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Rajasthan News: ऐसा बांध जो मानसून के आते ही होता है लबालब, फिर भी किसानों को नहीं मिलता इसका लाभ, ये है वजह

Rajasthan के बूंदी में चांदा का बांध मानसून के आते ही लबालब पानी भर जाता है. पर इस बांध से आज तक किसानों को कई फायदा नहीं हो पाया है.

Chanda Dam Rajasthan: राजस्थान में मानसून सक्रिय होने के साथ ही नदी-तालाब और बांध में पानी की आवक जारी है. लेकिन हम राजस्थान का एक ऐसा बांध आपको बताने जा रहे हैं जो थोड़ी बहुत बारिश में ही लबालब हो जाता है और मानसून विदा होने से पहले ही खाली भी हो जाता है. बात अजीब सी लग रही होगी लेकिन यह सच है. हम बात कर रहे है बूंदी जिले का चांदा का बांध की. जिसकी भराव क्षमता 24 फीट है.

कुछ दिनों से राजस्थान में हुई बरसात से यह बांध 21 फिट के आसपास भर चुका है. बांध भरने के साथ क्षेत्र के लोगों में खुशी की लहर भी है. लेकिन जितनी तेजी से यह बांध भरा है उतनी तेजी से खाली भी हो रहा है. दरअसल बांध जब से बना है तब से यहां कुछ तकनीकी खामियां व लापरवाही के चलते बांध में रिसाव हो रहा है. रिसाव के कारण जितना पानी भरता है उतना पानी इस रिसाव के जरिए निकल जाता है. इस वर्ष भरे 21 फिट चांदा के बांध तालाब का पानी इसी तरह रिसाव से निकल रहा है. बांध के निचले इलाकों में बड़े - बड़े पानी के गड्ढे हो रहे हैं जिससे हजारों की लीटर ऐसे ही व्यर्थ बह जाता है. जल संसाधन विभाग हर वर्ष इस बांध की देख रेख के लिए लाखों रुपए खर्च करता है लेकिन आज दिन तक यह बांध बनने के बाद से किसी के काम नहीं आ सका है. 

1992 में बना था बांध, आज दिन तक नहीं आया काम
बूंदी जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित श्यामू गावं में यह चांदा का बांध बना हुआ है. चांदा का बांध निर्माण के दौरान 1992 में क्षतिग्रस्त होने से 1995 में बनकर तैयार हुआ था और इसकी भराव क्षमता 24 थी. लेकिन राज्य सरकार और जल संसाधन विभाग द्वारा ध्यान नहीं दिये जाने के कारण अत्यंत जर्जर हुआ बांध हर वर्ष रिसाव के चलते बगैर सिंचाई खाली हो जाता हैं. ऐसे में प्रदेश में संभवत सबसे पहले भरने और रिसाव के कारण सबसे पहले खाली हो जाने वाले चांदा का बांध से क्षेत्र के किसानों को किसी प्रकार का फायदा नहीं मिल पा रहा हैं. जिसके चलते उक्त बांध के रिसाव के कारण खाली हो जाने के सबंध में क्षेत्र के आदिवासी किसानों द्वारा अनेको बार जल संसाधन अधिकारियों से लेकर विधायक और सांसद तक बांध की मरम्मत करवा कर रिसाव रोकने की गुहार लगाई गई. लेकिन आज तक उक्त बांध की मरम्मत की और किसी के द्वारा ध्यान नहीं दिये जाने से क्षेत्र के पीड़ित किसानों को राहत नहीं मिल पा रही हैं.

निर्माण में बरती लापरवाही, ग्रामीण बोले, हमें नहीं मिल रहा फायदा
क्षेत्र के पूर्व सरपंच श्योजी लाल मीणा ने बताया कि जब यह बांध बना था तो उसी समय इस बांध में लापरवाही बरती गई. जिसके कारण आज तक भी ग्रामीण इलाके के लोग इसका खामियाजा भुगत रहे हैं. यह बांध सबसे पहले भरता है और सबसे पहले खाली हो जाता है.

जिस मकसद से इस बांध को बनाया था वह मकसद आज दिन तक भी पूरा नहीं हो सका है.  क्योंकि इसका सारा पानी वेस्ट वियर के जरिए नदी नालों में निकल जाता है. यदि इसका पानी रिसाव में नहीं निकलता तो हमारी जो नहर है उसमें सिंचाई के वक्त काम में आने वाले पानी की जरूरत को यह बांध पूरा करता लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 

ग्रामीण बताते हैं कि यह बांध आज दिन तक भी हमारे किसी काम में नहीं आया है. उल्टा हमें डर सताता रहता है कि यह बांध की पाल किसी दिन टूट नहीं जाए वरना हमारी जान पर आ बनेगी. जल संसाधन विभाग के अभियंता प्रदीप सोनी बताते हैं कि चांदा का बांध का केचमेंट एरिया काफी अच्छा है.

थोड़ी सी बारिश में यहां पर पानी का अच्छा फ्लो मिलने के कारण बांध भर जाता है. लेकिन जिस समय बांध बना उस समय तकनीकी खामी माने या लापरवाही उसके कारण बांध में रिसाव जारी रहा. जल संसाधन विभाग के अनुसार क्षेत्र के करीब 2 दर्जन से अधिक गांवों को चांदा के बांध का पानी का फायदा मिलता लेकिन आज दिन तक इसका फायदा नहीं मिल पाया है. 

बजट स्वीकृति का इंतजार
वही दुसरी तरफ बांध के पथरीले क्षेत्र में बने होने के कारण चट्टानों के बीच से पानी का रिसाव होने की बात कह रहे जल संसाधन अधिकारी प्रदीप सोनी बांध का रिसाव रोकने के लिए उनके द्वारा RRR योजना के तहत 619 लाख के प्रस्ताव केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजे जाने की बात कहते मामले से पल्ला झाड़ रहे है.

जल संसाधन अधिकारी प्रदीप सोनी ने बताया की पस्तावो को स्वीकृति मिलने के बाद ही बांध की मरम्मत करवा कर उसमें रिसाव रोका जा सकेगा. बहरहाल ऐसे में राज्य सरकार द्वारा पर्याप्त बजट नही दिये जाने के कारण अत्यंत जर्जर हुये जिले के चांदा का बांध की मरम्मत की और न जाने कब सरकार का ध्यान जायेगा और कब राशि स्वीकृत होने से क्षेत्र के आदिवासी किसानो को राहत मिल पायेगी ये कहना अभी मुश्किल हैं.

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