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Rajasthan News: श्राद्ध पक्ष में महत्वपूर्ण माने जाने वाले कोओं की राजस्थान में घटी संख्या, जानें क्या है वजह

भारत में कौवे की कुछ और प्रजातियां पाई जाती हैं. इनमें ईस्टर्न जंगल कौआ, अंडमान ट्रीपी, कॉलर ट्रीपी, रेड-बिल्ड ब्लू मैगपाई और ग्रे ट्रीपी शामिल हैं. उनकी औसत लंबाई 40 से 80 सेमी तक हो सकती है.

Rajasthan News: देश सहित पूरे राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों में कौवे की संख्या में कमी से पक्षी प्रेमी निराश हैं. यह प्रजाति कभी हमारे आसपास के इलाकों के विशाल पेड़ पर ही आशियाना बना कर रहा करती थी. लेकिन अब उनकी आवाज भी नहीं सुनी जा रही है. शहरीकरण की दौड़ में बड़े-बड़े पेड़ काटे जा रहे हैं और खेत बनाए जा रहे हैं. लेकिन प्राकृतिक जंगल और घने वृक्षों का आवरण अब दिखाई नहीं देता. ऐसे में कौआ के सामने आवास का संकट भी खड़ा हो गया.

पक्षी-वन्यजीव प्रतिपालक बिट्टू कुमार सनाध्या का कहना है कि फसल के लिए रासायनिक खाद के बढ़ते उपयोग से पशु मरने लगे हैं. जब गिद्ध और कौवे इसे खाते हैं, तो वे भी मर जाते हैं. बंदर बड़ी संख्या में कौआ के घोंसलों को  नुकसान पहुंचा रहे हैं. यही कारण है कि कौवे  हमारी नजरों से दूर होते जा रहे हैं.

श्राद्ध पक्ष में कौवे नही मिलते, लोग होते है परेशान

पंडित राघव शर्मा ने बताया कि हिंदू धर्म में श्राद्ध पक्ष का विशेष महत्व है. श्राद्ध पक्ष को आज 8 दिन बीत चुके हैं. इन दिनों पुत्र-पौत्र अपने पितरों का श्राद्ध कर रहे हैं. श्राद्ध के संबंध में हिंदू धर्म में मान्यता है कि पितरों के लिए भोजन बनाया जाता है और इसे कौवे, गाय और ब्राह्मणों को चढ़ाया जाता है. जहां तीनों को एक साथ खाना भेजा जाता है. इसमें गाय और ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है. लेकिन कौवे को खाना खिलाना किसी संकट से कम नहीं है.

लोग आज भी छत पर कौवे के आकर खाने का इंतजार करते हुए खाना रखते हैं. वे कौवे को आवाज भी लगाते हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में निराशा ही हाथ लगती है. उन्होंने कहा कि गरूड़ पुराण के अनुसार कौवे को यमराज का संदेशवाहक बताया गया है. पूर्वजों को अन्न व जल कौवे के माध्यम से ही पहुंचता है. ऐसे में कौवे को भोजन कराना शुभ माना गया है. शास्त्रों के अनुसार यमराज ने कौवे को वरदान दिया था कि तुम्हें दिया गया भोजन पूर्वजों की आत्मा को शांति देगा. तब से ही लोग पितरों के निमित्त कौवे को भोजन दिया जाने लगा है. 

कम हो रही संख्या, पक्षी प्रेमी दुखी

पर्यावरण प्रेमी विट्ठल कुमार ने बताया कि पहले आबादी में बहुत सारे पेड़ थे. यहांकौआ के बैठने की जगह थी, इसलिए वे आसानी से दिखाई देते थे. अब पेड़ धीरे-धीरे आबादी में कम हो रहे हैं. वहां पक्के मकान, बड़े-बड़े भवन बन गए हैं. इसलिए उन्होंने जंगल की ओर रुख किया है. उन्हें आबादी में खाने के लिए कुछ नहीं मिलता. पेस्टीसाइड खाने से मनुष्य के साथ जीव-जंतुओं के जीवन पर भी संकट आ गया हैं

भारत मे पाई जाती है यह प्रजाति

भारत में कौवे की कुछ और प्रजातियाँ पाई जाती हैं. इनमें ईस्टर्न जंगल कौआ, अंडमान ट्रीपी, कॉलर ट्रीपी, रेड-बिल्ड ब्लू मैगपाई और ग्रे ट्रीपी शामिल हैं. कॉर्विड्स परिवार में कौवे, जैकडॉ, जेज़, मैगपाई और ट्रीपीज़ शामिल हैं. पक्षी प्रेमी बिट्ठल कुमार ने बताया कि कौआ का औसतन वजन 500 ग्राम से 2000 ग्राम तक हो सकता है. उनकी औसत लंबाई 40 से 80 सेमी तक हो सकती है.

विभिन्न प्रजातियों में इनका जीवनकाल 7 से 22 वर्ष के बीच होता है. यह भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में पाया जाता है. घर का कौआ चमकीले काले रंग का होता है. इसका पेट ग्रे रंग का होता है. जबकि ये आम रेवेन प्रजाति उत्तर-पश्चिमी भारत, राजस्थान और पंजाब के क्षेत्रों तक ही सीमित है.  पश्चिमी जैकडॉ, लॉन्ग बिल्ड क्रो, काले सिर वाला, भारतीय जंगली कौवा प्रजातियाँ दक्षिण से लेकर हिमालय, उत्तर-पश्चिम भारत तक देश भर में पाई जाती हैं. गहरा काला रंग, बड़ा आकार, ग्रे गर्दन उन्हें घर के कौवे से अलग बनाती है.

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