पश्चिम बंगाल में BJP की जीत के बाद उद्धव गुट बोला- मोदी-शाह के ‘पैटर्न’ ने सबकी बोलती बंद कर दी
Maharashtra News: शिवसेना (यूबीटी) ने सामना लेख के जरिए चुनाव नतीजों पर सवाल उठाते हुए कहा कि ये भाजपा के तय ‘पैटर्न’ का हिस्सा हैं. सामना में चुनाव आयोग की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किए गए.

4 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों पर शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. अपने संपादकीय में पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. इसमें चुनावी प्रक्रिया, चुनाव आयोग की भूमिका और लोकतंत्र की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए गए हैं.
सामना के मुताबिक 5 राज्यों के चुनाव परिणाम उसी तरह आए हैं जैसा पहले से तय किया गया था. इसमें खास तौर पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रणनीति को केंद्र में रखा गया है. लेख में दावा किया गया है कि चुनाव जीतने के लिए एक खास ‘पैटर्न’ अपनाया गया, जिसके तहत असम और पश्चिम बंगाल में जीत हासिल की गई.
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पश्चिम बंगाल के नतीजों को लेकर सबसे अधिक सवाल उठाए गए हैं. सामना के मुताबिक, ममता बनर्जी की पार्टी पहले लगातार तीन चुनाव जीत चुकी थी, लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग रहीं.
संपादकीय में आरोप लगाया गया कि चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर अर्धसैनिक बलों की तैनाती की गई और राज्य के अधिकारियों को हटाया गया. साथ ही मतदाता सूची से लाखों नाम हटाने का भी दावा किया गया है. इसमें चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं.
तमिलनाडु में तीसरे विकल्प का उदय
तमिलनाडु के नतीजों को लेकर सामना ने एक अलग तस्वीर पेश की है. यहां परंपरागत दलों के बीच मुकाबले में इस बार अभिनेता विजय की पार्टी ‘टीवीके’ ने मजबूती से एंट्री की. संपादकीय के अनुसार, द्रमुक और अन्ना द्रमुक के बीच चल रही पारंपरिक राजनीति से हटकर जनता ने तीसरे विकल्प को चुना. मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन द्वारा क्षेत्रीय अस्मिता और भाषा के मुद्दे उठाने के बावजूद मतदाताओं का रुझान बदलता दिखा.
असम में भाजपा की बड़ी जीत को भी ‘पैटर्न’ का हिस्सा बताया गया है. वहीं केरल में कांग्रेस की बढ़त को अलग राजनीतिक संकेत माना गया. सामना के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग परिणाम आने के बावजूद एक केंद्रीय रणनीति साफ दिखाई देती है.
पुडुचेरी में भाजपा ने अपनी सत्ता बनाए रखी, जिसे पार्टी के लिए सकारात्मक संकेत बताया गया है. हालांकि, सामना ने इसे भी उसी चुनावी रणनीति का हिस्सा बताया है, जिस पर सवाल उठाए जा रहे हैं.
चुनाव आयोग पर सवाल
संपादकीय में चुनाव आयोग की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. दावा किया गया है कि चुनाव निष्पक्ष तरीके से नहीं कराए गए और विपक्ष को बराबरी का मौका नहीं मिला. यह भी कहा गया कि यदि विपक्ष अदालत का रुख करे तो वहां भी उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद कम दिखाई देती है. इस तरह लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होने की बात कही गई है.
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सामना में यह भी कहा गया है कि देश में बढ़ते सामाजिक तनाव और धार्मिक विभाजन का असर चुनावों पर साफ दिख रहा है. आरोप लगाया गया कि इसी माहौल का फायदा उठाकर वोट हासिल किए गए. लेख में यह भी उल्लेख किया गया कि आर्थिक मुद्दे जैसे महंगाई, बेरोजगारी और आम लोगों की परेशानियां पीछे छूट गईं, जबकि चुनावी राजनीति में भावनात्मक मुद्दे हावी रहे.
संपादकीय में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर भी चिंता जताई गई है. इसमें कहा गया है कि ऐसी घटनाओं के बावजूद चुनावी जीत का जश्न मनाना समाज की संवेदनहीनता को दर्शाता है.
























