Jaipur News: रसोई गैस संकट के बीच मिट्टी के पारंपरिक चूल्हों की वापसी, शहर में जबरदस्त डिमांड
Jaipur News: जयपुर में गैस संकट के बीच मिट्टी के चूल्हों की मांग बढ़ गई है. गोबर से बने ईंधन सस्ता विकल्प बन रहा है. इससे रोजगार भी बढ़ा और लोग परंपरागत तरीके की ओर लौट रहे हैं.

मिडिल ईस्ट में हो रहे युद्ध की वजह से भारत में रसोई गैस का जबरदस्त संकट है. बाजार से इंडक्शन और डीजल चूल्हे भी गायब है. लकड़ी जलाने पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचने का खतरा है. ऐसे में पिंक सिटी कही जाने वाली राजस्थान की राजधानी जयपुर में लोग अब परंपरागत मिट्टी के चूल्हों का रुख कर रहे हैं. गाय के गोबर के साथ तैयार किए जा रहे मिट्टी के चूल्हों की डिमांड अचानक काफी बढ़ गई है.
मिट्टी के चूल्हों में लकड़ी या कोयले के बजाय गाय के गोबर से मशीन द्वारा तैयार ईंधन का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह पारंपरिक स्रोत न सिर्फ रसोई गैस का बेहतरीन विकल्प साबित हो रहा है, बल्कि हमें अपनी परंपरा और संस्कृति से जोड़ने का भी काम कर रहा है. मिट्टी के चूल्हों और गौ काष्ठ तैयार किए जाने से तमाम लोगों को रोजगार भी मिल रहा है.
कैंपस में कारीगर तैयार कर रहे मिट्टी के चूल्हे
जयपुर शहर के राजा पार्क इलाके के आर्य समाज कैंपस में इन दिनों गाय के गोबर और मिट्टी से तैयार चूल्हे बनाए जा रहे हैं. यह काम संस्था द्वारा खुद ही कराया जा रहा है. ग्रामीण इलाकों से आए कई कारीगर इन चूल्हों को तैयार कर रहे हैं. गोबर और मिट्टी से बने चूल्हे के साथ ही संस्था की गौशालाओं में गाय के गोबर से गौ काष्ठ यानी मशीन के जरिए लकड़ी नुमा ईंधन भी तैयार किया जा रहा है.
गोबर और मिट्टी के बने चूल्हे के तवे के साथ सिर्फ पांच सौ रुपए में लोगों को दिए जा रहे हैं. जबकि गौ काष्ठ का बड़ा बंडल ढाई सौ और छोटा डेढ़ सौ रुपए में दिया जा रहा है. दावा है कि गोबर और मिट्टी से बना यह चूल्हा कम से कम 20 साल तक खराब नहीं होगा. इसके साथ ही गोबर से तैयार ईंधन पर एक परिवार के खाना बनाने का खर्च महीने में पांच सौ रुपए से ज्यादा नहीं आएगा.
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अब हर मामले में खुद भी आत्मनिर्भर हो रहा भारत- रवि नैयर
आर्य समाज संस्था से जुड़े हुए सामाजिक कार्यकर्ता रवि नैयर के मुताबिक रसोई गैस और इंडक्शन चूल्हे का बेहतर विकल्प है. यह न सिर्फ सस्ता पड़ता है बल्कि पर्यावरण के बेहद अनुकूल है और साथ ही इसमें तैयार भोजन बेहद स्वादिष्ट और लाजवाब होता है. यहां मिट्टी के चूल्हे और गौ काष्ठ लेने के लिए पहुंचे लोगों का कहना है कि रसोई गैस है मिल नहीं रही है. घर में खाना बनाने की दिक्कत है, लिहाजा वह मिट्टी और गोबर से बने चूल्हे लेने के लिए आए हुए हैं. लोगों का कहना है कि इसमें तैयार भोजन का उन्हें स्वाद भी मिल रहा है.
चूल्हे तैयार कराने वाले सामाजिक कार्यकर्ता रवि नैयर के मुताबिक इस पारंपरिक विकल्प से यह भी संदेश जा रहा है कि भारत अब हर मामले में खुद भी आत्मनिर्भर हो रहा है और वह रसोई गैस समेत किसी भी दूसरी चीज के लिए पूरी तरह बाहरी लोगों पर डिपेंड नहीं है.
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Source: IOCL
























