूरे चारधाम क्षेत्र में मौसम का मिजाज बदल गया है. मार्च माह में सामान्य से पांच फीसदी कम बारिश दर्ज की गई है, जिससे एक ओर जहां निचले इलाकों में समय से पहले गर्मी का अहसास हो रहा है, वहीं उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बर्फ पिघलने लगी है. इसका सीधा असर प्राकृतिक जल स्रोतों, जैव विविधता और कृषि गतिविधियों पर देखने को मिल रहा है.
सूरज की तपिश मार्च महीने में ही इतनी तेज हो गई है कि घाटियों में चैत्र मास में ही ज्येष्ठ माह जैसी धूप महसूस हो रही है. केदारनाथ और तुंगनाथ जैसे हिमालयी तीर्थ स्थलों में तेजी से बर्फ पिघल रही है. वहीं, द्वितीय केदार मद्महेश्वर मंदिर और उसके आसपास का पूरा बुग्याली क्षेत्र अब बर्फविहीन हो चुका है. केवल कुछ ऊंचाई वाले स्थानों और नम जगहों पर ही बर्फ की पतली परतें बची हैं.
केदारनाथ धाम में बीते पंद्रह दिनों से एक बार भी बर्फबारी नहीं हुई है. पहले जहां यहां कई फीट बर्फ जमी रहती थी, वहीं अब सिर्फ दो से ढाई फीट बर्फ ही बची है, जो तेज धूप के चलते लगातार घट रही है. भैरवनाथ और दुग्धगंगा क्षेत्र की पहाड़ियों पर भी अब बर्फ केवल छांव और नम स्थानों पर नजर आ रही है. चोराबाड़ी ग्लेशियर क्षेत्र में भी बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ गई है, जिससे आने वाले समय में ग्लेशियरों के सिकुड़ने का खतरा भी मंडरा रहा है.
मौसम विज्ञानियों के अनुसार मार्च महीने में जनपद रुद्रप्रयाग में औसतन 5% कम वर्षा दर्ज की गई. जनवरी में मात्र 2.5 मिमी और फरवरी में मात्र 23 मिमी वर्षा हुई, जो सामान्य से 79% कम है. हालांकि, फरवरी के अंत और मार्च की शुरुआत में हुई 41.2 मिमी बारिश ने थोड़ी राहत दी थी, परंतु बीते 20 दिनों से बारिश न होने के कारण फिर से जमीन की नमी कम होने लगी है.
मुख्य कृषि अधिकारी लोकेंद्र सिंह बिष्ट का कहना है कि मौसम का बदलता चक्र खेती पर भी प्रभाव डाल रहा है. फसलों की बुवाई, फूल आने और पकने के समय बारिश की जरूरत होती है, लेकिन अब यह क्रम टूट गया है. इससे उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है. वहीं, पर्यावरणविद् देव राघवेंद्र सिंह चौधरी बताते हैं कि शीतकाल में पर्याप्त बर्फबारी नहीं होने से मार्च के दूसरे सप्ताह से ही तापमान में असामान्य वृद्धि दर्ज की जा रही है.
बर्फ और बारिश की कमी का असर सिर्फ तापमान पर ही नहीं, बल्कि जल स्रोतों पर भी पड़ रहा है. कई नदियां, गाड़-गदेरे और प्राकृतिक झरनों का जल प्रवाह कम होने लगा है. विशेषज्ञों का मानना है कि शीतकाल में हुई सीमित बर्फबारी से ग्लेशियरों को कोई खास लाभ नहीं मिल पाया. जैसे ही धूप तेज हुई, बर्फ तेजी से पिघलने लगी जिससे हिमखंड भी असमय टूटने लगे हैं.
डॉ. बीरेंद्र प्रसाद उनियाल, प्रभारी सेंटर फॉर सस्टेनेबल इकोलॉजी एंड बायोडायवर्सिटी रिसर्च सेंटर, घिमतोली के अनुसार शीतकाल में यदि उच्च हिमालय में भरपूर बर्फबारी और निचले इलाकों में बारिश न हो, तो धरती को वह जरूरी नमी नहीं मिल पाती जो पारिस्थितिकी संतुलन के लिए आवश्यक है. यह परिवर्तन प्रकृति, वन्यजीव, कृषि और मानव जीवन सभी को प्रभावित कर रहा है. मौसम में आ रहा यह असंतुलन भविष्य में और भी गंभीर रूप ले सकता है यदि समय रहते सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण पर गंभीर पहल नहीं की गई.
जलवायु परिवर्तन की ये घटनाएं केवल पहाड़ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समूचे पर्यावरण तंत्र को प्रभावित कर रही हैं. मौसम के इस असामान्य बदलाव ने स्पष्ट कर दिया है कि अब समय आ गया है जब हमें विकास की योजनाएं प्रकृति के अनुकूल बनानी होंगी, ताकि भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित वातावरण मिल सके.















