Explained: 21 साल में 6 CM, 9 BMC मेयर, फिर भी मानसून में पानी-पानी मुबंई! मरते लोग, डूबते परिवार, क्यों नहीं बदलते हालात?
Mumbai Weather Update: मुंबई में पैसे की कमी, कमजोर प्लानिंग या शहर ने मान लिया कि डूबना इसकी किस्मत है. जब तक यह जवाब नहीं मिलता, मुंबई का 'फ्लड मैप' हर मानसून की सबसे भरोसेमंद भविष्यवाणी बना रहेगा.

मुंबई में मानसून आते ही एक तयशुदा स्क्रिप्ट हर साल दोहराई जाती है. अंधेरी सबवे से लेकर सायन और कुर्ला तक सड़कें डूब जाती हैं, गाड़ियां तैरने लगती हैं और शहर की लाइफलाइन लोकल ट्रेन थम जाती हैं. 4 महीने बाद पानी उतरता है और अगले साल फिर यह स्क्रिप्ट फिर रिपीट होती है. 2005 की बाढ़ से लेकर 2026 तक 21 साल में हजारों करोड़ रुपए खर्च हुए, कई प्रोजेक्ट बने, लेकिन बादल बरसने पर मुंबई क्यों वहीं आकर खड़ी होग गई- लाचार और डूबी...
26 जुलाई 2005: वो दिन जिसने मुंबई बदल दी
'फ्लड इन मुंबई 2005' रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई की बाढ़ की कहानी का जीरो माइलस्टोन 26 जुलाई 2005 है. उस दिन 24 घंटे में 944 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई थी, जो शहर के इतिहास की सबसे भीषण बारिश थी. इस बारिश में 500 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी.
रिसर्चगेट पर छपी स्टडी 'डिस्क्रिप्शन एंड इम्पैक्ट्स ऑफ द मुंबई मानसून फ्लड ऑफ जुलाई 2005' के मुताबिक, यह बाढ़ सिर्फ बारिश का नतीजा नहीं थी, बल्कि शहर की नालियों की क्षमता से कहीं ज्यादा पानी बरसने, मीठी नदी के अतिक्रमण और हाई टाइड के एक साथ आने से बनी भयावह त्रासदी थी.
इसके बाद सरकार और बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने वादा किया कि अब ऐसा नहीं होगा. एक बड़ा स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज प्रोजेक्ट लाया गया. करीब 6,000 करोड़ रुपए का BRIMSTOWAD प्रोजेक्ट बना, जिसे मुंबई की बाढ़ की समस्या का परमानेंट समाधान बताया गया.
फिर हर साल वही हिंदमाता, वही अंधेरी सबवे क्यों डूबता है?
2021, 2022, 2023, 2024 और अब 2026... हर साल का मुंबई मानसून एक जैसा दिखता है. इंडियन एक्सप्रेस की 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारी बारिश के चलते अंधेरी सबवे, हिंदमाता, मिलन सबवे और सायन में जलभराव ने ट्रैफिक को पूरी तरह ठप कर दिया. दरअसल, सबवे सड़क के स्तर से काफी नीचे बने हैं, जो पानी को अपनी तरफ खींचने का नेचुरल सिंक का काम करते हैं.
BMC वहां हाई-कैपेसिटी पंप लगाती है, लेकिन जब बारिश एक घंटे में 50-70 मिमी से ऊपर चली जाए, तो पंप जवाब दे जाते हैं और मिनटों में पूरा एरिया जलमग्न हो जाता है.
हिंदमाता की बात करें तो प्रिवेंशनवेब की एक रिपोर्ट 'मुंबई: अ रैन-रेडी सिटी देट फ्लड्स एवरी ईयर' बताती है कि वहां का ड्रेनेज सिस्टम 100 साल पुराने नेटवर्क पर टिका है. इस इलाके की नालियां ब्रिटिश जमाने की हैं, जो आज की आबादी के हिसाब से क्षमता का 25% भी पूरा नहीं करतीं.
ज्योग्राफिकल मजबूरी या प्लानिंग की नाकामी?
मुंबई मूल रूप से सात द्वीपों को जोड़कर बसाया गया शहर है. मुंबई की कई घनी आबादी वाले हिस्से समुद्र तल से नीचे या बिल्कुल सटे हुए हैं. जिस दिन भारी बारिश और ऊंची लहरें एक साथ आते हैं, तो समुद्र का पानी नालियों के रास्ते उल्टा शहर में घुसने लगता है.
यह एक ज्योग्राफिकल चैलेंजेस जरूर है, लेकिन 'वाय अ सिटी नेवर स्टॉप्स, कम्स टू अ स्टैंड स्टिल व्हेन इट रैन्स' रिपोर्ट यह सवाल उठाती है कि क्या शहर ने अपने आप को बढ़ाने में इस ज्योग्राफिकल चैलेंज पर ध्यान दिया है?
इस रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई में 1991 के बाद मैंग्रोव के 40% से ज्यादा जंगल खत्म हो चुके हैं. ये मैंग्रोव नेचुरल स्पंज का काम करते थे, जो बारिश के पानी को सोखकर धीरे-धीरे छोड़ते थे. अब वहां कंक्रीट के जंगल खड़े हैं, जो पानी को जमीन में जाने ही नहीं देते. इसके अलावा, मीठी नदी का बहाव बढ़ते अतिक्रमण और कंस्ट्रक्शन की वजह से 60% तक सिकुड़ चुका है. इससे उसकी पानी को झेलने की कैपेसिटी बेहद कम हो गई है.
21 सालों का हिसाब: खर्च कितना और असर कितना?
2005 की बाढ़ के बाद से BMC ने स्टॉर्म वॉटर ड्रेनेज पर 15,000 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए हैं. पंपिंग स्टेशनों 8 से बढ़कर 12 हो गए, छोटे पंपों की तैनाती 500 से ज्यादा जगहों पर की गई है. BMC कमिश्नर अश्विनी भिड़े के मुताबिक, 400 से ज्यादा फ्लड स्पॉट्स को घटाकर 90 तक लाया गया है.
यह आंकड़ा सुनने में सुधार जैसा लगता है, लेकिन सवाल यह है कि जो 90 स्पॉट बचे हैं, क्या वे शहर के सबसे अहम ट्रांसपोर्ट हब और घनी आबादी वाले इलाके नहीं हैं? हिंदमाता, अंधेरी, सायन और कुर्ला वो जगहें हैं जहां से रोज लाखों लोग गुजरते हैं. इनका डूबना पूरे शहर को ठप करने के लिए काफी है.
हर साल होने वाली मौतें और हादसे: आंकड़ों में छिपा मातम
सिर्फ जलभराव ही नहीं, हर साल भारी बारिश के दौरान सड़क हादसों, करंट लगने और दीवार गिरने की घटनाओं में कई लोग अपनी जान गंवा देते हैं:
- 2021 की बारिश में चेंबूर में एक घर की दीवार गिरने से 7 लोगों की मौत हुई थी.
- 2022 में कुर्ला में पानी भरे सबवे में एक कार के फंसने से एक व्यक्ति की डूबने से मौत हो गई.
- 2024 में बिजली के खंभे पर करंट उतरने से दो लोगों की जान चली गई.
- 2025 में जलभराव और बाढ़ में करीब 21 लोगों की मौत हुई.
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई में औसतन हर साल 2,500 लोगों की मौत होती है. इन मौतों की गिनती बड़ी रिपोर्ट्स में कहीं खो जाती है, लेकिन यही असली कीमत है मुंबई के हर मानसून की.
अलर्ट सिस्टम है, लेकिन रिएक्टिव सिस्टम अब भी कमजोर
मुंबई में अब ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन हैं. IMD का नाउकास्ट सिस्टम हर तीन घंटे में अपडेट देता है और BMC का फ्लड वॉर्निंग सिस्टम लोगों को मैसेज भेजता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यह पूरा सिस्टम 'रिएक्टिव' है. यानी बारिश होने के बाद हम बचाव करते हैं, जबकि जरूरत 'प्रोएक्टिव' प्लानिंग की है.
सिंगापुर और टोक्यो जैसे दुनिया के दूसरे तटीय शहरों ने अंडरग्राउंड वॉटर स्टोरेज टैंक और डायवर्शन चैनल बनाए हैं. मुंबई में अभी भी पुरानी नालियों पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है.
किस सबसे बड़े सवाल का जवाब कभी नहीं मिलता?
हर मानसून एक ही पैटर्न दोहराता है- तेज बारिश, डूबे इलाके, पंप चले, ट्रैफिक डायवर्ट हुआ और कुछ घंटों बाद पानी उतर गया. फिर अगले साल तक यह मुद्दा फाइलों में दबा रहता है. लेकिन असल सवाल तो यही है कि अगर हिंदमाता, अंधेरी सबवे, सायन, कुर्ला और मीठी नदी के इलाके 21 साल से बाढ़ के हॉटस्पॉट हैं, तो इस सदी की सबसे बड़ी आर्थिक राजधानी इन्हें स्थायी रूप से ठीक क्यों नहीं कर पाई?
क्या यह पैसे की कमी है, प्लानिंग की कमी है या फिर इस शहर ने कहीं न कहीं यह मान लिया है कि मानसून में डूबना इसकी किस्मत है. जब तक यह जवाब नहीं मिलता, मुंबई का 'फ्लड मैप' शायद हर मानसून की सबसे भरोसेमंद भविष्यवाणी बना रहेगा.





















